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ग़ज़ल-तेरा लोटा तेरा चश्मा

ग़ज़ल

कहूँ कैसे कि मेरे शहर में अखबार बिकता है
डकैती लूट हत्या और बलात्कार बिकता है |

तेरे आदर्श तेरे मूल्य सारे बिक गए बापू
तेरा लोटा तेरा चश्मा तेरा घर-बार बिकता है |

बड़े अफसर का सौदा हाँ भले लाखों में होता हो
सिपाही दस में और सौ में तो थानेदार बिकता है |

वही मुंबई जहाँ टाटा अम्बानी जैसे बसते हैं
वहीं पर जिस्म कईओं का सरे बाज़ार बिकता है |

चुने जाते ही नेता सारे वादे भूल जाते हैं
यह वोटर किस छलावे में भला हर बार बिकता है |

ये कलियुग है ठगी की इन्तेहाँ होती नहीं कोई
सुना है नेट पर दिल्ली का क़ुतुब मीनार बिकता है |

करप्शन इस कदर हावी शहर के अस्पतालों में
दवा के वास्ते हर रोज़ ही बीमार बिकता है |

(लेखकीय :- पूज्य बापू को प्रणाम करते हुए ! ऐसी गज़लें लिखते हुए लिखने के सुख और संतोष से ज्यादा व्यवस्था के प्रति गहन दुःख होता है |)

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Comment by Abhinav Arun on November 29, 2010 at 4:03pm
shradhdha jee and shesh jee thanks for liking my ghazal .
Comment by Shanno Aggarwal on November 17, 2010 at 6:22pm
वाह ! श्रद्धा..वाह ! सलाम तुम्हें और तुम्हारी लेखनी को.
Comment by Shrddha on November 17, 2010 at 5:49pm
aaj kal ke halaat par aapka karara vayang padhkar achcha laga
Comment by Abhinav Arun on November 9, 2010 at 2:04pm
नूरैन अंसारी जी आपके अलफ़ाज़ मुझे सुकून दे रहे हैं तारीफ का शुक्रिया !!!
Comment by Noorain Ansari on November 8, 2010 at 4:36pm
बहूत सुंदर ग़ज़ल अभिनव जी..शब्दों का सुंदर संयोजन..पढ़ के रूह को सुकून मिला..
Comment by Abhinav Arun on November 8, 2010 at 2:12pm
jogeshwar jee bahut bahut dhanyavaad !!आपने रचना पढी और प्रतिक्रिया दी आभार !
Comment by jogeshwar garg on November 6, 2010 at 5:57pm
"अभिनवजी"
इतनी सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें !
Comment by Abhinav Arun on November 2, 2010 at 2:23pm
श्री शेष जी आप ने गज़ल पढ़ी पसंद की यही उत्साह बढ़ाने के लिए बहुत बड़ी बात है |आभार !!
Comment by Abhinav Arun on November 1, 2010 at 1:26pm
योगराज जी आपके हौसला देने वाले शब्दों के लिए शुक्रगुज़ार हूँ |कुछ सार्थक लिखने की कोशिश जारी रखूंगा |ओ.बी.ओ. आपके नेतृत्व में खूब फले फूले यही कामना है|

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 1, 2010 at 11:14am
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है अरुण भाई आपने, ग़ज़ल का मतला इसका हुस्न-ए-ग़ज़ल शेअर है ! मुबारकबाद कबूल कीजिये !

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