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वंचितों के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

  1. फूलों की नाराजगी, काँटों का मनुहार
    दुखियारों के भाग में, ऐसा ही सन्सार।१।
    **
    नदिया ने  दुत्कार  दी, किया  रेत  ने प्यार
    जिसके दम करते रहे, जीवन का विस्तार।२।
    **
    कौतुक करता दुख रहा, पर सुख रहा उदास
    घावों ने  मन  में  भरी, पीड़ा  निहित मिठास।३।
    **
    यादों  की  चौपाल  में, बिन  घूँघट  के  पीर
    जाने क्या क्या कह गया, आँखों बहता नीर।४।
    **
    मुर्दा दिल की बस्तियाँ, चलती फिरती लाश
    हलचल  कैसी  भी  रहे, जीवन  रहे  हताश।५।
    **
    किस्मत बनकर कैकई, लिखती नित वनवास
    ऐसे  में  तब  क्या  करे, कोई  घर  की  आस।६।
    **
    मौलिक/अप्रकाशित
    - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 7, 2020 at 5:44am

दोहों पर जो बढ़ मिला , हमें आपका प्यार

गिरधारी जी उस लिए, करता मन आभार

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 6, 2020 at 4:42pm

अत्यंत उच्च कोटि के दोहे सृजित किये हैं आदरणीय , सादर नमन | 

अनुपम  सुन्दर दोहरे ,वाह वाह क्या बात | 

तन मन हर्षित हो गया , गज़ब सृजन है तात || 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 4, 2020 at 6:57pm

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 4, 2020 at 6:54pm

आ. भाई सुरेंद्र नाथ जी ,सादर अभिवादन ।दोहों पर उपस्थिति और मनभावन प्रशंसा का हार्दिक आभार । शेष ओबीओ परिवार में मिलने वाले स्नेह व मार्गदर्शन के सहारे ही निरंतर अच्छा लिखने का प्रयार कर रहा हूँ । आप जैसे सुधी जनों का सानिन्ध्य बना रहे यही आकांंक्षा है । शेष शुभ शुभ...

Comment by Samar kabeer on May 3, 2020 at 12:58pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,अच्छे दोहे लिखे आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 3, 2020 at 11:34am

आद0 लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन। पहला दोहा पढ़ते ही भाव उमड़ने लगा।फूलों की नाराज़गी, काटो का मनुहार,, सच कहा आपने। दुखियारी के लिए फूलों का संसार स्वप्न्न ही है। और काँटों से जैसे उसका हमेशा के लिए रिश्ता। नदिया ने दुत्कार दी,, क्या गज़ब का बिम्ब है। सच कहूँ तो उम्दा से भी उम्दा लिखा है आपने।  बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

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