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ग़ज़ल : ‘’सुभान’अल्ला’’ (1222-1222-1222-1222)

सवाल-ए-इश्क़, रुख़ पे, क्या असर लाये, सुभान’अल्ला!

झुकी नज़रेँ उठेँ, उठ कर झुकेँ, हाए, सुभान’अल्ला!

 

पलक से, वक़्त बे-क़ाबू, हवा मोड़े जो, चाल ऐसी,

खुले जो ज़ुल्फ, मौज आये, घटा छाये, सुभान’अल्ला!

 

तेरी खुशबू के रंगोँ से, बहारोँ की धनक महके,

तेरी आवाज़, क़ुदरत का सुकूँ, हाए, सुभान’अल्ला!

 

उफक़ ये हुस्न, तो, वो चाँद-सूरज हैँ तेरी बिन्दी,

सितारा, बन तेरी नथनी, चमक पाये, सुभान’अल्ला!

 

कमर प्याला, सुराहीदार गर्दन, जिस्म मै’ख़ाना,

गुलाबी होँट अंगूरी, नशा छाये, सुभान’अल्ला!

 

अदा-शोख़ी क़यामत, सादगी-शर्म-ओ-हया ऐसी,

हक़ीक़त क्या, तसव्वुर भी मचल जाये, सुभान’अल्ला!

 

है चेहरा, ईद का वो चाँद, जिस को देख कर, यारोँ,

झुका सजदे मेँ, हर काफिर, सदा आये, ‘सुभान’अल्ला’!

 

तेरी हस्ती मेरी साँसेँ, दवा-‘आब-ए-हयात’ आँखेँ,

हँसी शबनम-सी, गुलशन की सहर लाये, सुभान’अल्ला!

 

मेरे बे-दार ख़्वाबोँ के तरन्नुम की जवाँ महफिल,

मुहब्बत की शमा से रौशनी पाये, सुभान’अल्ला!

 

यही यादेँ, मेरे दिन-रात, साहिल हैँ, समन्दर​ हैँ,

“बशर” की डूबती कश्ती, ग़ज़ल गाये, ‘’सुभान’अल्ला’’!!!

 

********************************************

 

मौलिक व अप्रकाशित

 

* शब्दावली मौज = लहर, धनक = इंद्रधनुष, उफक़ = क्षितिज, मै’ख़ाना = शराब’ख़ाना, मदिरालय, तसव्वुर = कल्पना, काफिर = नास्तिक, सदा = आवाज़, हस्ती = ज़िन्दगी, आब-ए-हयात = अमृत, शबनम = ओस, गुलशन = बाग़ या बगीचा, सहर = सुबह, बे-दार = जागते हुए, निद्रारहित, तरन्नुम = संगीत, साहिल = किनारा

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Comment

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Comment by सन्दीप सिंह सिद्धू "बशर" on November 13, 2013 at 2:49pm

Saurabh Pandey साहब, ये तो आप का हुस्न-ए-नज़र है । आप का ख़ास इंतिख़ाब, दाद और हौसला'अफज़ाइ सर-आँखोँ पर । तह-ए-दिल से आप का शुक्रिया ।

Comment by सन्दीप सिंह सिद्धू "बशर" on November 13, 2013 at 2:49pm

शकील जमशेदपुरी साहब, तह-ए-दिल से शुक्रिया आप का । 
Shijju Shakoor साहब, बहुत-बहुत शुक्रिया आप का ।
Sushil Joshi साहब, इंतिख़ाब-ओ-दाद के लिए हम आप के दिल से शुक्रगुज़ार हैँ ।

Umesh Katara साहब, आप की दाद सर-आँखोँ पर । तह-ए-दिल से आप का शुक्रिया ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 12, 2013 at 10:57pm

कमर प्याला, सुराहीदार गर्दन, जिस्म मै’ख़ाना,

गुलाबी होँट अंगूरी, नशा छाये, सुभान’अल्ला!

है चेहरा, ईद का वो चाँद, जिस को देख कर, यारोँ,

झुका सजदे मेँ, हर काफिर, सदा आये, ‘सुभान’अल्ला’!.. . .

इन दो अश’आर में मजाज़ी और हक़ीक़ी इश्क़ का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत हुआ है. 

बधाई स्वीकारें.

Comment by umesh katara on November 9, 2013 at 9:59am

वाह्ह्ह्ह्ह्ह्
शानदार संदीप भाई जी
है चेहरा ईद का वो चाँद जिस को देखकर यारो
झुका सजदे में हर काफिर सदा आये सुभान अल्ला
दाद कबूलें आदरणीय

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 9:53am

अदा-शोख़ी क़यामत, सादगी-शर्म-ओ-हया ऐसी,

हक़ीक़त क्या, तसव्वुर भी मचल जाये, सुभान’अल्ला!

 

है चेहरा, ईद का वो चाँद, जिस को देख कर, यारोँ,

झुका सजदे मेँ, हर काफिर, सदा आये, ‘सुभान’अल्ला’!............... वाह वाह क्या कहने आ0 संदीप भाई जी..... बहुत खूब...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 6, 2013 at 11:15am

///तेरी खुशबू के रंगोँ से, बहारोँ की धनक महके,

तेरी आवाज़, क़ुदरत का सुकूँ, हाए, सुभान’अल्ला!/// Waah bahut badhiya daad kubul k

 

aren

Comment by शकील समर on November 6, 2013 at 10:53am

सुभान अल्लाह...क्या कहने।

कृपया ध्यान दे...

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