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निर्णय तुम्हारा निर्मल

तुम जाना ...भले जाना

पर जब भी जाना

अकस्मात

पहेली बन कर न जाना

कुछ कहकर

बता कर जाना

जानती हो न, चला जाता है

अनजाने चुपचाप

क्षण में

क्षंण का जीवन

बरसती-गिरती बूँद क्या जाने

अथाह सागर की गहराई

मेरी आँखों के छोर बन्द करती-सी

तुम्हारी बर्फ़ीली पथरीली कठोर चुप्पी

हो तुम मुझसे दूर कहीं पर

उलझ-उलझ कर, छान-बीन कर

खोल देता हूँ स्मृतियों के वातायन

देखे हैं उर के आँगन में

छायामय अनमनी उदासी लिए

सहज सरल परिवर्तन अनेक

पर बिखर-बिखर छलक-छलक

लगता है इस बार मैं

चलती गाड़ी की खिड़की से 

बाहर धकेल दिया गया हूँ

            ----------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on March 27, 2022 at 11:37am

प्रिय समर कबीर जी और बॄजेश कुमार जी। रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।

सादर,

विजय निकोर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 17, 2021 at 8:18pm

आदरणीय विजय हमेशा की तरह एक बेहतरीन भावपूर्ण कविता...बधाई

Comment by Samar kabeer on December 10, 2021 at 3:04pm

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब, हमेशा की तरह सुंदर रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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