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2122 1212 22/112

जितनी क़िस्मत में थी लिखी रोटी
सबको उतनी ही मिल सकी रोटी

मुफ़्लिसी, भूख, दर्द, दुख, आंसू
हां, बहुत कुछ है बोलती रोटी

याद परदेस में भी आती है
मां के हाथों की वो बनी रोटी

ज़ाइक़ा कुछ अलग ही है इनका
वो नमक-मिर्च, वो दही-रोटी

रो रहा है सड़क पे इक बच्चा-
'दो दिनों से नहीं मिली रोटी'

कीं बहुत 'ज़ैफ़' कोशिशें हमने
बन न पाई वो गोल-सी रोटी

(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Zaif on November 19, 2022 at 4:24pm

आ. सौरभ सर, बहुत शुक्रिया आपका। सादर।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 19, 2022 at 8:39am

कीं बहुत 'ज़ैफ़' कोशिशें हमने
बन न पाई वो गोल-सी रोटी.. 

बहुत कमाल का शेर बन पड़ा है, भाई जैफ जी. 

प्रयासरत रहें और प्रयास करें, रदीफ कुछ नया-सा हो जिससे कहन को नये आयाम मिल सकें. 
शुभ-शुभ

Comment by Zaif on November 18, 2022 at 7:16pm

आ. लक्ष्मण जी, बहुत शुक्रिया। सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 16, 2022 at 6:44pm

आ. भाई जैफ जी, अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Zaif on November 12, 2022 at 1:24am

रचना मैम, बहुत शुक्रिया आपका।

Comment by Rachna Bhatia on November 10, 2022 at 2:12pm

वाह वाह बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई बधाई।

Comment by Zaif on November 8, 2022 at 11:11pm

बहुत शुक्रिया समर सर जी, आभार।

Comment by Samar kabeer on November 8, 2022 at 5:24pm

जनाब ज़ैफ़ जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

हां--'हाँ'

मां--'माँ'

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