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चेहरे के पीछे
चेहरे है
उन पे कसे नकाब
बड़े तगड़े है..
मीठे बोलो के भीतर
तीखेपन का खंजर है..
घावों पे मरहम तो है
पर दाग बने गहरे है
लोग बने मदारी है.. और
समझे हमे जमूरा
मतलब की यारी है और
जमकर सीनाजोरी है
संभल संभल के हँसना है और
नाप तोल के कहना
मन के दुखड़े खोले तो
कहते है रोना धोना
खुल के जीने का
दम भर लो कितना भी
पर बच बच के है रहना
दुनिया गर नाटक है तो
हम कब तक रहेगे एक्टर
कभी तो आने दो हमको
जो है हम
हम बन कर ....

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Comment

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Comment by MAHIMA SHREE on March 28, 2012 at 4:03pm
आदरणीया सीमा जी
सही कहा आपने " आज के दौर में हम बहुत कुछ हैं बस "हम" ही नहीं हैं .....एक अंतराल के बाद इस "हम" की तलाश भी मुश्किल हो जाती है"
क्योकि हम दुनियावी दिखावे में स्वय को कब खो चुके होते है पता नहीं चलता....और जिंदगी बीत चुकी होती है... आपकी बहुमूल्य प्रतिकिर्या के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद् .. साभार
Comment by MAHIMA SHREE on March 26, 2012 at 10:46am
नीरज सर हार्दिक आभार....
Comment by MAHIMA SHREE on March 15, 2012 at 5:40pm
नमस्कार चातक जी
आपका बहुत -२ धन्यवाद् ....आपको पसंद आई सराहा ...आभारी हूँ
Comment by Chaatak on March 14, 2012 at 10:52pm

महिमा जी, बहुत ही खूबसूरती से जीवन का फलसफा शब्दों मे पिरोया है आपने| हार्दिक बधाई!

Comment by MAHIMA SHREE on March 13, 2012 at 3:21pm
आदरणीया कुमारी जी
आपका हार्दिक धन्यवाद्... स्नेह बनाये रखे..

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 13, 2012 at 2:53pm

bahut sundar bhaav hain rachna me ...bahut khoob

Comment by MAHIMA SHREE on March 13, 2012 at 2:44pm
वाहिद साहब नमस्कार
आपका बहुत-२ धन्यवाद् ...मुझे आपलोगों की बातो का ध्यान है .....पर छंद में लिखने के नियम आप सबको ही बताना होगा....:)
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 13, 2012 at 2:13pm

सदैव की भांति एक सुन्दर प्रस्तुति महिमा जी| समाज का व्यक्ति के प्रति नज़रिया बख़ूबी उभर कर सामने आया है| राकेश जी की बात पर भी थोड़ा ध्यान दीजियेगा| :-)

Comment by MAHIMA SHREE on March 13, 2012 at 1:04pm
आदरणीय योगराज सर...
आपकी आभारी हूँ...हर बार की तरह आपने मेरी रचना को सराहा है...उसे समझा ..स्नेह बनाये रखे..धन्यवाद्.

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on March 13, 2012 at 11:58am

अंतर्मन की की छटपटाहट को शब्दों में ढाल कर बहुत सुन्दर काव्य अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है महिमा जी, बधाई स्वीकारें.

कृपया ध्यान दे...

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