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मंच के सामने आठ दस लोग कुर्सियों पर बैठे थे। सफेद झक कुर्ता पायजामा पहने छरहरे बदन का एक युवक मंच पर खड़ा भाषण दे रहा था, ‘आज हमारे देश को भगत सिंह के आदर्शों की जरूरत है……..।‘ भाषण खत्म होने पर संचालक ने घोषणा की, ‘थोड़ी ही देर में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारम्भ होंगे।‘

कुछ देर बाद एक युवती रंग बिरंगी वेशभूषा में मंच पर आयी और उसने एक गीत पर नृत्य आरंभ कर दिया ‘……चिकनी चमेली……’

भीड़ धीरे धीरे बढ़ने लगी थी।

सीटियां बज रही थीं।

भगत सिंह शहीद हो चुके थे। चमेली महक रही थी।

.

                                - बृजेश नीरज

 

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Comment by बृजेश नीरज on March 25, 2013 at 9:38pm

Respected Coontee ji, Thanks for your comments!

Comment by coontee mukerji on March 25, 2013 at 8:21pm

brijesh jha ji, chemeli ka bhi koi jawab nahi , apka bhi kia observation hai.bravo !

Comment by बृजेश नीरज on March 25, 2013 at 6:42pm

Neelima ji आपका आभार!

Comment by Neelima Sharma Nivia on March 25, 2013 at 6:34pm

अह!.एक करारा
व्यंग

Comment by बृजेश नीरज on March 25, 2013 at 5:55pm

केवल भाई आपका आभार!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 25, 2013 at 5:20pm

आदरणीय श्री बृजेश कुमार सिंह (बृजेश नीरज) जी, जितनी छोटी उतनी ही प्यारी रचना।
आपको बहुत बहुत बधाई।

Comment by बृजेश नीरज on March 25, 2013 at 5:16pm

आदरणीय राम शिरोमणि जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

Comment by बृजेश नीरज on March 25, 2013 at 5:06pm

राजेश जी आपका आभार!

Comment by ram shiromani pathak on March 25, 2013 at 1:45pm

बिल्कुल सटीक व्यंग किया है आपने  आदरणीय!

सुन्दर लेखन के लिए बधाई।
सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on March 25, 2013 at 12:52pm

सीटीयां जहां बजनी चाहिए वहीं अच्‍छी लगती है । ऐसे तमाम विरोधाभास अनेक जगहों पर हैं । हर सरस्‍वती पूजा में बीड़ी जलइले जरूर बजता है, छुटपन में हम भी तम्‍मा तम्‍मा लोगे या एक दो तीन बजाते थे क्‍योंकि हमारे लिए सरस्‍वती पूजन पूजनोत्‍सव ना होकर एक त्‍यौहार था, अब समझ में आया कि साधना और त्‍योहार अलग हैं, शायद यह बात हमने अभी भी बच्‍चों को सिखानी है । आपने सुंदर तरीके से इसे रेखांकित किया है, सादर

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