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हम तुमसे मिल रहे है बड़ी मुद्दतो के बाद ,


दर्द

आँखों पे जब से पड़ गयीं नज़रें फरेब की
आंसू हमारे और भी नमकीन हो गए
तुमने हमारे दर्द की लज्ज़त नहीं चखी
जिसने चखी वो दर्द के शौक़ीन हो गए

मुलाक़ात

हम तुमसे मिल रहे है बड़ी मुद्दतो के बाद ,
दो फूल खिल रहे है बड़ी मुद्दतो के बाद .
जुम्बिश हुई लबो को तो महसूस ये हुआ ,
ये होंठ हिल रहे है बड़ी मुद्दतो के बाद

अपनी माटी

हर इक इंसान को करना चाहिए सम्मान मिटटी का
के चलता फिरता पुतला है हर इक इंसान मिटटी का
हमारा घर है मिटटी का हमारी कब्र मिटटी की
यूँ मर कर भी उतर सकता नहीं एहसान मिटटी का

घर

जो देखी कभी मैंने वीरान बस्ती
मुझे अपने दिल का नगर याद आया
रहा अपने घर में ही परदेसी बनकर
जो परदेस निकला तो घर याद आया

बेरुखी

कौन कहता है के वो घर मेरे क़ज्दन आये
जब कभी घर मेरे आये तो वो सहबन आये
सारे एहबाब ही आये मिज़ाज पुरसी को
इसलिए मेरी अयादत को वो रस्मन आये


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Comment

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Comment by Hilal Badayuni on October 20, 2010 at 11:47am
shukriya preetam bhai jo aapne in ashaar ko apni muhabbat se nawaza
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on October 17, 2010 at 6:01pm
आँखों पे जब से पड़ गयीं नज़रें फरेब की
आंसू हमारे और भी नमकीन हो गए
तुमने हमारे दर्द की लज्ज़त नहीं चखी
जिसने चखी वो दर्द के शौक़ीन हो गए

waah hilal bhai waah...dil jeet liya aapne
Comment by DEEP ZIRVI on October 9, 2010 at 11:57pm
urdu me zra haath tng hai
Comment by DEEP ZIRVI on October 9, 2010 at 11:56pm
jio
Comment by Hilal Badayuni on October 6, 2010 at 3:51pm
navin bhai by mistake insaan hua hai insaa hi sahi hai
aap jaise samajhdaar shohra aasani se samajh sakte hai

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 6, 2010 at 9:10am
वाह वाह हिलाल भाई , वैसे तो सभी क़तात अच्छे लगे पर "दर्द" कुछ ज्यादा ही अच्छा लगा,
आँखों पे जब से पड़ गयीं नज़रें फरेब की
आंसू हमारे और भी नमकीन हो गए
तुमने हमारे दर्द की लज्ज़त नहीं चखी
जिसने चखी वो दर्द के शौक़ीन हो गए,
बहुत खूब ,
Comment by आशीष यादव on October 6, 2010 at 6:31am
ek baar fir dil khil utha. umda she'r sabhi kamaal ke.

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