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सभ्य कितना चल गया सबको पता -गजल (लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')

२१२२/ २१२२/२१२२


द्वार पर वो  नित्य  आकर  बोलता है
किन्तु अपना सच छुपाकर बोलता है।१।
***
दोस्ती का मान जिसने नित घटाया
दुश्मनों को अब क्षमा कर बोलता है।२।
***
हूँ अहिन्सा का पुजारी सबसे बढ़कर
हाथ  में  खन्जर  उठाकर  बोलता है।३।
***
गूँज घन्टी की न आती रास जिसको
वो अजाँ को नित सुनाकर बोलता है।४।
***
दौड़कर मंजिल को हासिल कर अभी तू
पथ  में  काँटे  वो  बिछा कर  बोलता  है।५। 
***
सभ्य कितना चल गया सबको पता यह
हो  के  नंगा  क्यों  लजाकर  बोलता  है।६।
***

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by Samar kabeer on May 3, 2020 at 2:47pm

//भ्राता श्री का स्वास्थ्य अब कैसा है ?//

धीरे धीरे बहतर हो रहा है,आपके स्नेह के लिए धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 3, 2020 at 1:28pm

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । मंच पर आपकी उपस्थिति से अपार हर्ष हुआ । भ्राता श्री का स्वास्थ्य अब कैसा है ?

शेष गजल पर आपकी प्रतिक्रिया व मार्गदर्शन के लिए आभार ।

इंगित मिसरे के अन्त में "तू " शब्द छूट गया है ।  सुधार लेता हूँ सादर..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 3, 2020 at 1:16pm

आ. भाई सुरेंद्र नाथ जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार । सम्भवतः गजल में वह बात नहीं बनी जो बननी चाहिए । पुनः विचार करता हूँ।

Comment by Samar kabeer on May 3, 2020 at 12:52pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'दौड़कर मंजिल को हासिल कर अभी'

इस मिसरे की बह्र चेक कर लें ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on May 3, 2020 at 11:30am

आद0 लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल का प्रयास है।  पर कहूँगा कि यह दिल माँगे मोर। देखियेगा। सादर

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