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गज़ल - फरियाद करने जा रहे हो

और किसको शाद करने जा रहे हो

क्यों  मुझे बरबाद करने जा रहे हो

 

बज्म में चर्चा मेरी बदनामियों का  

और  तुम इरशाद करने जा रहे हो

 

जो हकीकत थी सुनानी तुम उसे ही

अन- कही रूदाद करने  जा  रहे हो

 

जिस चमन में फूल नफरत के उगे हैं

तुम  उसे  आबाद करने  जा रहे हो

 

ठोकरों  से  चोट खाकर पत्थरों  के

द्वार  पर फरियाद  करने जा  रहे हो

 

 

..................................... अरुन श्री !

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Comment by MAHIMA SHREE on March 26, 2012 at 10:54am
फूल नफरत के उगाता है चमन वो
तुम उसे आबाद करने जा रहे हो
बहुत खूब.....नमस्कार अरुण जी सर्वप्रथम आपको मेरी बहुत -२ बधाई पुरस्कार केलिए ....
Comment by Arun Sri on March 26, 2012 at 10:50am

वीनस केसरी सर , आपकी सराहना से मन अभिभूत हुआ ! आपसे शिल्पगत बारीकियों के बारे में जानकारी की  अपेक्षा है ! सादर !

Comment by Arun Sri on March 26, 2012 at 10:49am

राजेश कुमारी मैम , सराहना के लिए धन्यवाद !

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 25, 2012 at 8:35pm

shandar bhav yukt gajal. badhai .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 25, 2012 at 7:00pm

भाई अरुण जी, आपकी इस ग़ज़ल से मन तर गया. शिल्प और कहन दोनों तरह से यह ग़ज़ल कसी हुई है.

वैसे सतत अभ्यास आपकी संप्रेषणीयता को और कस देगी, जिसका मुझे अदम्य विश्वास है. ऐसा इसलिये कह रहा हूँ कि फूल नफ़रत के उगाता है चमन वो   में वो भरती का लग रहा है. लेकिन बज़्म में चर्चा .. वाला शे’र बहुत पसंद आया है. यह शे’र मसल की तरह प्रयुक्त होगा.

बहुत-बहुत शुभकामनाएँ. आपका प्रयास यों ही निरंतर रहे.

Comment by वीनस केसरी on March 25, 2012 at 2:19pm

बेहतरीन ग़ज़ल के लिए तहे - दिल से ढेरो दाद क़ुबूल करें

यह हासिले ग़ज़ल शेर लगा ---

बज्म में चर्चा मेरी बदनामियों का  

और  तुम इरशाद करने जा रहे हो

 
वाह वाह वा


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 25, 2012 at 1:26pm

vaah vaah lajabaab ghazal Arun ji daad kabool karen.

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