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सोन परी हिय मोद भरे !

बिटिया रानी खिली कली सी

सागर चीरे- परी सी आई

बांह पसारे स्वागत करती

जन मन जीते प्यार सिखाई !

--------------------------------

कदम बढ़ाओ तुम भी आओ

धरती अम्बर प्रकृति कहे

गोद उठा लो भेद भाव खो

सोन परी हिय मोद भरे !

--------------------------------------

हहर-हहर मन ज्वार सरीखा

चन्दा को अपनाने दौड़ा

कहीं न मुड़ जाए  'पूनम' सा

नैन हिया भर सीपी -मोती पाने दौड़ा !

----------------------------------------

बिना कल्पना ,बिन प्रतिभा के

लक्ष्मी कहाँ ? रूठ ना जाए

आओ प्यारे फूल बिछा दें

चरण 'देवि' के नेह लुटाएं !

---------------------------------

ये अद्भुत मुस्कान- धरा की

दर्द व्यथा कल से हर लेगी

सोन चिरइया -नदी दूध की

कल्प-वृक्ष बन वांछित फल  देगी !

----------------------------------------

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर ५ '

कुल्लू यच पी १९.६.२०१२

Views: 799

Comment

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 23, 2012 at 1:08am

मान्य सौरभ पाण्डेय भ्राता श्री  आप के प्यारे उदगार  और ये प्रोत्साहन  किसी पुरस्कार से कम नहीं होते आप के गूढ़  विशिष्ट शब्द मन को छू जाते हैं बहुत  बहुत  आभार आप का अपना स्नेह और सुझाव देते रहें कृपया --भ्रमर ५ 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 23, 2012 at 1:06am

प्रिय संदीप जी , योगी गुरु जी, राज जी आप सब ने उत्साह बढाया बहुत ख़ुशी हुयी बहुत बहुत  आभार --भ्रमर ५ 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 23, 2012 at 1:04am

आदरणीया राजेश कुमारी जी प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार --भ्रमर ५ 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on June 23, 2012 at 1:03am

आदरणीय  अलबेला जी रचना आप के मन को छू सकी आप ने समय दिया बहुत ख़ुशी हुयी आभार --भ्रमर ५ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 21, 2012 at 11:31pm

भाई सुरींदर जी, आपकी इस रचना की धारिता बहुत ही गहरी है.  विशेषकर निम्न पंक्तियों के लिये सादर बधाई स्वीकार करें -

ये अद्भुत मुस्कान- धरा की
दर्द व्यथा कल से हर लेगी
सोन चिरइया -नदी दूध की
कल्प-वृक्ष बन वांछित फल देगी !

बहुत खूब !!

Comment by Raj Tomar on June 21, 2012 at 9:53pm

"

ये अद्भुत मुस्कान- धरा की

दर्द व्यथा कल से हर लेगी

सोन चिरइया -नदी दूध की

कल्प-वृक्ष बन वांछित फल  देगी "

बहुत सुन्दर. :)

Comment by Yogi Saraswat on June 21, 2012 at 2:58pm

बिना कल्पना ,बिन प्रतिभा के

लक्ष्मी कहाँ ? रूठ ना जाए

आओ प्यारे फूल बिछा दें

चरण 'देवि' के नेह लुटाएं !

bahut sundar bhaav liye atyant sundar rachna , bhramar saab !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 21, 2012 at 10:05am

bahut umda rachna hai sir ji .............badhai aapko

Comment by Albela Khatri on June 21, 2012 at 8:19am

waah !

sundar rachna  !

__abhinandan !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 20, 2012 at 10:08pm

बहुत सुन्दर अद्दभुत अप्रतिम रचना के लिए हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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