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मेरे आने और तुम्हारे जाने के बीच

बस चंद कदमों का फासला रहा

न मै जल्दी आया कभी

न कभी तुमने इंतज़ार किया

ये फासला ही तो था

जिसे हमने

संजीदगी और ईमानदारी के साथ निभाया

फासले को

सिमटने नहीं दिया

और न ही

मिटने दिया

हम जुड़े रहे

फासले के साथ

बावजूद

तमाम मुश्किलों और तकलीफ़ों के

वो जिंदा रहा हमारे बीच

फासला बनकर  

और हम

मरते रहे, मरते रहे, मरते रहे

अपनेअपने अहम के साथ ...

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Comment

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Comment by नादिर ख़ान on February 4, 2013 at 10:03pm

बहुत शुक्रिया उपासना जी ....

Comment by upasna siag on February 4, 2013 at 3:13pm

बहुत सुन्दर रचना ......

Comment by नादिर ख़ान on February 3, 2013 at 9:59pm

भाई अशोक रक्ताले जी आपने रचना के भाव को सराहा 

आपका बहुत बहुत शुक्रिया...

Comment by Ashok Kumar Raktale on February 3, 2013 at 9:35pm

आदरणीय नादिर खान साहब सादर,अहम् के परिणाम को बखूबी बताती सुन्दर रचना पर बधाई स्वीकारें.

दीवारें जब अहम् की, बनती हैं जंजीर,

होते तब दो दिल जुदा,कैसी ये तकदीर/

Comment by नादिर ख़ान on February 3, 2013 at 7:21pm

महिमा जी हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया ।

Comment by नादिर ख़ान on February 3, 2013 at 7:20pm

अदरणीय सौरभ जी आप ने रचना को सराहा बहुत शुक्रिया । 

यकीनन फ़ासला ही शुद्ध शब्द है 

आपका तहे दिल से शुक्रिया 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 3, 2013 at 6:13am

आदरणीय नादिर भाई, पंक्ति-दर-पंक्ति बड़े गहरे उतरते गये हैं. बहुत-बहुत बधाई. अहं की एक कोर पकड़ चलना जीवन में क्या से क्या रीत जाने का कारण हो जाता है ! भाव निखर कर आये है.

एकबात : शुद्ध शब्द क्या है .. फासला या फांसला ? मैं फासला ही जानता हूँ.

सादर

Comment by MAHIMA SHREE on February 2, 2013 at 11:19pm

तमाम मुश्किलों और तकलीफ़ों के

वो जिंदा रहा हमारे बीच

फांसला बनकर  

और हम

मरते रहे, मरते रहे, मरते रहे

अपनेअपने अहम ...

क्या बात है  आदरणीय नादिर जी .. बहुत -२ बधाई इस सच्ची अभिवयक्ति के लिए  

Comment by नादिर ख़ान on February 2, 2013 at 10:44pm

अदरणीय

प्राची जी,विनय जी ,लक्ष्मण जी ,पाठक जी ,संदीप जी एवं राजेश कुमारी जी

आप सभी ने रचना को सराहा

बहुत-बहुत शुक्रिया..

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 2, 2013 at 9:22pm

अहम् जीवन की ख़ुशी का सबसे बड़ा शत्रु है यदि प्रेम के बीच आ जाएगा तो फांसले बढ़ ही जायेंगे ,बहुत अच्छी प्रस्तुति  नादिर जी बधाई आपको 

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