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आजादी के समय देश में हर तरफ दंगे फैले हुए थे। गांधी जी बहुत दुखी थे। उनके दुख के दो कारण थे - एक दंगे, दूसरा उनके तीनों बंदर खो गए थे। बहुत तलाश किया लेकिन वे तीन न जाने कहां गायब हो गए थे।

एक दिन सुबह अपनी प्रार्थना सभा के बाद गांधी जी शहर की गलियों में घूम रहे थे कि अचानक उनकी निगाह एक मैदान पर पड़ी, जहां बंदरों की सभा हो रही थी। उत्सुकतावश गांधीजी करीब गए। उन्होंने देखा कि उनके तीनों बंदर मंचासीन हैं। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। प्रसन्न मन वे उन तीनों के पास पहुंचे।

गांधीजी, ’अरे तुम लोग कहां चले गए थे, मैंने तुम तीनों को कितना ढूंढा? यहां क्या कर रहे हो?’

बंदर बोले, ’गांधीजी, हम लोगों ने आपको और आपके सिद्धान्त दोनों को त्याग दिया है। यह हमारी पार्टी की पहली सभा है। देश आजाद हो गया। अब आपकी और आपके सिद्धान्तों की देश को क्या जरूरत?’

गांधी जी हतप्रभ से खड़े रह गए।

आज भी खड़े हैं ठगे से, मूक इस देश में हो रहा तमाशा देखते।

अपने शहर में ढूंढिएगा कहीं न कहीं मिल जाएंगे मूर्तिवत खड़े हुए।

                                                                                         - बृजेश नीरज

 

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Comment by rajesh kumari on February 22, 2013 at 9:13am

बहुत सार्थक व्यंग्य किया है लघु कथा अपने प्रयोजन में कामयाब है 

Comment by Vindu Babu on February 22, 2013 at 12:01am
आदरणीय महोदय सादर अभिवादन!
बहुत अच्छी व्यंगात्मक लघु कथा है,वास्तव में शोचनीय विषय है।
आपकी लेखनी लघु कथा लेखन में नई तो नहीं लगती!
Comment by बृजेश नीरज on February 21, 2013 at 7:44pm

वेदिका जी,
आपका आभार!
सादर!

Comment by बृजेश नीरज on February 21, 2013 at 7:38pm

राम जी,
धन्यवाद!
सादर!

Comment by वेदिका on February 21, 2013 at 7:37pm

बहुत अच्छा .. सार्थक 

आदरणीय  बृजेश कुमार सिंह (बृजेश नीरज) , बहुत सही व्यंग रचा है आपने, वर्तमान के सन्दर्भ में ।

बधाइयाँ स्वीकारें !

सादर वेदिका 

Comment by ram shiromani pathak on February 21, 2013 at 7:33pm

आदरणीय बृजेश जी:

 

बहुत सुन्दर!!!!!!!!!!!!!! बधाई.

Comment by नादिर ख़ान on February 21, 2013 at 3:42pm

एकदम सही कहा बृजेश जी और बंदरों का एक ही सिद्धांत है कुर्सी हथियाना.....

Comment by बृजेश नीरज on February 21, 2013 at 10:29am

आदरणीय विजय जी, आपका आभार!

Comment by vijay nikore on February 21, 2013 at 10:21am

आदरणीय बृजेश जी:

 

बहुत सुन्दर!

 

विजय निकोर

Comment by बृजेश नीरज on February 21, 2013 at 10:09am

सलिल जी, आपका आभार!

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