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धरती का संताप
1
विलाप करती वसुमती – ‘ कह रही ‘
हे सागर ! उदधि महान !
उगता जब मेरे आँचल में
आकाश मण्डल दिशा
सूर्य चंद्र और नक्षत्र घटा
प्रताड़ित क्यों हूँ इतनी
बता ! कौन हैं मेरे अपने !
मर रहे नित्य वीर मेरे
शोक संतप्त हृदय हैं हो रहे
सूरज संग बैरी बना चंद्र
स्नेह देना था , दिया संताप -
वस्त्रहीन हो रही हूँ दिन प्रतिदिन.
2
हे प्रभु !
व्याकुल है प्राण मेरे
त्राहिमाम् ! त्राहिमाम् !
आठ वसुओं की प्यारी
पर – मच रही कैसी तबाही ?
दग्ध हृदय द्रवित मन
कैसे शांति पाऊँ भगवन् !
कहीं जंग कहीं दंग
वन उपवन है जल रहा,
वृष्टिहीन धरती, तप रही कहीं
कहीं सब जलमग्न हो रहा -
पड़ रहा अकाल , त्रस्त है प्रजा
रक्षक ही आज भक्षक है बना
प्रकृति भी नहीं कर सकती रक्षा
आयु अशेष देकर मत खींचो प्राण !
हे भगवन ! त्राहिमाम् ! ! त्राहिमाम् ! ! !
----कुंती
( पृथ्वी दिवस के अवसर पर – मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment

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Comment by ram shiromani pathak on April 23, 2013 at 9:08pm

आदरणीया कुंती जी/ सुन्दर प्रस्तुति। बधाई स्वीकार करें।

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 23, 2013 at 7:00pm

अर्थ दिवस पर धरती की वेदना से अवगत कराती सुन्दर रचना पर सादर  बहुत बहुत बधाई स्वीकारें आदरणीया कुंती जी.

Comment by भावना तिवारी on April 23, 2013 at 6:35pm

आठ वसुओं की प्यारी
पर – मच रही कैसी तबाही ?
दग्ध हृदय द्रवित मन
कैसे शांति पाऊँ भगवन् !
कहीं जंग कहीं दंग 
वन उपवन है जल रहा,............AADARNIYAA  coontee mukerji JI ..SHRESHTH BHAAVON KO SAMAAHIT KIYE HUYE ..AAPKI LEKHNI KO NAMAN .....HARDIK BADHAI .........!!

Comment by vijay nikore on April 23, 2013 at 4:41pm

आदरणीया कुंती जी:

 

//स्नेह देना था , दिया संताप -
वस्त्रहीन हो रही हूँ दिन प्रतिदिन. //

 

सदैव समान आपसे एक और सुन्दर रचना मिली।

बधाई।

 

सादर,

विजय

Comment by Shyam Narain Verma on April 23, 2013 at 1:20pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए .................
Comment by Savitri Rathore on April 23, 2013 at 12:36pm

प्रिय कुंती जी, पृथ्वी दिवस पर एक प्रासंगिक एवं सुन्दर रचना .............धरती की पीड़ा को मुखरित करती .............हमारे अंतस को झकझोरती और हमें धरती को बचाने का सन्देश देती हुई रचना ............बधाई हो।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 23, 2013 at 12:33pm

धरा की अंतर व्यथा, दुर्दशा पर निकली चीत्कारों को सुन्दर शब्दावरण मिले हैं .....

आयु अशेष देकर मत खींचो प्राण !
हे भगवन ! त्राहिमाम् ! ! त्राहिमाम् ! ! !

मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति के लिए बधाई आ० कुंती जी 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 23, 2013 at 9:59am

आ0 कुन्ती जी,  सादर प्रणाम!  सुन्दर प्रस्तुति।  सादर बधाई स्वीकार करें।

Comment by coontee mukerji on April 22, 2013 at 9:20pm

मनोज  जी एवम वंदना जी , रचना पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये  बहुत बहुत धन्यवाद .सादर  कुंती .

Comment by manoj shukla on April 22, 2013 at 7:59pm
धरा दिवस पर बहुत सुन्दर रचना...आदर्णीया हार्दिक बधाई आपको

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