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इन्तजार की अवधि

मृत्यु जब तक तुम्हे
वरण नहीं कर लेती
तब तक करो इन्तजार
रखो अटल  विश्वास

गले लगा लो
सारी  प्रवंचनाएं

मत ठुकराओ
दुनियावी बंधन
मान-अपमान की  पीड़ाएँ
भीड़ व् अकेलेपन की दुविधाएं
सभी अपना लो
सदियों की  धूल

लगा लो माथे पे
चूम लो सारे
अनुग्रह -आग्रह
बाँहे फैला कर
स्वीकार कर लो
जिसे व्यर्थ समझ
ठुकराया था अब तक
क्योंकि तभी आसां हो  पाएगी
मृत्यु के इन्तजार की  अवधि

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Comment

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Comment by MAHIMA SHREE on March 30, 2012 at 1:40pm
आदरणीय प्राची जी
नमस्कार...पहले तो आपका स्वागत है....समय निकाल कर आपने पढ़ा और फिर गहन विश्लेषण के साथ सुंदर सामाधान का रास्ता भी सुझाया....सत्य कहा आपने जीवन और मृत्यु के बीच जो opportunity हमे मिलती उससे अपने जीवन को विस्तार देकर मनुष्य भाव से ऊपर उठकर अमरत्व की और बढ़ने का परस होना चाहिए , और भारतीय जीवन दर्शन आरम्भ से ही इसी को जीवन का उदेश्य बताती आई है...आपका बहुत -२ हार्दिक धन्यवाद.....साभार...
...
Comment by MAHIMA SHREE on March 30, 2012 at 1:27pm
आदरणीय अशोक सर,
आपका हार्दिक धन्यवाद ...
Comment by MAHIMA SHREE on March 30, 2012 at 1:25pm
आदरणीय प्रदीप सर
सादर प्रणाम , आपका आशीर्वाद यूँही हमेशा मिलता रहे यही कामना के साथ.....हार्दिक धन्यवाद.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 30, 2012 at 10:30am

dharshnikta ki soch liye hue aapki rachna bahut pasand aai.

Comment by Ashok Kumar Raktale on March 30, 2012 at 8:08am

महिमा जी,
                 सत्य को स्वीकारती सुन्दर रचना. बधाई.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 29, 2012 at 11:19pm

snehi mahima ji, saadar gathe hue sundar bhav ki rachna. badhai.

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