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नेह के आंसू को सरजू कहता हूँ

अपनेपन से तुझको मैं तू कहता हूं।

                    **

रात छत पे जब निकल आता है तू

इन सितारों को मैं जुगनू कहता हूँ।                      **   

       

 ये जो तन से मेरे आती है महक़..

मैं इसे भी तेरी खुशबू कहता हूँ।

                      **

ये अदब,शोख़ी, नज़ाकत, लहज़े में..

मैं इसी लहज़े को उर्दू कहता हूँ।

                      **

सब थकन मेरी पी जाती है ये धूप

मैं सदा को तेरी जादू कहता हूँ।

                     **

जान कहता था जो तू ,सो अब भी मैं

जान खुदको तुझको जानू कहता हूँ।

******************************

         मौलिक व अप्रकाशित

******************************

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Comment by Samar kabeer yesterday

// क्या सभी मिसरों में रवानी नहीं है//

बिल्कुल !

मिसाल के तौर पर:-

'नेह के आंसू को सरजू कहता हूँ

अपनेपन से तुझको मैं तू कहता हूं'

इस मतले की तक़ती'अ देखें:-

नेह के--22

आँसू--22

को सर--22

जू कह-22

ता हूँ--22---यानी 5 फ़ेलुन

अपने--22

पन से--22

तुझको--22

मैं तू--22

कहता--22

हूँ--2---5 फ़ेलुन 1 फ़ा

एक बात हमेशा ध्यान में रखें कि मात्रा पतन अरूज़ का कोई नियम नहीं है, सिर्फ़ एक छूट है, जितना कम मात्रा पतन होगा उतना ही शैर सुंदर होगा ।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri yesterday

सादर अभिवादन समर सर क्या सभी मिसरों में रवानी नहीं है?

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on Friday

आ. भैया लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी हौसलाफजाई के लिए बहुत शुक्रिया हार्दिक आभार।

Comment by Samar kabeer on Wednesday

जनाब जान गोरखपुरी जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिम बहुत ज़ियादा मात्रा पतन से मिसरे रवानी में नहीं हैं,बधाई स्वीकार करें ।

'सब थकन मेरी पी जाती है ये धूप'

इस मिसरे को यूँ कहना उचित होगा:-

'जब थकन पी जाती है मेरी ये धूप'

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on Wednesday

आदरणीय समर सर ग़ज़ल पर आपका बेसब्री से इंतजार था। पोस्ट में अरकान लिखना भूल गया। 

2122 2122 212

Comment by Samar kabeer on Wednesday

जनाब जान गोरखपुरी जी आदाब, इस ग़ज़ल पर कुछ लिखने से पहले जानना चाहता हूँ कि आपने अरकान क्या लिये हैं?

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Wednesday

आ. भाई क्रिस जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 21, 2021 at 6:39pm

हार्दिक आभार भाई गुमनाम पिथौरागढ़ी जी ग़ज़ल पर आपकी मोहब्बतों के लिए।

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 20, 2021 at 5:57pm

भाई जी वाह अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 20, 2021 at 5:19pm

आ.अमीरुद्दीन अमीर सर ग़ज़ल पर आपके सुखद स्नेह और इस्लाह का सदैव आकांछी रहता हूँ।

//सब थकन मेरी पी जाती है ये धूप.// इस मिसरे में एक मात्रा की छूट का फ़ायदा उठाया है। 

// 'पी' को 1 के वज़्न पर लेना उचित है?//  इस पर मैं बहुत यकीन से तो नहीं कह सकता कि ये सही है या नहीं, लेकिन जितना मेरी जानकारी में है उस हिसाब से तो मात्रा गिरा सकते हैं। obo में किसी रचना को रखने का ये फ़ायदा रहता है कि उसकी कमियां दोष वग़ैरह गुनीजन बता देते हैं इस प्रकार सीखने का क्रम चलता रहता है। उस उद्देश्य से ही रचना प्रस्तुत है।इस पर गुणीजनों को सलाह का इंतजार है।

आपके स्नेह और हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रगुजार हूँ आदरणीय।इसी प्रकार स्नेह बनाये रक्खें। सादर।

कृपया ध्यान दे...

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