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बेगम हज़रत महल

बेगम हज़रत महल भारतवर्ष की आज़ादी में कई सारे क्रांतिकारी वीर-वीरांगनाओं ने अपना पूरा योगदान दिया | यहाँ तक कि भारत माँ के सम्मान, स्वाभिमान और इसकी आजादी को बचाने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया| बेगम हज़रत महल का व्यक्तित्व उस समय भारतीय समाज की सामंत मान्यताओ में बंधी नारी शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है | ऐसे में रानी लक्ष्मीबाई का चरित्र हमारे समाज की सशक्त महिला व देवी तुल्य भाव को प्रदर्शित करता है| सोचने की बात यह है कि अलग-अलग परिस्थितियों से आई दोनों नारियाँ कैसे समाज में एक आदरणीय नारी बन जाती है| यहाँ मैं दोनों ही रानियों की तुलना नहीं कर रहा, ना उनकी तुलना की जा सकती लेकिन यहाँ उनकी परिस्थितियों के बार में हम जरूर बात कर सकते है| जहां झाँसी की रानी सीता कुल की मानी जाती है, जिसकी शुद्धता और कुसाग्र बुद्धि को देखकर स्वयं पेशवा ने उसे अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्रदान करायी| उस समय पिता बहुत ऊंचे पद पर नहीं थे बल्कि एक साधारण से ही इंसान थे फिर भी वह रानी की पद तक पहुँच गई| विवाह उपरांत उनके पति गंगाधर राव ने उन्हें कड़े सामाजिक बंधनो में बांधने की कोशिश की लेकिन उन्होंने उनकी हर बात को मानने में अपनी सहमति प्रदान नहीं की, वह पूरी तरह से उनके द्वारा लगाए गए अनुशासन में दब कर नहीं रही बल्कि विरोध करने वाली बातों का विरोध भी करती रही| जैसे कि अंग्रेजों के सामने राजा का शीश झुका कर सलाम करना उन्हें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था जब राजा ने उनसे भी ऐसा करने के लिए कहा तो उन्होंने ऐसा करने से साफ मना कर दिया| एक रानी होने के बावजूद भी उन्हें पुरुष समाज की पर्दा प्रथा, सती प्रथा व अन्य सभी मान्यताओं के सामने झुकने पर मजबूर किया| समाज में प्रचलित सती प्रथा होने के बावजूद भी उन्होनें अपने लिए वैधव्य चुना| हर बुराई से लड़ते हुए रानी ने कठिन परिश्रम और अनुशासन से समाज में अपनी एक अलग ही पहचान बनाई व जीवन में मिली पूर्ण स्वतन्त्रता को उन्होनें देश सेवा को समर्पित कर दिया| बेगम हजरत महल को बचपन से ही ऐसे समाज का सामना करना पड़ा जहां नारी पुरुषों के लिए उनका दिल बहलाने व कामवासना की पूर्ति करने वाली भोग की वस्तु बनने के लिए तैयार हो जाती है| उनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता ना ही समान मान-सम्मान रखने वाला कोई अस्तित्व| बचपन में उन्हें उस समय की मशहूर कटनियों, अम्मन अमामन के द्वारा वाजिद शाह के शाही हरम के लिए बेच दिया गया| इससे ज्यादा उनके बचपन की जानकारी प्राप्त नहीं होती| जब उन्हें वाजिद शाह ने अपनी बेगम बनाया तो उस समय वाजिद अली को पहले से तीन सौ से ज्यादा बेगमों से पति की नजर में अपना स्थान बनाने के लिए प्रतियोगिता का सामना करना पड़ा| जिसकी वजह से कभी-कभी बहुत ही मानसिक तनाव का सामना भी करना पड़ा था| बेगम हज़रत महल को तो जीवन के शुरू में ही उसे नाच-गाने की शिक्षा मिली और पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करने की कलाओ में दीक्षित किया गया फिर भी समाज में उसने अपनी एक अलग ही पहचान बनाई जो खुद में ही बहुत उल्लेखनीय है| हज़रत महल के बचपन की तो ज्यादा जानकारी प्राप्त नहीं होती लेकिन कहा जाता है कि वह फ़ैज़ाबाद के किसी निर्धन परिवार की कन्या थी| बचपन से ही बहुत सुंदर व उनके परिवार की बहुत ही माली हालत होने के कारण उनके माता-पिता ने उसे बादशाह के शाही हरम में गरीबी के चलते बेच दिया था| चाहे जैसी भी स्थिति थी लेकिन ये बात तो सच ही है कि उस स्वाभिमानी लड़की को अनिच्छापूर्ण होने पर भी गलत मार्ग पर आगे बढ़ा दिया गया था| हजरत महल की सुंदरता और तेज को देख वाजिद शाह ने उन्हें अपने शाही हरम से निकाल कर एक शक्तिशाली महिला बनने तक पहुंचा दिया| दोनों रानियों को पढ़ने के बाद यह बात समझ में आती है कि महलो में रहने और विपरीत परिस्थिति होने के बाद भी इन दोनों रानियों ने कभी अपने स्वाभिमान और मानसिक योग्यता को मरने नहीं दिया और किसी पुरुष का साथ ना होते हुए भी उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लेना मुनासिब समझा उनसे डर कर उनके आधीन रहना नहीं| इस तरह से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ तो जैसे पुरूषों के साथ-साथ महिला क्रांतिकारियों ने भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बढ़चढ़ कर भाग लिया| अंग्रेजी हुकूमत में भी इन दोनों का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है| इतिहासकारों ने भी दोनों के चरित्र में बहुत कशीदे पढ़े जो हैरान करने वाली बात होने के साथ-साथ हम भारतीयों का सिर गर्व से ऊंचा भी करती है| इतिहासकार रसाल ने हजरत के बारे में लिखा है कि वह अपने पति से अच्छी मर्द और शासक थी | भारत की उन सभी वीर नारियों में बेगम हजरत महल का नाम भी बहुत आदर के साथ लिया जाता है| जिन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब कुछ लुटाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ीं अपनी वीरता और कुशल नेतृत्व से अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया| चार्ल्स वाल ने लिखा है कि विद्रोही क्रांतिकारियों ने जब क़ैसरबाग के महलों में कैद अंग्रेज़ स्त्रियों की हत्या करने के लिए उन्हे माँगा तो स्त्रीत्व की मान की रक्षा की हेतु उनकी माँग बेगम द्वारा आज्ञार्थक रूप से जहां तक स्त्रियों का संबंध था अस्वीकार कर दी गई और उन्हें (जो स्त्रियों अंग्रेजों की कैद में थी) तुरंत अपनी निगरानी में हरम में बुला लिया| इस तरह विषम परिस्थिति होने के बाद भी अपने साथ-साथ नारी शक्ति के सम्मान को बचाने ले किए भी सदैव तैयार रही| हज़रत महल का जन्म 1820 में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में एक गरीब परिवार में हुआ था| बचपन में उनके माता-पिता प्यार से उन्हें मुहम्मदी ख़ानुम कहते थे| उनके पिता जमींदार के यहां गुलाम थे उनकी घर की माली हालत होने के कारण उनके माता-पिता ने उन्हें बेच दिया| इसके बाद खानुम को लखनऊ के शाही हरम में खावासिन के तौर पर शामिल किया गया| बचपन से ही वह बहुत ही सुन्दर और हुनरमंद थी इसलिए उन्होंने जल्द ही शाही हरम में अपनी एक खास पहचान बना ली| एक दिन नवाब वाजिद अली शाह की नज़र उन पर पड़ी तो उन्होनें उसे अपने शाही हरम के परी समूह में शामिल कर दिया, इस समूह में कुछ चुनिन्दा महिलाओं को ही रखा जाता था जिसे नवाब ने परी समूह का नाम दिया था, नवाब ने खानुम को महक परी नाम दिया| महक परी के हुस्न ने नवाब वाजिद अली शाह पर ऐसा जादू किया कि वो इनके दीवाने हो गए बाद में उन्होनें महक परी से निकाह कर लिया| महक परी के प्रेम में पड़े वाजिद अली शाह ने प्रेम के बहुत से कसीदे भी लिख डाले| कुछ समय पश्चात बेगम हज़रत महल से अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने उनसे निकाह कर लिया। हज़रत महल की दो बेगमों को ही यह खिताब मिला था एक बेगम हज़रत महल दूसरी परी पैकर हज़रत महल इस खिताब को पनि वाली महिला थी| निकाह के उपरांत उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिससे पूरे राज महल में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी| पिता बनने की खबर जैसे ही नवाब वाजिद अली शाह को पता चली, तो इसी खुशी में बादशाह ने उन्हें बेगम हज़रत महल नाम दिया, आगे चलकर वह इसी नाम से मशहूर हुईं| बादशाह ने अपनी इस चौथी संतान का नाम बिरजिस कदर रखा| भारत में अब अंग्रेजी शासन शुरू हो चुका था और अधिकतर रियासतें उनकी आधीन हो रही थी| वाजिद अली एक उदार और भोले व्यक्ति थे| यह भी सच है कि वह और उनका बड़ा भाई मुस्तफा अली अंग्रेजों से नफरत करते थे उनकी नीतियां उन दोनों भाइयों को ही पसंद नहीं थी| मुस्तफा अली का मुँहफट और क्रोधी स्वभाव होने के कारण अंग्रेज़ उसे गद्दी का अधिकारी नहीं समझते थे| अंग्रेजों ने उन्हें असंतुलित मस्तिष्क का स्वामी समझ राज गद्दी के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जबकि वाजिद अली गंभीर और शांत थे इसलिए उनको नवाब बनाने की अपनी सहमति प्रदान कर दी| वाजिद अली साहित्यक और कलात्मक अभिरुचि के साथ-साथ नाट्य करने का शौक रखने वाले एक रसमग्न व्यक्ति थे| वाजिद अली शाह संरक्षण के अन्तर्गत बहुत सी ललित कलाएं विकसित हुई थीं इसके लिए वाजिद अली शाह ने केसरबाग बारादरी महल परिसर का निर्माण भी करवाया जिसमें नृत्य-नाटक, रास, जोगियाजश्न और कथक नृत्य की सजीवता झलक होने के कारण लखनऊ को एक आकर्षक सांस्कृतिक केंद्र बना दिया था। नवाब वाजिद अली शाह कला के प्रति अपने जुनून को लेकर काफी महत्वाकांक्षी थे और शिया कानून का लाभ उठाकर 359 बार विवाह किया। वाजिद अली शाह का मन छल कपट से दूर था वो लड़ाई-झगड़े में विश्वास नहीं करते थे उन्हें किसी तरह का खून-खराबा पसंद नहीं था| नवाब वाजिद अली शाह को एक दयालु, उदार, करुणामय और एक अच्छे शासक के रूप में जाना जाता है, जो राज्य के कार्यों में ज्यादा रुचि रखते थे। अवध उनके शासन के अन्तर्गत एक समृद्ध और धनी राज्य था। इसलिए उन्होनें अवध का नवाब बनने के बाद अंग्रेजों से सीधे उलझने की बजाए अपने राज्य और घर को व्यवस्थित करना ही ज्यादा उचित समझा| अगर अंग्रेजों ने उनके राज्य में हस्तक्षेप नहीं किया होता तो शायद वो एक अच्छे और योग्य शासक होते | डलहौजी नवाब के विलासिता पूर्ण जीवन और शांतचित्त व्यक्तित्व से अच्छे से परिचित था इसलिए उसनें तुरंत अवध की रियासत को हड़पने की योजना बनाई। 1857 में डलहौजी भारत का वायसराय था उसनें नवाब वाजिद अली शाह पर विलासी होने के आरोप लगाकर उन्हें पद से हटाने की योजना बना ली। एक दिन एक पत्र लेकर कंपनी का दूत नवाब के पास पहुँचा और उसने वाजिद अली शाह को उस पर हस्ताक्षर करने के लिये कहा। पत्र में एक शर्त लिखी हुई जिसके अनुसार नवाब के हस्ताक्षर करते ही अवध पर कंपनी का पूरा अधिकार स्थापित हो जाना था। नवाब वाजिद अली ने समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया, फ़लस्वरूप अंग्रेजों ने अवध को अपने अधिकार में लेने के लिए अवध पर आक्रमण कर दिया | कहा जाता है कि 1857 में अंग्रेज अवध को अपने अधिकार में लेने के लिए हमला किया तो सभी क्रांतिकारी सहित सारी प्रजा अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रही थी लेकिन वाजिद अली शाह अपने महल में आराम से बैठे हुए थे, अब अंग्रेजों ने उनसे इसका कारण पूछा कि सब लोग भाग रहे थे तो आप क्यों नहीं भागे| इसके उत्तर में नवाब ने कहा कि वह इसलिए नहीं भाग पाए क्योंकि तब महल में ऐसा कोई सेवादार मौजूद नहीं था जो नवाब के पावों में जूतियां पहना सके| इसके बाद नवाब अंग्रेज सैनिकों ने खुद जूती पहनाई और उन्हें उन्हें नजरबंद करके कलकत्ता भेज दिया गया| कलकत्ता जाने के बाद, नवाब वाजिद अली शाह ने अपनी जन्म भूमि लखनऊ की भव्यता को देखने की अभिलाषा कर रहे थे। हुगली नदी के तट पर स्थित मटियाबुर्ज से निर्वासित किए गए वाजिद अली शाह ने एक बार फिर अपनी संपत्ति का इस्तेमाल अपनी पहली आकर्षक जीवन शैली को पुनः प्राप्त करने के लिए किया था। अब नवाब के वारिस की बात चलने लगी उस समय नवाब की किसी भी पूर्व रानी ने अपने पुत्र को उनका वारिस बनाने की बात नहीं की साथ ही साथ बिरजिस कदर का नाम भी किसी कीं ज़बान पर नहीं आया था| उसे नवाब का उत्तराधिकारी बनाने की वजह से भी हज़रत महल का महतत्व बढ़ जाता है | एक बार की बात है एक दिन नवाब वाजिद अली को राजमाता की एक परिचारिका पसंद आ गई जब राजमाता को यह बात पता चली तो उन्होंने उस परिचारिका को उसके पास भेजने से ही मना कर दिया| वाजिद शाह ने राजमाता से पूछा तो उन्होनें बोला कि उस परिचारिका के शरीर पर एक सांप का निशान है| वह जिस भी मर्द से मिलेगी अपनी बद किस्मती का साया डालेगी जो उस मर्द के लिए ठीक नहीं होगा| वाजिद शाह डर गए वैसे भी उस समय वह हृदय की परेशानी से कष्ट में थे| उसी समय उन्होनें सभी परिचारिकाओं के साथ-साथ अपनी अन्य बेगमों के शरीर पर भी कोई निशानी होने का पता लगाने के लिए आदेश पारित कर दिया कि कहीं किसी परिचारिका कि वजह से तो ही उनको हृदय की समस्या तो नहीं हुई है| वाजिद अली शाह की आठ बेगम थी उनमें हज़रत भी एक थी हज़रत को इस बात का बहुत बड़ा धक्का लगा फिर वाजिद अली शाह को उनके मंत्रियो ने समझाया कि हिन्दू पंडितो के पास हर जादू टोने का तोड़ होता है| आप उनसे एक बार झांड-फूँक कराये हिन्दू पंडितो के पास हर दोष का निवारण करने के लिए भेज दिया गया| कुछ हिन्दू पंडितों द्वारा महल की सभी बेगमों को दोष से मुक्त कराये जाने के बाद उन्हें राज दरबार में वापस बुलाया गया| उनमें से छ: बेगमों ने महल में वापस आने के लिए मना कर दिया, वें फिर वह कभी महल में वापस नहीं आई| नवाब ने उनका बसेरा महल के बाहर ही करा दिया| वापस आयी बेगमों में एक हज़रत महल भी एक थी, इस घटना से बहुत चोट पहुंची लेकिन वो कुछ भी नहीं कर सकती | उन्हें इस बात की ख़ुशी थी कि बिरजिस कदर के नवाब बनते ही वह राजमाता बन जाएगी| देश में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बीज बोया जा चुका था, लोग सरकार को उखाड़ फ़ेंकने की योजनाएं बना रहे थे। अंग्रेजों के द्वारा उनके पति पर किए गए अत्याचारों को भी वह भूल नहीं पायी थी| कलकत्ते में उनके पति निर्वासित होने के बाद अभी तक बेगम हज़रत महल ही अवध रियासत के राजकीय मामलों को संभाल रही थी। हज़रत महल ने अपने बेटे बिरजिस क़द्र के साथ लखनऊ में ही रहते हुए उसे लखनऊ का नवाब बनाने का निर्णय किया। उस समय बिरजिस कदर केवल चौदह वर्ष के रहे होंगे इसका मतलब जब उनका जन्म हुआ होगा तो बेगम हज़रत महल की उम्र पंद्रह सोलह वर्ष की ही रही होगी| अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े से अपनी रियासत बचाने के लिए उन्होंने चाँदी वाली वरदारी में नवाबज़ादे बिरजिस कदर की ताजपोशी की हुई और जनरल वरकड़ अहमद ने बिरजिस कदर को मुकुट पहनाया| अफसरों ने तलवारों की नजर दिखाई और 21 तोपों की सलामी दी गई| शहर में उत्सव का माहौल था नवाबजादे बिरजिस कदर को अवध के वली शासक नियुक्त किया गया| इसी बीच सैनिक पंचायत और बिरजिस कदर की सरकार के एक समझौता हुआ जिसकी पहली शर्त रखी गई कि वो अवध के स्वतंत्र नवाब नहीं बन सकते यह बात दिल्ली के बादशाह पर निर्भर करती है कि वह स्वतंत्र नवाब बन सकते है कि नहीं| दूसरी शर्त यह रखी गई कि सैनिकों का वेतन दुगना कर दिया जाये और जो रकम अँग्रेजी सरकार में डूब गई वह भी बिरजिस कदर ही भरे| तीसरी शर्त यह रखी गई कि विरगिस नई भर्ती शुरू करें और उन भर्तियों में सैनिक पंचायत की सहमति ले| चौथी शर्त रखी गई कि सैनिक पार्लियामेंट की राज दरबार में सलाह बराबर ली जाये और नवाबो की भर्ती भी उनके अनुसार हो| इस तरह बिरजिस कदर की संरक्षिका बन हज़रत महल शासन करने लगी| बेगम हज़रत महल एक ओजस्वी और तेज से भरपूर महिला थी उसने अपने बेटे के नाम पर लोगों से सहायता मांगी | उसने घूम-घूमकर जगह-जगह जाकर लोगों को संगठित करना शुरू कर दिया, बेगम हज़रत महल के ओजस्वी भाषण से प्रभावित होकर बहुत से राजा-महाराजा उसके साथ मिलकर अँग्रेजी सरकार के साथ बगावत करने के लिए खड़े हो गए | वह हिन्दू-मुस्लिम सभी धर्मो के लोगों का आधार करती थी इसलिए लोगों में भी उसके प्रति आधार का प्रेमभाव था, लोग उसकी बात को महत्व देते थे | सर विलयम के अनुसार बेगम ने अपने बेटे के हितों की रक्षा के लिए उसने अवध के सभी लोगों को उत्तेजित कर दिया था और सभी बाहुबली लोग उसके लिए सदा वफादार बनें रहने की कसमें खा चुके थे | बेगम हज़रत महल अँग्रेज़ो की नीतियों से बहुत शिकायतें थी जिनमें कुछ प्रमुख शिकायतों में से एक यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सड़कें बनाने के लिए मंदिरों और मस्जिदों को आकस्मिक रूप से ध्वस्त किया था। विद्रोह के अंतिम दिनों में जारी की गई एक घोषणा में कहा गया था कि अंग्रेज़ सरकार ने धार्मिक आज़ादी की अनुमति देने के दावे का मज़ाक उड़ाया है जैसे सूअरों को खाने और शराब पीने, सूअरों की चर्बी से बनें सुगंधित कारतूस काटने और मिठाई के साथ, सड़कों को बनाने के बहाने मंदिरों और मस्जिदों को ध्वंसित करना, चर्च बनाने के लिए, ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए सड़कों में पादरी भेजने के लिए, अंग्रेज़ी संस्थान स्थापित करने के लिए हिंदू और मुस्लमान को नष्ट करने के लिए, और अंग्रेज़ी विज्ञान सीखने के लिए लोगों को मासिक अनुदान का भुगतान करने के काम | मगर सैनिक पंचायत और उनके शासन में मतभेद होने के कारण जल्द ही उसकी यह कोशिश असफल हो गई | लगातार जागरूक करने के बाद भी लोगों में किसी प्रकार की चेतना नहीं आई इस तरह कई महीने बीत गए पर सेना में किसी प्रकार कोई सक्रियता उत्पन्न नही हुई | उस समय सारे भारत में प्रथम स्वत्रंता संग्राम की आग धधक चुकी थी, सभी छोटे-बडे नगरों और गांवों में हजरत महल की मुक्ति आंदोलन के सैनिक मौजूद थे और अंग्रेजों को हानि पहुचाने में संलग्न थे। उस समय लखनऊ ही एकमात्र ऐसी जगह थी जहां अंग्रेज़ों ने निवास भवन को नहीं छोड़ा | वहां वे अब तक अपनी खोई हुई सत्ता को वापस हासिल नहीं कर पाए थे। लखनऊ के चारों ओर तथा उसके बाहर भी स्वतंत्रता सेनानी फैले हुए थे सबनें मिलकर बेगम हजरत महल को अपने नेता के पद पर प्रतिष्ठित किया। हजरत महल ने मुक्ति संग्राम के सेनानियों के लिए अपना खजाना खोल दिया। उन्होनें जन-धन से क्रांतिकारियों की बहुत सहायता करने लगी साथ ही स्वयं भी रण के मैंदान में क्रांतिकारियों के बीच उपस्थित रही और सबनें एक साथ मिलकर अंग्रेजों से युद्ध किया। लखनऊ में क्रांति का नेतृत्व बेगम हज़रत महल कर रही थी, वह एक रानी थीं और ऐशो आराम की जिन्दगी की अभ्यस्त थीं, लेकिन अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाने के लिए स्वयं युद्ध के मैंदान में उतरीं। 7 जुलाई 1857 तक अवध का शासन हजरत महल अपने हाथ में लिया| बहादुर शाह और ज़ीनत महल ने उनका साथ दिया और आजादी की घोषणा की। अंग्रेज सैनिक लगातार रेजीडेंसी से अपने साथियों को मुक्त कराने के लिए प्रयासरत रहे, लेकिन भारी विरोध के कारण अंग्रेजों को लखनऊ में सेना भेजना कठिन हो गया था| इधर रेजीडेंसी पर विद्रोहियों द्वारा बराबर हमले किये जा रहे थे लेकिन अंग्रेजों के लिए ये अच्छी बात हुई कि दिल्ली पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो चुका था| जिससे अँग्रेजी सेनाओ का हौंसला बढ़ा उसके बात तो वें ज़ोर-शोर के साथ विद्रोहियों से निपटने लगे| उधर मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र के बंदी होते ही क्रांतिकारी विद्रोहियों के हौसले कमजोर पड़ने लगे| लखनऊ भी धीरे– धीरे अंग्रेजों के नियंत्रण में आने लगा था| हैवलाक और आउट्रूम की सेनाएं भी लखनऊ पहुँच गयी| बेगम हजरत महल ने कैसरबाग के दरवाजे पर ताले लटकवा दिए| अंग्रेजी सेनाओं ने बेलीग्राद पर अधिकार कर लिया| अपनी सेना का मनोबल कम होते देखकर बेगम ने अपने सिपाहियों में जोश भरते हुए कहा कि अब सब कुछ बलिदान करने का समय आ गया है| अंग्रेजों की सेना का अफसर हैवलाक आलमबाग तक पहुँच चुका है उधर कैम्पवेल भी कुछ और सेनाओ के साथ उससे जा मिलेगा| जिससे हमारे शत्रु की सेना का बल बढ़ेगा लेकिन निडर होकर हमें शत्रुओं का सामना करना है| आलमबाग में बहुत भीड़ इकट्ठी थी वहां जनता के साथ महल के सैनिक, नगर की सुरक्षा के लिए उमड़ पड़े थे| घनघोर बारिश हो रही थी दोनों ओर से तोपों की भीषण मार चल रही थी| बेगम हजरत महल को चैन नहीं था लेकिन वे चारो ओर घूम–घूम कर सरदारों में जोश भर रही थी| उनकी प्रेरणा ने क्रांतिकारी विद्रोहियों में अद्भुत उत्साह का संचार कर दिया था जिससे वे भूख, प्यास सबकुछ भूलकर अपनी एक-एक इंच भूमि के लिए मर– मिटने को तैयार थे| सन 1857-58 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, राजा जयलाल सिंह के नेतृत्व में बेगम हज़रात महल के समर्थकों ने अंग्रेजों की सेना के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और लेकिन अंग्रेजों के पास बड़ी सेना होने के कारण उन्हें पराजय मिली। लखनऊ के एक जमींदार मर्दन सिंह ने हज़रत महल को यह कह कर शरण नहीं दी कि इस तरह अब तुम मेड़क की तरह इधर-उधर उछलती फिरोगी | ऐसी बातें सुनने के लिए हज़रत महल को कितनें साहस की आवश्यकता होगी ये हम सोच ही सकते है| लखनऊ में पराजय के बाद वह अवध के देहातों में चली गईं और वहां भी क्रांति की चिंगारी सुलगाई। हज़रत महल नाना साहेब के साथ मिलकर क्रांति कर रहीं थीं | बाद में शाहजहांपुर पर हमले के बाद वह फ़ैज़ाबाद के मौलवी से भी मिली। मौलवी अहमदशाह ने बड़ी अनन्यता के साथ बेगम का साथ दिया। अहमदशाह एक मौलवी थे जो पहले फैजाबाद में रहते थे। बाद में लखनऊ आकर रहने लगे थे वे बडे ही शूरवीर और अनुभवी थे। 1857 के युद्ध में उन्होंनेजो शौर्य दिखाया था वह उन्हीं के योग्य था। मौलवी अहमदशाह और हजरत महल ने अंग्रेजों का लखनऊ में रहना मुश्किल कर दिया। बेगम हजरत महल ने कई स्थानों पर मौलवी अहमदशाह की बड़ी मदद की उन्होंनेनाना साहब के साथ सम्पर्क कायम रखा। लखनऊ के पतन के बाद भी बेगम के पास कुछ वफ़ादार सैनिक और उनके पुत्र बिरजिस कदर थे, नाना साहब कानपुर में अंग्रेजों का काल बनें हुए थे। हजरत महल के क्रांतिकारी संगठन में अभूतपूर्व क्षमता थी और इसी कारण अवध के ज़मींदार, किसान और सैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे। आलमबाग़ की लड़ाई के दौरान अपने जांबाज़ सिपाहियों की उन्होंने भरपूर हौसला आफ़ज़ाई की और हाथी पर सवार होकर अपने सैनिकों के साथ दिन-रात युद्ध करती रहीं। क्रांतिकारियों के भय के कारण कानपुर और लखनऊ दोनों जगह से अंग्रेज अपनी जान बचाकर भागने लगे थे। यदि समय पर उन्हें नई सहायता न मिलती तो इसमें कोई संदेह नही है कि कानपुर और अवध से अंग्रेजों का सफाया हो जाता और फिर पूरे भारत में अंग्रेजों का सफाया होने में भी देर न लगती। बेगम हज़रत महल के सैनिक दल में तमाम महिलायें शामिल थीं। लखनऊ में बेगम हज़रत महल की महिला सैनिक दल का नेतृत्व रहीमी के हाथों में था, जिसनें फ़ौजी भेष अपनाकर तमाम महिलाओं को तोप और बन्दूक चलाना सिखाया। रहीमी की अगुवाई में इन महिलाओं ने अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया। लखनऊ की तवायफ़ हैदरीबाई के यहाँ तमाम अंग्रेज़ अफ़सर आते थे और कई बार क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ योजनाओं पर बात किया करते थे। हैदरीबाई ने पेशे से परे अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुये इन महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को क्रांतिकारियों तक पहुँचाया और बाद में वह भी रहीमी के सैनिक दल में शामिल हो गयी। उनकी सेना में स्त्रियाँ भी मर्दाना भेष में बिल्ली की फुर्ती से लड़ रही थी और उनके बारे में जब तक पता नहीं चलता जब तक वह मर या पकड़ी नहीं जाती थी कि वह मर्दाना भेष में स्त्रियाँ थी| कहते है लखनऊ में एक बुढ़िया एक पुल पर चीथड़े उठाने आई लेकिन बाद में पता चला कि बम का पलीता हाथ में ही रह जाने व बम हाथ में ही फूटने के कारण वो खुद मौत के मुंह में जा पहुंची जो उस पुल को उड़ाने आई थी इस तरह इस युद्ध में बेगम के साथ बहुत सी औरतों ने उसका साथ दिया था | ऊदा देवी की वीरता से अभिभूत होकर काल्विन कैम्बेल ने हैट उतारकर शहीद ऊदा देवी को श्रद्धांजलि दी थी और कहा कि उस महिला का साहस देख कैप्टन वेल्स की आंखें नम हो गईं, तब उसने कहा कि यदि मुझे पता होता कि यह महिला है तो मैं कभी गोली नहीं चलाता। बेगम हजरत महल ने हिन्दू, मुस्लमान सभी को समान भाव से देखा। अपने सिपाहियों का हौसला बढ़ाने के लिये युद्ध के मैंदान में भी चली जाती थी। बेगम ने एक युद्ध में दुश्मन का सामना किया लेकिन उनका दल कमज़ोर पड़ गया। बेगम द्वारा किए गए प्रतिरोध के बावजूद अँग्रेज़ सेनाध्यक्ष अपनी घिरी हुई सेना को निवास भवन से निकाल कर आलम बाग़ तक उसका मार्गरक्षण करने में सफल रहे, जिसके दौरान कुछ अँग्रेज़ अधिकारी मारे गए और कुछ घायल हो गए | हजरत महल ने क्रांतिकारी सेना की एक सभा बुलाई उन्होंनेउस सभा में भाषण देते हुए कहा कि साफ-साफ जवाब दो। तुम लोग अंग्रेजों से लड़ना चाहते हो या नही यदि तुम लोग न लड़ोगे तो मैं लडूंगी। मैं गोली और गोलो पर सो जाऊंगी पर लखनऊ अंग्रेजों को नही दूंगी। बेगम हजरत महल के ओजस्वी भाषण का क्रांतिकारियों पर बहुत प्रभाव पडा। उन्होंने अंग्रेजों से युद्ध करने के संकल्प को फिर दोहराया, बेगम ने फिर से सेना को संगठित किया | बेगम हज़रत महल ने सैनिकों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रायः बैठकें बुलायीं सभी सैनिकों को बहादुर बनने और आंदोलन के लिए लड़ने के लिए कहा। बेगम ने आंदोलन के लिए पत्र और उसमे कुछ निर्देश लिखे | वह एक हाथी पर सवार होकर युद्ध के मैंदान में पहुँच गईं उनका प्रभाव ऐसा था कि सेनाए भूखे-प्यासे अपनी एक दूसरे की सभी शिकायते भूल कर युद्ध में लड़ती रही और लगातार हर परिस्थिति में संग्राम में डटी रही | आलम बाग़ पर कभी-कभी मौलवी अहमदुल्लाह शाह के नेतृत्व वाली सेना और अन्य समय पर बेगम द्वारा हमला किया गया | मेरठ और दिल्ली में भी अंग्रेज सेना ने क्रांतिकारियों को कुचल दिया था। अंग्रेजों ने मुगल बादशाह बहादुरशाह को गिरफ्तार कर रंगून भेज दिया था। कही अंग्रेज हजरत महल को बंदी न बना ले इसलिए सभी ने बेगम हजरत महल और उसके नवाब बिरजिस ने लखनऊ छोड़ दिया। कर्नल रामसे के एक पत्र के अनुसार, ऐसे पाँच मार्ग थे जिनके द्वारा विद्रोही पहाड़ियों की सीमा को पार सकते थे। बेगम के पलायन के बाद 1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया ने अपनी घोषणा द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन भारत में समाप्त कर उसे अपने हाथ में ले लिया। घोषणा में कहा गया की रानी सब को उचित सम्मान देगी। परन्तु बेगम ने विक्टोरिया रानी की घोषणा का विरोध किया व उन्होंने जनता को उसकी खामियों से परिचित करवाते हुए कहा गया कि विद्रोहियों और उनके नेताओं को सरकार के विरुद्ध साजिश करने के लिए खुद को सरकार के सामने पेश करे। यह भी कहा गया कि जिन विद्रोहियों ने अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या नहीं की, उनके जीवन को बख्शा जाएगा। यह घोषणा बेगम से लेकर सबसे नीचे पद पर कार्य करने वाले लोगों के लिए लागू थी। बेगम इसके लिए सहमत नहीं हुई और आत्मसमर्पण करने के बजाय उन्होंने सशस्त्र प्रतिशोध के उद्देश्य से नेपाली अधिकारियों से सशस्त्र सहायता की माँग की। अंग्रेज़ अधिकारियों द्वारा पेश की गई इन शर्तों के बावजूद भी बेगम हज़रत महल के प्रति वे सभी लिहाज़ अपनाएं जायेंगेजो उनके एक महिला और एक राज-परिवार की सदस्या होने के रूप में अनुकूल हैं लेकिन बेगम हजरत महल ने उनके सामने आत्म समर्पण नहीं किया| विद्रोह का दमन करने के बाद, इंग्लैंड की रानी ने अंग्रेज़भारत के लोगों को शांत करने के लिए एक उद्धघोषणा जारी की इस पर प्रतिक्रिया के रूप में बेगम हज़रत महल ने एक जवाबी घोषणा जारी की और लोगों को इन वादों पर विश्वास न करने की चेतावनी दी, क्योंकि अंग्रेज़ों की अपरिवर्ती रीति है कि भूल छोटी हो या बड़ी उसे कभी माफ़ नहीं किया जाना चाहिए। लखनऊ से निकल कर हज़रत महल पहले तो रैकवारो के भिटोली गढ़ में रही फिर रैकवारो के मुखिया हरिदत्त सिंह बाढि के गढ़ में क्रांति का केंद्र स्थापित कर वही से 1958 तक सारे सूत्रों का संचालन करती रही| यहीं से राजमाता ने राजेश्वरी विक्टोरिया की सभी घोषणाओ का जवाब दिया| इसके बाद हजरत महल दो तीन दिन तुलसीपुर के अचवागढ़ी में रही, वहां से सोनार पर्वत होते हुए नए कोर्ट चली गई नए कोर्ट में आसुफद्धौला की वरदारी में ठिकी| इसके बाद उन्होंने जब भारत छोड़ नेपाल जाने का फैसला किया तो वह रोने लगी और अपने अंग रक्षकों को वापस भेजते हुए कहा कि अब तो हमारा भी कोई ठिकाना नहीं रहा आप लोग वापस लौट जाओ| ऐसे कहते हुए उन्होंने नेपाल जाने का प्रयत्न किया और नेपाल के राणा को शरण देने के लिए पत्र भेजा। पहले तो नेपाल के राणा जंगबहादुर ने हजरत महल को नेपाल में प्रवेश की अनुमति नही दी और यह कहते हुए मना कर दिया कि आप हमसे किसी प्रकार की मदद कि कोई उम्मीद ना रखे आप अंग्रेजों से मेल कर ले| इस पर मम्मु खाँ ने लिखा की ना हमें आपकी मदद चाहिए और ना ही हम अँग्रेज़ो से मेल ही करेंगे| हज़रत महल ने समझदारी से काम लेते हुए अपने बहुमूल्य रत्न नेपाल के राजा को भेंट स्वरूप भेजे और कहा कि उनका और उनके बेटे का अंग्रेजों से कोई बैर नहीं है| इस पर नेपाल के जनरल बुदरी ने कड़े शब्दों में पत्र लिखा कि यदि आप मेरे क्षेत्र और सीमा के भीतर शरण चाहते हैं तो दोनों उच्च राज्यों के बीच अनुबंधगत संधि के अनुसरण में, गोरखा सैनिक निश्चित रूप से आप पर आक्रमण और युद्ध करेंगे लेकिन बाद में स्थितियों को समझते हुए नेपाली अधिकारियों ने अपना निर्णय बदल दिया और उन्हें कुछ शर्तों और पाँच हज़ार की पेंशन देते हुए नेपाल में शरण दे दी गई और कहा गया कि वह विद्रोही नेताओं के साथ या भारत के लोगों के साथ कोई संपर्क नहीं रखेंगी। इसके बाद उन्होंने नेपाल के काठमांडू में एक छोटा सा घर लेकर साधारण सा जीवन जीने लगी कहा जाता है कि उन्हें नेपाल में बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा एक बार उनका बेटा बीमार पड़ गया लेकिन नेपाल में उनके प्रभारी लेफ्टिनेंट को महसूस हुआ की बेगम की नेपाल से भी पलायन की योजना थी। 1861 में बिरजिस कदर की दिल्ली के क्रांति दलीय के शहजादे मिर्जा दाऊद बेग की लड़की से कर दी जो खुद भी एक शरणार्थी के तौर पर नेपाल में अपना जीवनयापन कर रहे थे| हज़रत महल ने अपनी बहू का ससुराल का नाम महताब आरा बेगम रखा | कहा जाता है कि बेगम ने भारत आने की बहुत कोशिश की लेकिन आदेश जारी किए गए, जिसके अंतर्गत अंग्रेज़ भारत में प्रवेश करने के लिए बिरजिस क़द्र या उनकी माँ द्वारा किए गए किसी भी अनुरोध पर विचार नहीं किया जाएगा। भारत सरकार ने एक शर्त रखी कि यदि वे अंग्रेज़ सरकार के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं तो उन्हें सरकार की ओर से कोई सहायता या भत्ता नहीं मिलेगा और वे जिस भी जिले में रहेंगे उन्हें वहां के मजिस्ट्रेट की निगरानी में रहना होगा। इस वजह से बेगम हज़रत महल भारत नहीं आ सकीं और उन्हें स्थायी रूप से नेपाल में रहना पड़ा। वे काठमांडू में कितनें दिन रही कुछ कहा नही जा सकता। पर यह सच है कि उन्होंने काठमांडू में ही अपने जीवन की अंतिम सांस ली और वहीं उनका निधन हो गया। 1879 में उनकी मृत्यु के बाद उन्हें काठमांडू के जामा मस्जिद के मैं दानों में एक अज्ञात क़ब्र में दफ़नाया गया। उनकी मृत्यु के बाद 1893 में नेपाल में गरीबी में गुजर बसर करने के बाद बिरजिस कदर ने मक्का जाने का विचार किया और जिसके लिए उन्होंने अंग्रेज़ सरकार से स्वीकृति मांगी | रानी विक्टोरिया 1887 की जयंती के अवसर पर अंग्रेज़ सरकार ने बिरजिस क़द्र को माफ़ कर दिया और उन्हें भारत लौटने की इजाज़त दे दी और वे अपने तीन बच्चों के साथ भारत वापस लौटे | इसके बात कुछ समय बाद ही बिरजिस कदर के परिवार वालों ने ही उनके बेगम सहित दो बच्चों को जहर देकर मार डाला | इस बच्ची इस वजह से बच गई कि उसे खाने का स्वाद अच्छा नहीं लगा तो वह बीच में खाना छोड़ कर चली गई थी| आरंभ में देव विधान के अनुसार उन्हें जीवनभर कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और पूरी जिन्दगी संघर्ष करते-करते ही इस जीवन से विदा लेकर चली गई | इतिहास कारों के अनुसार उसके अंतिम युद्ध में देवबख्श, तुलसीपुर की रानी, नाना साहब का दल, राणा जी और हुसैन निज़ाम जैसे देव पुरुष साथ थे जिनके प्रति हमारे मन में खुद–ब-खुद ही आभार व्यक्त करने के भाव आ जाते है फिर भी अपनी हार को जीत में नहीं बदल सकी| कितनी महान हस्तियों ने इस भारत भूमि पर जन्म लिया और हज़ार कठिनाइयो और परिस्थितियों का सामना करते हुए वे कितनें बड़े-बड़े कामो को अंजाम दे गए |

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by PHOOL SINGH on July 18, 2020 at 7:09pm

 भाई आजकल एक पुस्तक लिख रहा हूँ भारत की वीरांगनाए के नाम से उसी की एक एक कहानी डाल रहा हूँ ओपन बुक्स पर जब पब्लिश हो जाएगी तो जरूर लेना आप इसमे इतिहास की 50 मुख्य मुख्य नारियों की वीर गाथा लिख रहा हूँ काफी पढ़ना पड़ रहा है  जहां कहीं से भी कोई डाटा मिल रहा उसको संग्रह करने की कोशिश करता हूँ बहुत महेनत करनी पड़ रही है उसके लिए| लेकिन उम्मीद है आप लोगो के साथ से उसे लिखने में कामयाब भी हो जाऊँ|

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 18, 2020 at 4:34pm

आद0 फूल सिंह जी सादर अभिवादन।बढ़िया लिखा है आपने। एक बात मन में चल रही है मेरे।इन बातों का इतिहास कहाँ से लाते हैं।त

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