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तुम्हारा मौन
विचलित कर देता है
मेरे मन को
सुनना चाहती हूँ तुम्हे
और
मुखर हो जाती हैं
दीवारें , कुर्सियां
टेबल , चम्मचे
दरवाजे
सभी तो कहने लगते हैं
सिवाए तुम्हारे

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Comment by राज़ नवादवी on August 9, 2013 at 12:43am

आपका स्वागत है आदरणीया महिमा जी!

Comment by MAHIMA SHREE on August 7, 2013 at 9:10pm

आपका तहे दिल से शुक्रिया आदरणीय नवादवी जी ..आपने अपना कीमती वक्त मेरी रचनाओ को दिया .. आपकी  सुंदर प्रतिकियाएँ रचनाओ को नए आयाम देती हैं ..सहयोग बनाये रखे / सादर

Comment by राज़ नवादवी on August 7, 2013 at 8:05pm

सुनना चाहती हूँ तुम्हे
और
मुखर हो जाती हैं
दीवारें , कुर्सियां
टेबल , चम्मचे
दरवाजे
सभी तो कहने लगते हैं
सिवाए तुम्हारे

- आह.. विवशताएं भी बड़ी खामोशी से बोलती हैं आपकी पंक्तियों में, तनहाई भी जैसे कोई शय है  जिसे छुआ जा सकता हो! घर की बेजान चीज़ें शायद हमें बेहतर समझती हैं!....खूबसूरत पंक्तियाँ महिमा जी !     

Comment by MAHIMA SHREE on May 19, 2012 at 8:33pm
आदरणीय अशोक सर ,आदरणीय नीलांश जी ,
आप दोनों के अनमोल प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ .. स्नेह बनाये रखे    
Comment by Ashok Kumar Raktale on May 18, 2012 at 6:46pm

महिमा जी
          सादर, वाह! क्या बात है.मन के भावों को किस खूबसूरती से शब्द दिए हैं आपने.बधाई.

Comment by Nilansh on May 12, 2012 at 11:42am

bahut hi acchi rachna

ehsaaon ko sameti huin hain

bahut badhai aaapko

Comment by MAHIMA SHREE on May 11, 2012 at 8:52pm

आदरणीय  संदीप जी , आदरणीय  अजय जी आप दोनों की आभारी हूँ/

 
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 11, 2012 at 8:02pm

bahut khoob kya baat hai behad prabhavi maun ................

Comment by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 7:10pm

सुनना चाहती हूँ तुम्हे
और
मुखर हो जाती हैं
दीवारें , कुर्सियां
टेबल , 

Bahut hi sundar abhivyakti Mahima ji....

Comment by MAHIMA SHREE on May 11, 2012 at 5:25pm
//सच में कभी -२ मैं भी चौक जाती हूँ अपने आप से ...//

यह एक सम्यक स्थिति है, महिमाजी, जब एक व्यक्ति से उस व्यक्ति का रचनाकार विलग दीखता हो. बधाई हो...

आदरणीय सौरभ सर .. सच में क्या :) याद रखूंगी .. सादर

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