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धारावाहिक कहानी :- मिशन इज ओवर (अंक-२)

मिशन इज ओवर (कहानी )

लेखक -- सतीश मापतपुरी

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  • अंक - दो

                   इंसान अगर जीने का मकसद खोज ले तो निराशा स्वत: दम तोड़ देगी. विकास को निराशा के गहरे अँधेरे कुंए में आशा की एक टिमटिमाती रोशनी नज़र आई,उसने मन ही मन सोचा -" क्यों न एड्स के साथ जी रहे लोगों के पुनर्वास और उनके प्रति लोगों के दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव को अपने जीवन का मकसद बना लूँ ?"................. और धीरे -धीरे यह सोच दृढ़ संकल्प बन गया. विकास ने महसूस किया कि उसकी जिजीविषा अंगड़ाई लेकर जाग उठी है. उसने खुद को हल्का महसूस किया.

आज कई रोज के बाद विकास शाम को कमरे से बाहर निकला और सुनीता से मिलने मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल जा पंहुचा I उसने सुनीता को बिना वजह बताए अपने गाँव जाने की बात बताई और बिना उसका जवाब सुने, बिना उसकी तरफ देखे, वहाँ से वापस हो लिया I उसने सुनीता को कुछ कहने का मौका नहीं दिया I उसकी कानो में क्रमशः क्षीण पड़ती जा रही सुनीता की आवाज़ अभी भी आ रही थी- 'विकास सुनो ......विकास रुको............ विकास रुका तो I ' लेकिन न तो वह रुका और न ही पलट कर सुनीता की तरफ देखा I चलते समय उसने सुनीता को अपना कोई पता-ठिकाना भी नहीं बताया था I

 

अब विकास के सामने उसके जीवन का मकसद और भी स्पष्ट हो चुका था I वह जानता था कि इस मकसद को अमली-जामा पहनाने में उसके बचपन का मित्र रहमत अली मदद कर सकता है I रहमत अली जन-सेवा एवं समाज-सेवा के लिए स्वयं को समर्पित कर चुका था I

विकास गाँव आकर रहमत अली से मिला I वह मन ही मन काफी देर से सोच रहा था कि रहमत से अपनी बात कहे तो कहे कैसे? अगर ईरादा पक्का हो तो राहें खुद-ब-खुद निकल आती हैं I दोनों बातचीत करते हुए गाँव के मध्य से गुजर रहे थे, अचानक कुछ शोरगुल सुनायी पड़ा I एक घर के सामने भीड़ लगी हुई थी I दोनों उस घर के सामने आकर खड़े हो गए I गाँव में रहमत अली की न सिर्फ प्रतिष्ठा थी बल्कि वह लोगों में काफी लोकप्रिय भी था I ग्रामोत्थान ,नारी-जागरण ,साक्षरता जैसी कई स्वयं सेवी संस्थायें रहमत अली के संरक्षण में चल रही थीं I वहां पहुचने पर दोनों को मालुम हुआ कि रामलाल अपने छोटे भाई श्यामलाल को घर से निकाल रहा है और गाँव वाले भी रामलाल का ही साथ दे रहें हैं I पूछने पर रामलाल ने रहमत अली को बताया कि-'मेरे भाई को एड्स हो गया है,अब भला मैं इसे घर में कैसे रख सकता हूँ?'

विकास की आशा के विपरीत रहमत अली इस मामले पर खामोश रह गया ................................................................

क्रमश:

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Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 5, 2011 at 11:31pm

बहुत अच्छी कहानी लिखी आपने !बहुत बहुत बधाई आपको !  किसी भी परिस्थिति में इंसान को हार नहीं माननी चाहिए विकट से विकट स्थिति में भी इंसान को जीने के लिए कोई न कोई मिशन मिल ही जाता है ! :-)

Comment by satish mapatpuri on August 13, 2011 at 1:02am

जय हो गुरूजी, आप मिशन इज ओवर का हर अंक पढ़ रहे हैं,इसके लिए शुक्रिया.

रविजी, हर लेखक -कवि अर्थात साहित्यकार अपने युग का प्रतिनिधि होता है, वह वही लिखता है -जो समाज में घटित होता है. आपने अपना बहुमूल्य समय निकाल कर मेरी कहानी पढ़ी और अपनी राय व्यक्त की, इसके लिए बहुत -बहुत धन्यवाद.

परम आदरणीय सौरभजी, आपकी सराहना से मुझे प्रेरणा मिलती है, धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 12, 2011 at 2:56pm

घटनाक्रम का टेम्पो बहुत ही फास्ट रखा है आपने, सतीशभाई.  तीसरे अंक का एकदम से इंतज़ार है..

बहुत अच्छे, सतीशभाई. शुभ-शुभ.. ..

 

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 12, 2011 at 9:27am

aapne kya jan jagran abhiyan chalaya hai .....is kahani ke madhyam se ......padkar achha laha badhai swikaar karen aur saath hi naman..........

Comment by Rash Bihari Ravi on August 11, 2011 at 2:28pm

bahut badhia apna dost se bole ki nahi bole tensan de diye bhai 

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