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सच्चाई को खोजने चला था,

झूठ ही झूट मिले,

मोहब्बत खोजने चला,

तो बेवफाई मिली,

जब खोजना छोड़ दिया,

तो तन्हाई मिली,

अब तो खुदी को खोजने चला हूँ ,

जो चाहा था बेवजह था

जो मिला है बेइंतहा है

यूही भटक रहा था

अब सकून ही सकून है |

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Comment

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Comment by Sanjeev Kulshreshtha on March 3, 2012 at 3:33pm

Thanks to all for appreciation

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on March 3, 2012 at 12:35pm

सच्चाई को खोजने चला था,

झूठ ही झूट मिले,

हार्दिक बधाई 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on March 3, 2012 at 10:50am

सुन्दर भावों से सजी इस रचना के लिए बधाई स्वीकार करें संजीव जी .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 2, 2012 at 10:58pm

आत्मान्वेषण से ही परम की प्राप्ति का आधार तय होता है.  भाव-पक्ष से समृद्ध रचना है.

बधाई.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 2, 2012 at 12:13pm

अब सकून ही सकून है .. बहुत अच्छे संजीव जी|

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 2, 2012 at 11:35am

bekar ke kaam karenge , kuch nahi milega.

sakoon mil gaya, 

badhai.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 2, 2012 at 10:24am

अच्छी रचना संजीव जी, प्रयास करते रहिये, और भी बढ़िया लिख सकते है, बधाई स्वीकार करें |

Comment by Monika Jain on March 1, 2012 at 11:06pm
Bahut hi sundar panktiyan likhi hai. aaj ke jeevan me chahte puri nahi hoti aur insaan unhen pura karne ki chahat me bhagta rehta hai aur jese hi talash chhod to kai baar puri ho jaati hai ati sundar :)

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