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नियति तू कब तक खेल रचाएगी ..

नियति तू कब तक खेल रचाएगी

क्या हम सचमुच हैं

तेरे ही कठपुतले

तू जैसा चाहेगी

वैसा ही पाठ सिखाएगी

नियति तू कब तक खेल रचाएगी

कभी कुछ खोया था

कंही कुछ छुट गया था

कभी छन् से कुछ टूट गया था

भीतर जख्मो के कई गुच्छे हैं

गुच्छो के कई सिरे भी हैं

पर उनके जड़ो का क्या

तेरा ही दिया खाद्य  औ पानी था

नियति तू कब तक खेल रचाएगी

कंही कुछ मर रहा है

कंही कुछ पल रहा है

दावानल सा हर कहीं जल रहा है

क्या तुझे नहीं दिखाई दिया है

नियति तू कब तक हाहाकार  मचाएगी

बंद करो मानवता के साथ  

अपना क्रूर हास परिहास

नियति तू एक दिन पक्षताएगी

इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगी 

 उसी पल तू हार जाएगी

खुद से क्या फिर तू आँख मिला पायेगी

शर्म से क्या नहीं  तू  उस  दिन मर जायेगी

नियति तू कब तक खेल रचाएगी  

 

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Comment

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Comment by Albela Khatri on June 4, 2012 at 10:46pm

नियति  के साथ   इतना ओजस्वी संवाद कर के आपने  लाखों लाख  लोगों के मौन को स्वर दिया है . इस महती कार्य के  लिए आपका  और  आपकी लेखनी का अभिनन्दन !

शानदार कविता .........जय हो

Comment by Rekha Joshi on June 4, 2012 at 7:16pm

Mahima ji ,bahut badhiya likha hae aapne 

क्या हम सचमुच हैं

तेरे ही कठपुतले

तू जैसा चाहेगी

वैसा ही पाठ सिखाएगी,badhai 

Comment by chandan rai on June 4, 2012 at 5:00pm
खुद से क्या फिर तू आँख मिला पायेगी
महिमा जी,
शर्म से क्या नहीं तू उस दिन मर जायेगी

नियति तू कब तक खेल रचाएगी
नियति की अच्छी खबर ली है आपने
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 4, 2012 at 4:18pm

स्नेही महिमा जी, सस्नेह 

नियति कि दी चुनौती वाह गजब के भाव. बधाई 

Comment by Yogi Saraswat on June 4, 2012 at 4:09pm

नियति तू एक दिन पक्षताएगी

इंसां जब हिम्मत से जोर लगाएगी 

 उसी पल तू हार जाएगी

खुद से क्या फिर तू आँख मिला पायेगी

शर्म से क्या नहीं  तू  उस  दिन मर जायेगी

नियति तू कब तक खेल रचाएगी 

नियति को हम हमेशा ही कठोर रूप में प्रस्तुत करते हैं ! नियति से ही तो हम हैं , नियति ही है जो हम आज हैं ! बहुत बढ़िया प्रस्तुति आदरणीय महिमा जी !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 4, 2012 at 7:27am

दावानल सा हर कहीं जल रहा है

क्या तुझे नहीं दिखाई दिया है

नियति तू कब तक हाहाकार  मचाएगी

 

niyati ke oopar saare iljaam madh diye aapne aur ye bhi bata diyaa ki insaani taakat jab apna jor lagayegi tab too haath malti rah jaayegi wah waah ..................umda rachna aapki


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 3, 2012 at 11:14pm

हौंसले बढ़ाती  हुई रचना जिसके दिल में इतना होंसला हो उसका नियति भी कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी झुक जायेगी उसके दम के सामने ...बहुत उम्दा भाव ..हाँ एक दो जगह टंकण त्रुटी आ गई हैं शायद पेस्ट करते हुए ठीक कर लें

Comment by MAHIMA SHREE on June 3, 2012 at 11:00pm

आदरणीय उमाशंकर जी .. रचना को पसंद करने और हौसला अफजाई के लिए आभारी हूँ . सधन्यवाद  

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 3, 2012 at 10:54pm

बहुत बढ़िया रचना आपके हौसले को सलाम

आपने नियति से लड़ने हिम्मत दिखाई

खुद से क्या फिर तू आँख मिला पायेगी

शर्म से क्या नहीं  तू  उस  दिन मर जायेगी

नियति तू कब तक खेल रचाएगी 

Comment by MAHIMA SHREE on June 3, 2012 at 10:31pm

आदरणीय लक्ष्मण सर जी .सादर नमस्कार

आपके उत्साहवर्धन के लिए आभारी हूँ  आपके विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए .  सधन्यवाद, स्नेह बनाये रखे.

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