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हुए थे सूरमा कई, जो खेले थे जान पर ,

उनके ही प्रताप से , ये देश स्वतंत्र है |
न हो तानाशाह कोई, जनता का राज हो ,
दे संविधान बनाया , इसे गणतन्त्र है |
अधूरे रहे सपने , जनता लाचार हुई ,
न रहा ईमान कहीं , भ्रष्ट - सा तन्त्र है |
बचे नहीं भ्रष्ट कोई , हो न यहाँ कष्ट कोई , 
देश मेरा जान मेरी , गाना यही मन्त्र है |

                  -------- दिलबाग विर्क 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 17, 2012 at 5:04pm

एक बेहतर कोशिश है दिलबाग़जी.  आप छंदों पर अच्छा प्रयास कर रहे हैं.  निरंतरता बनाये रखें.   शुभकामनाएँ और शुभेच्छा.

 

सुझाव : आप ’इसे गणतन्त्र है’ को ’यही गणतन्त्र है’  क्यों न कर दें ?


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 17, 2012 at 3:28pm

बहुत सुन्दर घनाक्षरी कही है आदरणीय दिलबाग जी, दिल से बधाई.

Comment by Nazeel on January 17, 2012 at 12:09pm

बहुत बढ़िया दिलबाग जी

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