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गुफ्तगू माँ से (मदर्स डे पर )

माँ 
ये कौन सी  सफलता है 
ये कैसा लक्ष्य है
जो ले आया है
तुमसे दूर 
बहुत दूर
ये कैसी तलाश है
कैसा सफ़र है
की मैं चल पड़ी हूँ 
अकेले ही
तुम्हे छोड़ कर
ये कैसी जिद है मेरी
ठुकरा कर छत्र छाया तेरी
निकल पड़ी हूँ
कड़ी धूप में झुलसने को
पर जानती हूँ
तेरी दुआएं है  साथ मेरे
जो चलती है संग 
मेरा साया बनकर 
और तपिश को
शीतल कर देती है
ठंडी बयार बन कर
आती है याद मुझे तू
हर दिन
हर रात
फिर से तेरे आँचल में छुपने का
दिल करता है
फिर से तेरे हाथो की  
बनी रोटियां खाने को
जी करता है
पर तुमने ही कहा था न माँ
चिड़िया  के बच्चे
जब उड़ना सीख जाते हैं
तो  घोसलों को छोड़
लेते हैं ऊँची उड़ान   
और दूर निकल जाते है
मैं भी तो
निकल आई हूँ
बहुत दूर
लौटना अब मुमकिन नहीं
क्योंकि
राहें कभी मुडती नहीं
और प्रवाह नदी का
उलटी दिशा में
कभी बहता नहीं

Views: 871

Comment

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Comment by MAHIMA SHREE on May 14, 2012 at 3:47pm
माँ एक हसीं साया है
मौसम कोई हो
वट वृक्ष की छाया है
परिंदे लाख भर लें उडान
माँ से ही उनकी पहचान
आदरणीया प्रदीप सर , सादर प्रणाम .. अक्षरश : सहमत हूँ .. ह्रदय से आपका आभार /
Comment by MAHIMA SHREE on May 14, 2012 at 3:44pm
आदरणीया रेखा जी , स्वागत है आपका .. ह्रदय से आभार
Comment by MAHIMA SHREE on May 14, 2012 at 3:43pm
आदरणीय बागी जी , आदरणीय भवेश जी .. सराहना के लिए आप दोनों का ह्रदय से आभार
Comment by MAHIMA SHREE on May 14, 2012 at 3:41pm
आदरणीया राजेश दी , आपको भी बधाई ... सादर आभार
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 14, 2012 at 3:34pm
ठुकरा कर छत्र छाया तेरी
निकल पड़ी हूँ
कड़ी धूप में झुलसने को

पर जानती हूँ

तेरी दुआएं है  साथ मेरे
जो चलती है संग 
मेरा साया बनकर 
और तपिश को
शीतल कर देती है
ठंडी बयार बन कर
आती है याद मुझे तू
हर दिन
हर रात..
बहुत सुन्दर महिमा जी ..माँ की दुवाएं सदा साथ निभाएं ..संघर्ष  तो जीवन है ..हाँ लेकिन चिड़ियों और मनुज में अंतर है वापस लौटा जा सकता है..बहुत सी चिड़ियाँ भी तो बहुत दूर जा कर लौट आती हैं अपने ठिकाने पर .... ठुकराकर न जाया जाए तो और सुन्दर  ...बधाई ..भ्रमर ५ 
Comment by Rekha Joshi on May 14, 2012 at 12:09pm

congratulations ,nicely expressed,

Comment by Ajay Kumar Dubey on May 14, 2012 at 10:11am

पर तुमने ही कहा था न माँ
चिड़िया  के बच्चे
जब उड़ना सीख जाते हैं
तो  घोसलों को छोड़
लेते हैं ऊँची उड़ान   
और दूर निकल जाते है
मैं भी तो
निकल आई हूँ
बहुत दूर
लौटना अब मुमकिन नहीं
क्योंकि
राहें कभी मुडती नहीं
और प्रवाह नदी का
उलटी दिशा में
कभी बहता नहीं
बहुत सुन्दर अभिव्यकि , महिमा जी.
बधाई.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 13, 2012 at 8:46pm
माँ 
ये कैसी सफलता
ये कैसा लक्ष्य है
जो ले आया है
तुमसे दूर 
बहुत दूर
ये कैसी तलाश है
ये कैसा सफ़र है
कि मैं चल पड़ी हूँ 
अकेले ही अकेले
तुम्हे छोड़ कर
ये कैसी जिद है मेरी
ठुकरा कर छत्र छाया तेरी
निकल पड़ी हूँ
कड़ी धूप में झुलसने को
पर जानती हूँ
तेरी दुआएं है साथ मेरे
जो चलती है संग संग
मेरा साया बनकर
बहुत खूब महिमा जी , खुबसूरत अभिव्यक्ति पर आभार |
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 13, 2012 at 3:20pm
प्रिय महिमा , सस्नेह 
माँ एक हसीं साया है 
मौसम कोई हो 
वट वृक्ष जी छाया है 
परिंदे लाख  भर   लें  उडान 
माँ से ही उनकी पहचान 
बधाई,

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 13, 2012 at 12:17pm

हर माँ दिल में बसी होती है चाहे दूर चाहे पास उसका आशीर्वाद साथ रहता है मात्र दिवस की शुभकामनाएं और इस प्यारी रचना के लिए बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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