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ग़ज़ल- तिफ़्ल कमाल के

221 2121 1221 212      

1

हैं आजकल के तिफ़्ल भी यारो कमाल के

रखते नहीं हैं दिल ज़रा अपना सँभाल के

2

जाने लुग़त कहाँ से ले आए निकाल के

लिक्खे जहाँ प माइने उल्टे विसाल के

3

अपनी शराफ़तों ने ही मजबूर कर दिया

वरना जवाब देते तुम्हारे सवाल के

4

नाज़ुक ज़रूर हूँ नहीं कमज़ोर मैं मगर

अल्फ़ाज़ लाइएगा ज़ुबाँ पर सँभाल के

5

कुछ तो जनाब बोलिए इस बेयक़ीनी पर

कहिए तो हम दिखा दें दिल अपना निकाल के

6

शिकवे शिक़ायतों की कहानी है ज़िन्दगी

कुछ पल ख़ुशी के बाक़ी हैं 'निर्मल' बवाल के

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Rachna Bhatia on February 19, 2021 at 12:00am

आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी नमस्कार।जी सहीह कहा आपने ।सर् की इस्लाह सच में बेमिसाल होती है।

ग़ज़ल तक आने तथा हौसला बढ़ाने के लिए आभार।

Comment by Rachna Bhatia on February 18, 2021 at 11:57pm

आदरणीय समर कबीर सर् सादर नमस्कार। सर्,इस्लाह देने के लिए बेहद शुक्रिय: । सर् 'ले' के लिए आगे से ध्यान रखूँगी। सभी सुधार फेयर में कर लेती हूँ । मक़्ता सहीह करके दिखाती हूँ। सादर।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 18, 2021 at 10:06pm

बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीया। बधाई...आदरणीय समर जी की इस्लाह हमेशा की तरह गौर करने लायक है।सादर

Comment by Samar kabeer on February 18, 2021 at 7:40pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'जाने लुग़त कहाँ से ले आए निकाल के

लिक्खे जहाँ प माइने उल्टे विसाल के'

इस शैर के ऊला में 'ले' शब्द को 1 पर लेना उचित नहीं,पहले भी बताया जा चुका है,और सानी में 'माइने' कोई शब्द  नहीं होता,ग़ौर करें,इस 

शैर को यूँ कह सकती हैं:-

'जाने लुग़त कहाँ से वो लाये निकाल के

मा'ना लिखे हैं उल्टे ही जिसमें विसाल के'

'अपनी शराफ़तों ने ही मजबूर कर दिया'

इस मिसरे को यूँ कहें:-

'मजबूर हमको अपनी शराफ़त ने कर दिया'

'शिकवे शिक़ायतों की कहानी है ज़िन्दगी

कुछ पल ख़ुशी के बाक़ी हैं 'निर्मल' बवाल के'

इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं,ग़ौर करें ।

Comment by Rachna Bhatia on February 18, 2021 at 4:40pm

आदरणीय समर कबीर सर् सादर नमस्कार। 

Comment by Rachna Bhatia on February 18, 2021 at 4:39pm

आदरणीय आज़ी तमाम जी नमस्कार। हौसला बढ़ाने के लिए आभार।

Comment by Aazi Tamaam on February 15, 2021 at 6:33pm

सादर प्रणाम गुरु जी

जी गुरु जी क्षमा करें जल्दाबाजी में ऐसा हो जाता है आगे से ऐसा नहीं होगा

शुक्रिया बात सीधे सीधे कहने के लिये

बेहद ही क्षमा प्रार्थी हूँ 

Comment by Samar kabeer on February 15, 2021 at 6:17pm

जनाब आज़ी जी, ओबीओ की परिपाटी है कि जिसको भी टिप्पणी करें उसे आदरणीय,जनाब वग़ैरह से सम्बोधित करें,दूसरी बात देवनागरी के इलावा अंग्रेज़ी भाषा और रोमन लिपि का प्रयोग न करें ।

Comment by Aazi Tamaam on February 15, 2021 at 2:53am

शिकवे शिकायतों की............ बेहतरीन

बेहद मधुर है

शुक्रिया रचना जी बेहद अच्छी ग़ज़ल हुई है

कृपया ध्यान दे...

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