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ग़ज़ल नूर की - मेरी ज़ीस्त की कड़ी धूप ने मुझे रख दिया है निचोड़ कर

.
मेरी ज़ीस्त की कड़ी धूप ने मुझे रख दिया है निचोड़ कर,
अभी शाम ढलने ही वाली थी कोई चल दिया मुझे छोड़ कर.
.
मैं था मुब्तिला किसी ख़ाब में किसी मोड़ पर ज़रा छाँव थी
उसे ये भी रास न आ सका सो जगा गया वो झंझोड़ कर.
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मेरे दिल में अक्स उन्हीं का था उन्हें ऐतबार मगर न था 
कभी देखते रहे तोड़ कर कभी दिल की किरचों को जोड़ कर.   
.
जो  किताब ए ज़ीस्त में  शक्ल थी वो जो नाम था मुझे याद है  
वो जो पेज फिर न मैं पढ़ सका जो रखा था मैने ही मोड़ कर. 
.
तू है शम्स तो ये समझ भी ले तेरी सल्तनत है तेरा फ़लक
मेरा मश्वरा है तू ‘नूर’ से न जलाने जलने की होड़ कर.
.
निलेश 'नूर'
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 4, 2021 at 5:32pm

धन्यवाद आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर साहब 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on December 4, 2021 at 3:43pm

जनाब निलेश शेवगाँवकर जी आदाब, मुश्किल ज़मीन में बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने, मुबारकबाद पेश करता हूँ।

हासिल-ए-ग़ज़ल शे'र -  "मेरे दिल में अक्स उन्हीं का था उन्हें ऐतबार मगर न था

                                  कभी देखते रहे तोड़ कर कभी दिल की किरचों को जोड़ कर" बहुत ख़ूब।  सादर। 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 28, 2021 at 6:55pm

धन्यवाद आ. लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2021 at 6:24pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन। बहुत खूब गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 23, 2021 at 9:29am

धन्यवाद आ. सालिक गणवीर जी

Comment by सालिक गणवीर on November 22, 2021 at 7:02pm

भाई Nilesh Shevgaonkar जी
सादर नमस्कार
बहुत उम्दः ग़ज़ल कही है आपने ,शैर दर शैर मुबारक़बाद क़ुबूल करें

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 21, 2021 at 8:58am

शुक्रिया आ. गुरप्रीत सिंह जी 

Comment by Gurpreet Singh jammu on November 20, 2021 at 11:39am

मेरे दिल में अक्स उन्हीं का था उन्हें ऐतबार मगर न था 
कभी देखते रहे तोड़ कर कभी दिल की किरचों को जोड़ कर.   

वाह वाह आदरणीय नीलेश सर जी, क्या ही लाजवाब शेर कहा आपने। इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई।

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