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गीत: आपकी सद्भावना में... संजीव 'सलिल'

निवेदन:

आत्मीय !

वन्दे मातरम.

जन्म दिवस पर शताधिक मंगल कामनाएँ भाव विभोर कर गयी. सभी को व्यक्तिगत आभार इस रचना के माध्यम से दे रहा हूँ.

मुझसे आपकी अपेक्षाएँ भी इन संदेशों में अन्तर्निहित हैं. विश्वास रखें मेरी कलम सत्य-शिव-सुन्दर की उअपसना में सतत तत्पर रहेगी. विश्व वाणी हिन्दी के सभी रूपों के संवर्धन हेतु यथाशक्ति उनमें सृजन कर आपकी सेवा में प्रस्तुत करता रहूँगा.

पाँच वर्ष पूर्व हिन्दीभाषियों की संख्या के आधार पर हिन्दी का विश्व में दूसरा स्थान था, अब सातवाँ है. कारण मात्र यह है कि हिन्दीभाषी अपनी मातृभाषा के रूप में हिंदी के रूपों (भोजपुरी, अवधी, बृज, मैथिली, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, मारवाड़ी, शेखावाटी, काठियावाड़ी, हरयाणवी, कन्नौजी, बुन्देली, बघेली, उर्दू आदि) बताने लगे हैं. हिन्दी का कोई भी रूप अपने आप में विश्व भाषा बनने में सफल न हो सकेगा, किन्तु समस्त रूप मिलकर हिन्दी विश्व बन सकेगी.

दूसरी ओर समस्त ईसाई बन्धु, प्रशासक, अधिकारी और अंगरेजी माध्यम से शिक्षित युवा अंगरेजी को और मुस्लिम बन्धु उर्दू अपनी भाषा बता रहे हैं.इस स्थिति में अग्रेजीभाशियों की संख्या अधिक होने का कुतर्क देकर और जमीनी वास्तविकताओं को नज़रंदाज़ कर अंगरेजी को सरकारी काम-काज और संपर्क भाषा बनाने का प्रयास निरंतर बलवान हो रहा है.हम आज न सम्हाले तो अपने पाँव पर खुद कुल्हाडी मार लेंगे. हिंदी के विविध रूपों को अपनी पहचान हिंदी के अंग के रूप में बननी है, जैसे बच्चों की पहचान माता-पिता से होती है. मातृभाषा के रूप में हिन्दी ही लिखें. जरूरी लगे तो कोष्ठक में रूप विशेष लिखें अन्यथा रूप विशेष को हिंदी ही मानें. राजनेता दक्षिण में हिन्दी विरोध और उत्तर में हिन्दी के आंचलिक रूपों को अपने राजनैतिक स्वेथों का आधार बना रहे हैं. वे जन सामान्य को उकसा-भड़काकर अपने लिये मतों का जुगाड़ कर रहे हैं. हम साहित्यकारों को समर्पित भाव से हिन्दी में निरंतर श्रेष्ठ तथा सामयिक सृजन, अन्य भाषाओँ से / में अनुवाद तथा तकनीकी विषयों में लेखन के साथ-साथ नए शब्दों को गढ़ने का कार्य निरंतर करना होगा. अस्तु... रचना का आनंद लें :

गीत:

आपकी सद्भावना में...

संजीव 'सलिल'
*

आपकी सद्भावना में कमल की परिमल मिली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
*
उषा की ले लालिमा रवि-किरण आई है अनूप.
चीर मेघों को गगन पर है प्रतिष्टित दैव भूप..
दुपहरी के प्रयासों का करे वन्दन स्वेद-बूँद-
साँझ की झिलमिल लरजती, रूप धरता जब अरूप..

ज्योत्सना की रश्मियों पर मुग्ध रजनी मनचली.
हृदय-कलिका नवल आशा पा पुलककर फिर खिली.....
*
है अमित विस्तार श्री का, अजित है शुभकामना.
अपरिमित है स्नेह की पुष्पा-परिष्कृत भावना..
परे तन के अरे! मन ने विजन में रचना रची-
है विदेहित देह विस्मित अक्षरी कर साधना.

अर्चना भी, वंदना भी, प्रार्थना सोनल फली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
*
मौन मन्वन्तर हुआ है, मुखरता तुहिना हुई.
निखरता है शौर्य-अर्णव, प्रखरता पद्मा कुई..
बिखरता है 'सलिल' पग धो मलिनता को विमल कर-
शिखरता का बन गयी आधार सुषमा अनछुई..

भारती की आरती करनी हुई सार्थक भली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
*******
दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 22, 2010 at 3:35pm
आपकी सार्थक भूमिका के साथ उच्च कोटि की रचना के लिए साधुवाद.
भारती की आरती में मुखरित स्वर गुँजायमान हों और वातावरण क्लेषरहित हो..
हिन्दी की दुर्दशा के सही दोषी और जिम्मेदार हम नहीं तो और कौन हैं .. भाषा की बात तो छोड़िए, हमारे साथ के लोग शब्दों तक से दरिद्र हो चुके हैं. स्थिति विकट है. मगर आशा की किरण है आप जैसे संवेदनशील और उत्तरदायी अग्रजों की सचेत करते प्रयास.
आभार.
Comment by आशीष यादव on August 22, 2010 at 9:16am
salil ji pranaam,
ekdam sahi baat kahi hai aapne. aapne is kriti se tamaam logo ko sachet kiya jo maatri bhasha ke pyaar me padkar wastwik maatribhasha ko, in sabki janani ko bhul rahe hai. maaf kijiyega mai bhi is shreni me tha. ab mai aap ke kathananushaar hi karunga.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 22, 2010 at 8:36am
आचार्य जी सादर प्रणाम

अपने बिलकुल सही कहा है की यदि हिंदी को मान दिलाना है तो क्षेत्रीय भाषाओँ की बजाय मातृभाषा हिंदी ही लिखना पड़ेगा..आखिर वह भी हिंदी की ही अन्य रूप है| हिंदी भाषा के पतन के प्रति जिम्मेदार कारणों के लिए आपका विश्लेषण सटीक है|

गीत बहुत सुन्दर है, सुन्दर संदेशो को समाहित किये हुए है|
अपना स्नेह यथावत ही बनाये रखे
सादर

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 22, 2010 at 7:47am
आदरणीय आचार्य जी , अपनी जन्मदिन पर प्राप्त शुभकामनाओं के प्रतिउत्तर मे बहुत ही प्यारा, ज्ञानवर्धक और मनमोहक रचना दी है, साधुवाद,
Comment by Pankaj Trivedi on August 21, 2010 at 10:33pm
आदरणीय सलिलजी,
आपने - "आपकी सद्भावना में..." गीत के द्वारा भारतीय संस्कृति, हमारी भाषा समृद्धि और संस्कारिता को उजागर करते हुए हिंदी भाषा की चिंता भी की है | बहुमूल्य प्रदान के लिएँ बधाई |

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