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हाल- ए- दिल ऊंचे महलों से पूछो जरा,
मस्तियाँ बादलों की कैसी उन्हे लगती हैं,

जब सावन की पहली पड़ती फुहार,
धरा ख़ुशी से सोंधी खुशबू बिखेरती,
बच्चे उछलते कूदते मचलते खेलते,
चेहरे किसानो के उम्मीदों से चमकते,

हाल- ए- दिल झोपड़ियो से पूछो जरा,
आंशु बन बारिश छपरों से टपकती है,

खूब बारिश हुई भरी नदिया और ताल ,
मचलती तितलियाँ भी आँचल संभाल,
हवाओं को भी देखो चलती मदभरी,
दीवाना बनाने को हमें हठ पर अड़ी,

हाल- ए- दिल उन बस्तियों से पूछो जरा,
जिन्दगी जिनकी किनारों पर गुजरती हैं,

जवान होती है शहरो की नशीली रात ,
आँखों आँखों में कटती कही काली रात,
तेज धुन पर कही आहा करते है लोग ,
भय के कारण कही आह करते है लोग,

हाल- ए- दिल भूखे बच्चों से पूछो जरा,
गीले चूल्हों मे जब भींगी लकड़ियाँ जलती है,

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 11, 2010 at 3:49pm
आदरणीय बृजेश त्रिपाठी जी का आशीर्वाद वो भी इस रूप मे पा कर मैं तो धन्य हो गया , बहुत बहुत धन्यवाद, आप के आशीर्वाद की हमे आवश्यकता है, कृपया क्षत्रछाया बनाये रखे ,

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 11, 2010 at 3:19pm
बहुत बहुत धन्यवाद नीलम दीदी हौसलाफजाई के लिये,
Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on August 11, 2010 at 3:03pm
खूब बारिश हुई भरी नदिया और ताल ,
मचलती तितलियाँ भी आँचल संभाल,
हवाओं को भी देखो चलती मदभरी,
दीवाना बनाने को हमें हठ पर अड़ी,

हाल- ए- दिल उन बस्तियों से पूछो जरा,
जिन्दगी जिनकी किनारों पर गुजरती हैं,
वाह वाह गणेश जी,,,,बरसात को भी मानवीय संवेदनाओं से जोड़ दिया ...
क्षमा करना कुछ हॉस्पिटल की व्यस्तता,और कुछ नेट की परेशानी ...मै कमेन्ट नहीं दे पाया लेकिन अब मैं प्रयास करता हूँ नियमित रहने का ....आपकी वर्तमान रचना उच्च कोटि की साहित्यिक धरोहर है संवेदनाओं की मूर्तिमान प्रस्तुति ...बधाई गणेश जी
Comment by Neelam Upadhyaya on August 11, 2010 at 9:55am
हाल- ए- दिल झोपड़ियो से पूछो जरा,
आंशु बन बारिश छपरों से टपकती है,

हाल- ए- दिल उन बस्तियों से पूछो जरा,
जिन्दगी जिनकी किनारों पर गुजरती हैं,

हाल- ए- दिल भूखे बच्चों से पूछो जरा,
गीले चूल्हों मे जब भींगी लकड़ियाँ जलती है,

बहुत ही सजीव और हृदय को छू लेने वाली रचना है । सामाजिक असमानता का सजीव चित्रण ।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 11, 2010 at 9:19am
आदरणीय गुरुदेव श्री योगराज प्रभाकर जी, रवि कुमार गुरु जी , बड़े भाई मनोज कुमार झा जी और बब्बन पाण्डेय जी,परम मित्र अजीत त्रिपाठी जी, अनुज सह मित्र प्रीतम तिवारी जी और आशीष यादव जी, मेरी प्यारी बड़ी बहन आशा पाण्डेय जी, आप सब के प्यार और आशीर्वाद से मै अभिभूत हूँ क्या कहू जितना प्यार दुलार आप सब से मिल रहा है वो और कही मिलना कठिन है, आज मुझे गर्व हो रहा है कि मैने OBO का मंच तैयार किया और आप सब ने उसे परिवार बना दिया , जय हो |
Comment by आशीष यादव on August 11, 2010 at 12:47am
wah ketna badhiya chitran kaeele baani raaur,
bahut sundar
Comment by baban pandey on August 10, 2010 at 11:24pm
महलों वाले क्या जाने ...सावन की बारिस का आनंद .....
सजीब चित्रण है भाई
Comment by Ajeet Kr Tripathi on August 10, 2010 at 9:02pm
wah Ganesh ji kya likha hai aap ne
हाल- ए- दिल झोपड़ियो से पूछो जरा,
आंशु बन बारिश छपरों से टपकती है,
Bahut khub
Comment by asha pandey ojha on August 10, 2010 at 7:26pm
वाह गणेश भैया बड़ी विवधता है इस बार तो खूब है ..कंही सावन की मस्ती ,कंही झोंपड़ियों का दर्द ,कंही शर की विलुप्त होती संस्कृति तो कंही धनवानों का मद आज तो एक ही बगिया में कई फूलों की महक को महसूस किया हमने बहुत खूब

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 10, 2010 at 7:22pm
बही भाई, बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने ! वर्षा ऋतु में जहाँ प्राय: अन्य कवियों की कलम मस्ती के गीत गाती है वहीँ आपने बिलकुल नए तरीके से इसका मानवीय चित्रण किया है जो मन को छू गया ! साधुवाद आपको इस सारगर्भित रचना के लिए !

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