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गाँव के लोग सब ही जाने , घूमते हर गली हर मोड़ ।

चतुर सयानी
ससुर साजन करें जा धंधा , गाँव नगर जाते हर ओर ।
काफी दिन बाहर रह जाते , आते वे शाम कभी भोर ।
गाँव के लोग सब ही जाने , घूमते हर गली हर मोड़ ।
नव वधु रहे अकेली घर में , जब बाहर जाते सब छोड़ ।
बहने लगा पवन मस्ती में, काली घटा घिरी घनघोर ।
चारों ओर घिरा अंधेरा , घर नहीं सुने कोई शोर ।
बदमाशों की नीयत बदली , झट छिपकर चले चार चोर ।
लगे खोदने मिट्टी दिवार . , आहट सुनी बहु बड़ी जोर ।
देखा घर में सेंध बनाते , साहस की बाँध चली डोर ।
तेज दाव लेकर जा बैठी , सेंध समीप हाथ दे जोर ।
पहला सिर घुसा सेंध अन्दर , काटी सिर खींची झकझोर ।
दूसरे तीसरे चौथे का , धड़ सिर अलग करी बलजोर ।
देख चार लाश पड़ी घर में , कैसे निपटायें मन थोर ।
शोर कर चौकीदार गुजरा , जागते रहो जा हर ओर ।
चाचा जी जरा इधर आना , गया बोली सुन चीत चोर ।
एक लाश ठिकाने लगा दो , दो सौ में राखो मन मोर ।
सौ लो अभी सौ काम होते , उठाया कंधे पर ले जोर ।
चौकीदार गया जब ले कर , दूसरा लायी उसी ठोर ।
फेंक आया पैसा माँगने , बोली लाश पड़ा उस ओर ।
कैसे आया लाश उठाया , उठा ले गया दूजे छोर ।
दूसरी बार वहीं कहानी , पछता उठाया लगा जोर ।
तीनों दूसरे ओर फेंका , चौथा गया तालाब ओर ।
जोर लगा फेंका गड्ढे में , भगा कुम्हार चिल्ला जोर ।
लाठी ले दौड़ा पीछे से , चौकीदार चला उस ओर ।
मार गिराया कुम्हार को , बीती रात हो गया भोर ।
दौड़ी आ रोकी कुम्हारन , काहें मारता पिया मोर ।
मिट्टी काट रहा गड्ढे में, कैसे समझा तूने चोर ।
मैं फेंका लाश उठ भागा , आधी रात हो गया भोर ।
जा कर देख उसी गड्ढे में , मेरा पिया नहीं है चोर ।
जा कर देखा फिर पछताया , फिर जा कर देखा हर ओर ।
चार कोनें देख लाश पड़ा , दो सौ ले लो गलती मोर ।
ले जा इसको दूध पिलाना , बहन मैं समझा इसे चोर ।
रात की बात कह नहीं पाया , नौकरी न जाये बलजोर ।
वर्मा कितनी चतुर सयानी , आल्हा पढ़ना होते भोर ।
श्याम नारायण वर्मा

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 29, 2012 at 10:12am

बहुत समय बाद ऐसी रचना पढने को मिली, कुछ कमियों के बाबजूद हार्दिक बधाई वर्मा जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 29, 2012 at 9:54am

वीर छंद में ढालने का बहुत सुन्दर प्रयास किया है आपने शुरू से अंत तक रोचकता बनी रही बस विद्व जन आदरणीय सौरभ जी  की बातों पर गौर करना। बहुत बहुत बधाई  श्याम नारायण वर्मा जी |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 28, 2012 at 4:30pm

भाई श्याम नारायणी, आपने आल्हा या वीर छंद में पद्यात्मक कथा कही है. बधाई.

वैसे गेयता के लिहाज से इस रचना को अभी बहुत सधना है. हाँ, व्याकरण सम्मत शुद्धियों पर भी दृष्टि रहे, आदरणीय. कई स्थानों पर शब्द के यथोचित लिंग आदि त्रुटिपूर्ण हो गये हैं.

सादर

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on November 28, 2012 at 7:49am
श्याम नारायण वर्मा जी, बहुत ही सुन्दर कथा को कविता में उतारा है|
Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 27, 2012 at 11:01pm
श्याम नारायण वर्मा जी, बहुत ही सुन्दर कथा को कविता में उतारा है|

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