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गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |
गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||

गोत्रज दुल्हन जनमती, एकल-सूत्री रोग |
दैहिक सुख की लालसा, बेबस संतति भोग ||

नहीं चिकित्सा शास्त्र में, इसका दिखे उपाय |
गोत्रज जोड़ी अनवरत, संतति का सुख खाय ||

गोत्रज शादी को भले, भरसक दीजे टाल |
मंजूरी करती खड़े, टेढ़े बड़े सवाल ||

परिजन लेवे गोद जो, कर दे कन्या-दान |
उल्टा हाथ घुमाय के, खींचें सीधे कान ||

मिटते दारुण दोष पर, ईश्वर अगर सहाय |
सबसे उत्तम ब्याह हित, दूरी रखो बनाय ||

गोत्र-प्रांत की भिन्नता, नए नए गुण देत |
संयम विद्या बुद्धि बल, साहस रूप समेत ||

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Comment by seema agrawal on November 1, 2012 at 1:51pm

सार्थक और सोद्देश्य प्रस्तुति ....बधाई रविकर जी 

Comment by रविकर on October 31, 2012 at 6:07pm

आभार आदरणीय सौरभ जी ,
आदरणीय लडीवाला जी-
आदरेया राजेश दी
सादर ||


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2012 at 4:57pm

रविकर भाई आपके, देते छंद दलील ।
विषय लिये हैं आप जो, है संवेदनशील ॥
है संवेदनशील, बखूबी तथ्य उचारे ।
लेकिन आज समाज, कहाँ कुछ सत्य सँकारे ?
जो लेते हैं पक्ष, कि, उनमें ’बौड़म’, ’अतिकर’.. .
जहाँ विपक्ष दलील ? वहाँ क्या कहना, रविकर.. .!!

बधाई भाई बधाई.. .

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 31, 2012 at 12:43pm

गुण-सूत्रों की विविधता, बहुत जरूरी चीज |
गोत्रज में कैसे मिलें, रखिये सतत तमीज ||

अच्छी रचना बधाई | इसके साथ ही अब -
 
जब रिश्ता ही कर रहे, रहना एक दूजे के संग 
रक्त ग्रुप अवश्य ही मिले,जीवे भर का है संग 
गौत्राज अर्थ भी यही,एक गोत्र में न हो सम्बन्ध 
एक गोत्र में होत है, जैसे बहिन भाई का सम्बन्ध 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 31, 2012 at 12:23pm

रविकर भाई हम उत्तर  भारतीय इस बात को बखूबी समझते और पालन भी करते है पर दक्षिणी भारतीय को कैसे समझाएं जहां मामा से  ही विवाह जरूरी है पढ़े लिखे लोग भी इसी गतानुगति को लोके वाली कहावत साबित कर रहे हैं फिर क्या कर सकते हैं और मुस्लिम समाज का  तो सबको पता ही है मेडिकल साइंस भी ढोल पीट पीट कर परेशां हो गई है पर कोई समझता ही नहीं ---बहुत शिक्षाप्रद दोहे बहुत बहुत बधाई 

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