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कुण्डलिया (एक प्रयास)
 
 
आँखों में सपने सजा, होंठों पर मुस्कान
साजन औ सजनी चले, प्रेम डगर अंजान
प्रेम डगर अंजान, संग हों जीवन साथी
रौशन हर इक राह, बने जो दीपक बाती    
नैया होती पार, भले हो तूफाँ लाखों
निष्ठा और कर्तव्य, बसे हों जिनकी आँखों....

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 17, 2012 at 7:17pm

प्राची पढने में थोड़ी  लेट हो गई बाहर गई थी ...बहुत ही सुन्दर कथ्य और शिल्प से कसी हुई सुन्दर भावों से सुसज्जित कुंडली के लिए ढेरों बधाई 

Comment by Bhawesh Rajpal on May 17, 2012 at 6:52pm
आँखों में सपने सजा, होंठों पर मुस्कान
साजन औ सजनी चले, प्रेम डगर अंजान
प्रेम डगर अंजान, संग हों जीवन साथी
रौशन हर इक राह, बने जो दीपक बाती    
नैया होती पार, भले हो तूफाँ लाखों
निष्ठा और कर्तव्य, बसे हों जिनकी आँखों....
 
बहुत सुन्दर  पंक्तियाँ  !  हृदयस्पर्शी  पंक्तियों के  लिए  आपको बहुत-बहुत बधाई प्राची जी  !

              - भवेश राजपाल  ! 
Comment by आशीष यादव on May 17, 2012 at 6:47pm
बहुत सुन्दर कुण्डलिया। भाव कथ्य एवँ शिल्प सबकुछ दुरूस्त।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 17, 2012 at 6:29pm
आदरणीय प्रदीप कुमार कुशवाहा जी
आपकी क्रिकेट समृद्ध टिपण्णी के लिए हार्दिक आभार.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 17, 2012 at 6:24pm
हार्दिक आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी..
आप ज्ञानी अग्रजों द्वारा रचना का अनुमोदन व सराहना, सदैव कथ्य-भाव समृद्ध लेखन के लिए प्रेरित करता है.
पुनः आभार. सादर.
प्राची

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 17, 2012 at 6:21pm
हार्दिक आभार आदरणीय रेखा जी, आपने इस रचना के भाव पक्ष को सराह कर मेरी लेखनी को बल दिया है.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 17, 2012 at 6:16pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय योगराज प्रभाकर जी..
कुण्डलिया छंद लिखना सीख कर मै बहुत प्रसन्न हूँ , और आप सब अग्रजों , गुणीजनों , समृद्ध साहित्यकारों से ज्ञान पा कर कृतज्ञ हूँ ..
इस प्रयास को सराहने के लिए हार्दिक आभार. सादर.
प्राची
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 17, 2012 at 6:04pm

aadarniy prachi ji, sadar.

bhagyshali hain aap ki dono umpiron ne aapko out karar nahi diya. bauhmat hai to third umpire kya kare.

bahut sundar shot 

you are not out 

kriket.. hiq kaesa laga. 

badhai 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 17, 2012 at 5:19pm

कुण्डलियों पर आपका प्रयास, डा. प्राची, निखरा हुआ है. कथ्य और भाव दोनों से समृद्ध इस कुण्डलिया के लिये आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ.

Comment by Rekha Joshi on May 17, 2012 at 4:36pm

आँखों में सपने सजा, होंठों पर मुस्कान
साजन औ सजनी चले, प्रेम डगर अंजान|

प्राची जी अति सुंदर भाव ,बधाई 

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