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कुछ रिश्ते अनाम होते हें
बन जाते हें
यूँ हीं, बेवजह, बिना समझे
बिना देखे, बिना मिले ....
महसूस कर लेते हें एकदूजे को
जैसे हवा महसूस कर ले खुशबु को
मानो मन महसूस कर ले आरजू को
मानो रूह महसूस कर ले बदन को
मानो बादल महसूस कर ले गगन को
मानो ममता महसूस कर ले माँ को
कैसे बन जाते हें ...
ये अनायास ... अजनबी रिश्ते
पता भी नहीं चलता ....
जब तक दूर नहीं होते हमसे ....
और तब...
सवाल उठते हें जहन मैं
वजूद पूछते हें रिश्तों का
क्या ये रिश्ता .. पिछले जन्म का है ???
और अगर नहीं ?
तो क्यूँ खींचता है ?
जैसे लोहा खींचे चुम्बक को ...
जज्बात शायद वजह होगी... !!
पर, इतना जज्बाती भी क्यूँ होता है कोई....
कि, जिसको देखा नहीं, सुना नहीं, छुआ नहीं...
महसूस होता है हर कहीं ..
वो एकाएक क्यूँ इतना अज़ीज़ हो जाता है... ?
ये रिश्ता आखिर क्या कहलाता है..??
बोलो ...., बोलो ...न.....

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 22, 2013 at 4:04pm

अनाम रिश्तों की खूबसूरत कश्मकश.. पर कुछ सवाल शायद कभी ज़वाब नहीं पाते...यही शायद खूबसूरती भी है.

शुभकामनाएं 

Comment by Amod Kumar Srivastava on March 22, 2013 at 10:58am


आदरणीय मीना पाठक जी, वंदना तिवारी जी, योगी सारस्वत जी, मुखर्जी जी तथा विजय निकोर जी   बहुत बहुत धन्यवाद आप लोगों की मधुर प्रतिक्रिया के लिये.

Comment by Meena Pathak on March 21, 2013 at 7:20pm

क्या बोलूँ .. शायद एहसास का रिश्ता है .. बहुत सुन्दर लिखा आप ने बधाई आप को 

Comment by Vindu Babu on March 21, 2013 at 3:12pm
शायद अनाम कहना ही उचित होगा इस अद्भुत् रिश्ते को श्री अमोद महोदय!
बहुत सुन्दर भाव संकलित किये हैं आपने.
सादर बधाई
Comment by Yogi Saraswat on March 21, 2013 at 11:06am

और अगर नहीं ?
तो क्यूँ खींचता है ?
जैसे लोहा खींचे चुम्बक को ...
जज्बात शायद वजह होगी... !!
पर, इतना जज्बाती भी क्यूँ होता है कोई....
कि, जिसको देखा नहीं, सुना नहीं, छुआ नहीं...
महसूस होता है हर कहीं ..
वो एकाएक क्यूँ इतना अज़ीज़ हो जाता है... ?

सच कहती सार्थक रचना ! बधाई स्वीकार करें

Comment by coontee mukerji on March 21, 2013 at 1:53am

adarneer kumar jee, apki kavita ko parkar itna hi kah sakti hoon ki - han riste janmon janmon ka hota hai aur har janam mei pichhaa karta hai.tahbi to ham jisko kabhi dekhe bhi nahin hote hai usse anjane mei hi riste ban jate hai.bahoot sundar kavita .dhaniavaad

Comment by vijay nikore on March 21, 2013 at 1:30am

आदरणीय अमोद जी:


 कि, जिसको देखा नहीं, सुना नहीं, छुआ नहीं...
महसूस होता है हर कहीं ..
वो एकाएक क्यूँ इतना अज़ीज़ हो जाता है... ?

 

बहुत सच, बहुत ही सच कहा है आपने।

 

सादर,

विजय निकोर
 

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