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पांच दोहे - लक्ष्मण लडीवाला

एकाकीपन साँझ का, मन विचलित करजाय 
इस पड़ाव पर उम्र के , बनता कौन सहाय |

 
सुन्दर हर पल वह घडी,अनुपम सा उपहार 
साँस साँस की हर लड़ी,करती जैसे प्यार |

 

होठ छुअन अहसास ही, मुग्ध मुझे करजाय,

संयम त्यागा स्वपन में, चंचल मन भटकाय |

 

बहका बहका दिख रहा, खुद का ही व्यवहार

जैसे सब कुछ ख़त्म है, मन मेरा लाचार | 

 

मेरे जीवन में बसे, रूप  धरा  श्रृंगार,

पोर पोर में बह रही, बनी सतत रसधार |

 

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 6, 2013 at 11:55am

हार्दिक आभार स्वीकारे भाई श्री बृजेश नीरज जी 

Comment by बृजेश नीरज on July 5, 2013 at 6:22pm

आदरणीय लाडलीवाल जी बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 5, 2013 at 5:42pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीया राजेश कुमारी जी | सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 5, 2013 at 5:21pm

आदरणीय दिल छू गया प्रथम दोहा तो ,बहुत बढ़िया दोहावली वाह 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 5, 2013 at 4:02pm

आपके कथन से दोहे की सुन्दरता और बढ़ गयी, हार्दिक आभार आदरणीय श्री विजय निकोरे जी, एवं श्री सुमित नैथानी जी 

Comment by Sumit Naithani on July 5, 2013 at 2:45pm

सुंदर दोहे 

Comment by vijay nikore on July 5, 2013 at 1:41pm

इन सुन्दर दोहों के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय लक्ष्मण जी।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 5, 2013 at 10:28am

 दोहों को सराह सराह कर मनोबल बढाने के लिए हार्दिक आभार आपका  श्री अशोक रक्ताले साहब 

रक्ताले की बात भी,  देती रहे  सकून,

वाणी संयम सांझ में,खिलता रहे प्रसून 

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 5, 2013 at 8:46am

आदरणीय लड़ीवाला साहब सादर प्रणाम, बहुत सुन्दर दोहे, किस दोहे की तारीफ़ करूँ सभी एक से बढकर एक हैं.सादर बधाई स्वीकारें.

वाणी संयम सांझ में, बनता अधिक सहाय |

स्वप्न व्यर्थ के देखकर, मन पाछे पछताय ||

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 4, 2013 at 6:10pm

अतीत की ही स्मृतियाँ, एकाकी है भाव 

शब्दों में पिरो सकते, रचना के वे पाँव |

दोहे पसंद करने के लिए हार्दिक आभार आदरणीया कुंती मुखर्जी | सादर  

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