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ग़ज़ल-घर बसाना था

2122 / 1212 / 22



1

दिल का रिश्ता यूँ भी निभाना था

फिर से रूठा ख़ुदा मनाना था

2

चार ईंटें टिका के निस्बत की

आदमीयत का घर बसाना था

3

हम वही शाख़ काट बैठे हैं

जिस प अपना भी आशियाना था

4

छोड़ कर गाँव शह्र में उसने

ढूँढना फिर से आब ओ दाना था

5

उसका बेख़ौफ़ होना कहता है

रखता अंदाज़ काफ़िराना था

6

बाद मुद्दत के जान पाए हम

दिल भी उसके लिए खिलौना था

7

क्यों उसी वक़्त आ गये आँसू

जिस घड़ी हमको मुस्कुराना था

8

खेलकर बाज़ी इश्क़ की 'निर्मल'

अपनी किस्मत को आज़माना था

 

मौलिक व अप्रकाशित

रचना निर्मल

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Comment by नाथ सोनांचली on October 14, 2021 at 6:58am

आद0 रचना भाटिया जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने। आद0 समर साहब की इस्लाह से और निखर गयी। बधाई निवेदित करता हूँ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 10, 2021 at 9:43am

वाह उम्दा ग़ज़ल हुई आदरणीया...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 3, 2021 at 10:35pm

आ. रचना बहन , सादर अभिवादन। सुन्दर गजल हुई है। हार्दिक बधाई। आ. भाई समर जी की सलाह से यह और बेहतर हो जायेगी 

Comment by Rachna Bhatia on October 3, 2021 at 7:51pm

आदरणीय दण्डपाणि नाहक जी हौसला बढ़ाने के लिए आभार।

Comment by Rachna Bhatia on October 3, 2021 at 7:49pm

आदरणीय समर कबीर सर् नमस्कार। सर्, आपने मतला बहुत ख़ूब कर दिया। आभार।

बाकी आपके द्वारा बताए गई इस्लाह के अनुसार सुधार कर के आपको दिखाती हूँ।

सादर।

Comment by Samar kabeer on October 3, 2021 at 4:11pm

मुह्तरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें I 

'फिर से रूठा ख़ुदा मनाना था' 

इस मिसरे को यूँ कह सकती हैं :-

' हमको रूठा ख़ुदा मनाना था '

'छोड़ कर गाँव शह्र में उसने

ढूँढना फिर से आब ओ दाना था '

इस शे`र का भाव स्पष्ट नहीं हुआ ' देखें I 

'उसका बेख़ौफ़ होना कहता है

रखता अंदाज़ काफ़िराना था'

इस शै`र के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है' देखें I

'बाद मुद्दत के जान पाए हम

दिल भी उसके लिए खिलौना था '

इस शे`र में क़ाफ़िया दोष है, देखें I 

'अपनी किस्मत को आज़माना था'

किस्मत ----"क़िस्मत"

 

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