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प्रहार 

दहक उठे अंगारे धरती हुई रक्त से फिर पग पग  लाल 

जूझ पड़े वीर बाँकुरे झुके नहीं हँस  कटा दिए निज भाल
माँ  के लहराते आँचल में कायर  अरि  कंटक नित फंसाते 
धन्य है  भारत वीर भूमि जहाँ  बलिदानी पलकन चुनते जाते 
अरि मर्दन करने को खड़े रहते सीमा  पर प्रहरी  सीना  ताने 
हर बार लड़े  हर बार मिटे  हश्र उनका ये सारी दुनिया जाने
झूठ नही  अपनी धरती सिंचित है सिद्धांत  बुद्ध नेहरु गांधी से 
ख़ामोशी से  मृत्यु बेहतर है लाभ क्या नित मांग उजड़ वाने  से
सोचो न  समझो न अब बढ़ने दो वीरों को रोको न उनके पग 
लहू से मांग सजे शमशीरों की प्यास बुझे सबक ले सारा  जग
 
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा 
10-1-2013    
 
 
 

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on February 17, 2013 at 5:09pm

सादर धन्यवाद 

आदरणीय अशोक जी 

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 25, 2013 at 2:10pm

सुन्दर रचना आदरणीय प्रदीप जी.सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 10, 2013 at 4:58pm

धन्यवाद 

आदरणीय अनन्त जी 

सादर 

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 10, 2013 at 4:08pm

आदरणीय कुशवाहा सर प्राची दी ने सही कहा यही समय की मांग है, वीरों को विनम्र श्रधांजलि आपको बधाई

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 10, 2013 at 3:51pm

आदरणीया प्राची जी,

सादर 

एक छोटा प्रयास किया है. 

आपने सराहा मनोबल बढ़ा. 

धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 10, 2013 at 3:45pm

सरहद पर वीर सैनिकों के भाल काट दिए जाने पर आपकी विनम्र काव्यांजलि के लिए साधुवाद 

सोचो न  समझो न अब बढ़ने दो वीरों को रोको न उनके पग.....ये पंक्ति बिलकुल समय की मांग है.

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