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ग़ज़ल : वही खिलते हुए फूलों सा तेरा मुस्कुराना हो

बहर: हज़ज मुसम्मन सालिम

वही दिलकश नज़ारा हो वही मौसम सुहाना हो,

वही खिलते हुए फूलों सा तेरा मुस्कुराना हो,

जुबां से कह नहीं पाया नज़र से तुम नहीं समझी,

बताना हो बड़ा मुश्किल कठिन उससे छुपाना हो,

पलटकर देखना तेरा ग़लतफ़हमी सही मेरी,

इसी धोखे के चलते बेवजह हँसना हँसाना हो,

अदा इक तो सनम कातिल खुदा से तुमने है पाई,

गिरे बिजली मेरे दिल पे जो तेरा भीग जाना हो,

चुराने आँखों से काजल फलक से आ गए बादल,

घटा घनघोर घिर आये जो नज़रों का झुकाना हो.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by MAHIMA SHREE on July 17, 2013 at 8:38pm

वही दिलकश नज़ारा हो वही मौसम सुहाना हो,

वही खिलते हुए फूलों सा तेरा मुस्कुराना हो

 

चुराने आँखों से काजल फलक से आ गए बादल,

घटा घनघोर घिर आये जो नज़रों का झुकाना हो

 

 

 

बहुत ही खुबसूरत  गजल आदरणीय अनंत जी ..बहुत-२ बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 17, 2013 at 8:28pm

बहुत सुन्दर वाह रूमानियत से भरी ग़ज़ल हर शेर लाजबाब दाद कबूल करें 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 17, 2013 at 8:13pm

आ0 अरून अनन्त भाई जी,    वाह! बहुत खूबसूरत गजल पगी है। तहेदिल दाद कुबूल करें।   सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 17, 2013 at 7:13pm

बहुत ही नजाकत से कोमल भावनाओं को सहेजा है गज़ल में 

खूबसूरत गज़ल के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by Pragya Srivastava on July 17, 2013 at 5:09pm

बहुत खूबसूरत गजल बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 17, 2013 at 4:15pm

वाह आपकी ग़ज़ल ने तो दिल बाग बाग कर दिया, एक से बढ़ कर एक अशआर हुए हैं

//जुबां से कह नहीं पाया नज़र से तुम नहीं समझी,

बताना हो बड़ा मुश्किल कठिन उससे छुपाना हो,//

इस एक शेर के लिए खास दाद क़ुबूल कीजिए

Comment by विजय मिश्र on July 17, 2013 at 1:23pm
गजल अपनी रुमानियत के साथ है और कहना नहीं होगा कि तारीफ़ की हद कर दियी आपने . बहुत शीरीं सी प्यारी गजल . मुबारकबाद कुबूल करें जनाब अरुणजी .
Comment by Neeraj Nishchal on July 17, 2013 at 1:15pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल आदरणीय

अरुण भाई ।

Comment by vijay nikore on July 17, 2013 at 1:07pm

बहुत सुन्दर, आदरणीय।

 

विजय निकोर

Comment by Parveen Malik on July 17, 2013 at 1:04pm

पलटकर देखना तेरा ग़लतफ़हमी सही मेरी,

इसी धोखे के चलते बेवजह हँसना हँसाना हो,

चुराने आँखों से काजल फलक से आ गए बादल,

घटा घनघोर घिर आये जो नज़रों का झुकाना हो.

बहुत सुन्दर अरुण जी बधाई ...

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