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वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ
ख़रीदो मुझे मैं बिका चाहता हूँ

मिरी ज़िन्दगी तो हुई ख़त्म,बेटे
मैं तेरे लिये सोचना चाहता हूँ

मुझे रोक लेती हैं मासूम कलियाँ
मैं ख़ुद से अगर भागना चाहता हूँ

मुझे उनकी ख़ुश्बू से महकाए रखना
मैं क्या तुझ से बाद-ए-सबा चाहता हूँ

लगाते हो क्यूँ दैर-ओ-मस्जिद प ताले
ख़ुदा का हर इक घर खुला चाहता हूँ

छियालीस डिग्री से ऊपर है गर्मी
मैं सावन की ठंडी हवा चाहता हूँ

"समर" अब ये क़िस्सा यहीं ख़त्म कर दो
सिफ़ारिश मैं तुम से किया चाहता हूँ

"समर कबीर"
मौलिक /अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 29, 2015 at 11:28pm

आदरणीय समर कबीर जी

उस्ताद का कमाल बेमिसाल 

अब सूरज को दीया भी दिखाते नहीं बनता 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 29, 2015 at 10:41pm

वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ
ख़रीदो मुझे मैं बिका चाहता हूँ
इस मतले ने देर चुप रखा है, आदरणीय समर साहब. मुझे भवानी प्रसाद मिश्र की वो कालजयी लम्बी कविता याद आ गयी, जिसमें वे गीत बेचने की बात करते हैं. इस मतले ने आज के संवेदनशील व्यक्तियों की विवशता को कितनी शिद्दत से प्रस्तुत किया है. बधाई, आदरणीय.

मुझे रोक लेती हैं मासूम कलियाँ
मैं ख़ुद से अगर भागना चाहता हूँ
वाह ! किस ऊँचाई तक ले गये आप इस शेर को या किस ऊँचाई पर जाकर यह शेर हुआ है ! सांसारिकता और आध्यात्मिकता के मूल मंतव्यों के बीच के कश्मकश को बहुत ही खूबसूरती से उभारा है आपने.

लगाते हो क्यूँ दैर-ओ-मस्जिद प ताले
ख़ुदा का हर इक घर खुला चाहता हूँ
सही बात ..

आपकी गहनता को सलाम.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 29, 2015 at 2:59pm

लगाते हो क्यूँ दैर-ओ-मस्जिद प ताले
ख़ुदा का हर इक घर खुला चाहता हूँ

छियालीस डिग्री से ऊपर है गर्मी
मैं सावन की ठंडी हवा चाहता हूँ

वाह! आ० समर सर! आपके रंग में रंगी सुन्दर गजल हुयी!हार्दिक बधाई प्रेषित है!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 29, 2015 at 10:58am

आदाब!   खूबसूरत गज़ल पर ढेरों दाद कुबूल करें. आ0 समर  भाई जी.

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