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खूबसूरत सपनों नें
कितनी रातों को मुझे जगाया,
कंटीले रास्तों पर
बेतहाशा दौड़ाया,
बार-बार गिराया..
फिर भागने के लिए
सम्हल सम्हल उठना सिखाया,
और मैं भागती गयी...
घायल पैरों के
फूटे छालों से
रिसते लहू की
परवाह किये बिना
बस भागती गयी...
पर
हमेशा
सिर्फ दो कदम के फासले पर
मुस्कुराते रहे सपने ..
मुझे भगाते रहे सपने..
हाथ आते ही
फिर रूप बदल
सिर्फ दो कदम से
मुझे ललचाते रहे सपने..
एक न बुझने वाली अगन में
मुझे जलाते रहे सपने..
पर
आज ......
जैसे ही
मन फेर इन सपनों से,

मैं खड़ी हूँ स्वयं की सम्पूर्णता में आनंदित....
तो
ये बेचैन हैं
फूलों की चादर बन
मेरे कदमों तले
बिखर जाने को...
ये सहला रहे हैं
मेरे पैर
अपनी सुकून भरी
ठंडक से...
और
मैं मुस्कुरा रही हूँ
प्रकृति की इस गोपनीयता पर !

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 6, 2012 at 9:40pm

Heartfelt thanks Respected Abhinav Arun Ji, Bhawesh Rajpal Ji.

Comment by Bhawesh Rajpal on May 6, 2012 at 2:53pm
अति सुन्दर !  मरीचिका  की भाँति ललचाते हुए  हमारा मन हमें अनजानी राहों पर आकर्षित करता रहता है , अंत में शून्य !
अपनी राह स्वयं बना कर  सपनों को  हमारा पीछा करने दो  !
मेरी ओर से - बहुत सुन्दर रचना के लिए  ढेरों बधाईयाँ  स्वीकार करें  ! ससम्मान  ! 
Comment by Abhinav Arun on May 6, 2012 at 2:02pm

और
मैं मुस्कुरा रही हूँ
प्रकृति की इस गोपनीयता पर !

सुन्दर मनोरम भावपूर्ण  रचना हार्दिक बधाई !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 6, 2012 at 11:24am
heartfelt thanks respected Jawahar lal ji, Surender Kumar Ji, Pradeep Kushwha Ji.
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 6, 2012 at 6:40am

डॉ  प्राची जी ..ये सपने भी सच में न जाने कितने रंग दिखाते हैं..कभी गुदगुदा के हंसाते हैं तो कभी सब कुछ होते हुए भी रुलाते हैं   ..कुछ तो सच हो जाएँ ये अधूरे सपने .खुशनुमा ... शुभ कामनाएं!

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 6, 2012 at 12:04am

सिर्फ दो कदम के फासले पर
मुस्कुराते रहे सपने ..
मुझे भगाते रहे सपने..
हाथ आते ही
फिर रूप बदल
सिर्फ दो कदम से
मुझे ललचाते रहे सपने..
एक न बुझने वाली अगन में
मुझे जलाते रहे सपने..

डॉ  प्राची जी ..ये सपने भी सच में न जाने कितने रंग दिखाते हैं..कभी गुदगुदा के हंसाते हैं तो कभी सब कुछ होते हुए भी रुलाते हैं   ..कुछ तो सच हो जाएँ ये अधूरे सपने .खुशनुमा ... शुभ कामनाएं ..जय श्री राधे -भ्रमर ५ 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 5, 2012 at 1:05pm

और मैं भागती गयी...
घायल पैरों के
फूटे छालों से
रिसते लहू की
परवाह किये बिना
बस भागती गयी...

और
मैं मुस्कुरा रही हूँ
प्रकृति की इस गोपनीयता पर !

बहुत सुन्दर ,भाव दिल को छू गए  बधाई.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 5, 2012 at 12:20pm

Thanks for appreciation Asheesh Yadav Ji, Kumar Gaurav Ji.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 5, 2012 at 12:18pm

हार्दिक आभार आदरणीय rajesh kumari जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 5, 2012 at 12:18pm

हार्दिक आभार आदरणीय योगराज जी

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