For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)

जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी
हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में
मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभी

हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से
हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी

सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी 
उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभी

हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे
ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर अभी

मंज़िल बुला रही है मुझे कब से दोस्तो
है मेरे  इंतिज़ार में सूनी डगर अभी

क्यों चहचहा रही हैंं परिंदों की टोलियाँ
सूरज है सर पे देख हुई दोपहर अभी

* मौलिक एवं अप्रकाशित.

Views: 137

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by सालिक गणवीर on July 8, 2020 at 7:44am

आदरणीय अमीरूद्दीन 'अमीर' साहिब

आदाब

ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ. ये  उस्ताद-ए-मुहतरम समर कबीर साहिब और आप जैसे गुणीजनों के मार्गदर्शन एवं स्नेह का ही परिणाम है कि मुझ जैसे अदने शाइर की रचना को फीचर ब्लॉग में स्थान मिला. इसके लिए मैं आप सब का एवं ओबीओ प्रबंधन का शुक्रगुजार हूँ. सादर.

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on July 7, 2020 at 12:11pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, शानदार ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ साथ ही ग़ज़ल को फीचर ब्लॉग में शामिल होने पर ख़ास मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए। सादर। 

Comment by सालिक गणवीर on July 7, 2020 at 6:47am

आदरणीय समर कबीर साहिब

आदाब.

टंकन त्रुटि का अंदाजा हो गया था उस्ताद-ए-मुहतरम, इसलिए रवि साहब द्वारा सुझाए गए मिसरे का इस्तेमाल कर लिया. बहुत शुक्रिया आपका. आपका दिन शुभ हो.

Comment by Samar kabeer on July 5, 2020 at 3:18pm

//जाना है एक दिन तो न कर फ़िक्र तू अभी//

मेरे सुझाए इस मिसरे में टंकण त्रुटि हो गई है,इसे यूँ पढ़ें:-

जाना है एक दिन तो न तू फ़िक्र कर अभी'

Comment by सालिक गणवीर on July 5, 2020 at 11:12am

प्रिय रुपम

आदाब

ग़ज़ल पर हाज़िरी और सराहना के लिए मश्कूर-ओ-ममनून हूँ. शुक्रिया बालक.

Comment by सालिक गणवीर on July 5, 2020 at 11:09am

आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' साहिब

आदाब.

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति एवं सराहना के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ. आपकआपकी इस्लाह का ही इंतिज़ार कर रहा था.आपके सुझाव पर अमल करने के बाद पुनः पोस्ट करता हूँ. सादर.

Comment by सालिक गणवीर on July 5, 2020 at 11:04am

आदरणीय समर कबीर साहिब

आदाब

ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और सराहना के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ. आपकी क़ीमती इस्लाह पर अमल करने के बाद ,पुनः पोस्ट करता हूँ. सादर

Comment by Samar kabeer on July 4, 2020 at 3:01pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

बहुत कुछ तो जनाब रवि भसीन जी बता चुके हैं,संज्ञान लें ।

'आयेगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी'

इस मिसरे में हालाँकि 'वफ़ात' का अर्थ मौत होता है,लेकिन इसके लिए 'आएगी' का प्रयोग उचित नहीं,इसके लिए 'वफ़ात पाना' ,'वफ़ात होना' जैसे शब्दों का प्रयोग उचित होता है,ऊला यूँ कर सकते हैं:-

'जाना है एक दिन तो न कर फ़िक्र तू अभी'

'हमने तो ओखली में रखा है जी सर अभी'

इस मिसरे में 'जी' शब्द भर्ती का है,इसे यूँ कर सकते हैं:-

'हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी'

'सच बोलने की अब सज़ा मिल जाएगी उसे'

इस मिसरे को यूँ करना उचित होगा:-

'सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी'

'हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं कहकहे'--"क़हक़हे"

'मंज़िल बुला रही है मुझे कब से बारहा'

इस मिसरे में 'कब से' के साथ "बारहा" शब्द उचित नहीं, "दोस्तो" कर सकते हैं ।


'है मेरे इंतजार में सूनी डगर अभी'--"इन्तिज़ार"

पारिवारिक कारणों से कुछ समय ओबीओ पर हाज़िर नहीं हो सकूँगा,सिर्फ़ तरही मुशाइर: में शिर्कत हो सकेगी, आपको कहीं मेरी ज़रूरत महसूस हो तो फ़ोन पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on July 4, 2020 at 12:23pm

आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, नमस्कार। बहुत अच्छे अशआर हुए हैं जनाब, मुबारकबाद क़ुबूल करें। बस ग़ज़ल का मतला थोड़ा खटक रहा है।

/आयेगी कल वफ़ात भी तू सब्र कर अभी
हँस,खेल,मुस्कुरा तू किसी से न डर अभी/
आदरणीय, सब्र उस चीज़ के लिए करने की सलाह दी जाती है जिसे पाने के लिए हम आतुर होते हैं, उस चीज़ के लिए नहीं जिससे हम डरते हैं और नहीं चाहते कि हमें मिले। मतले के लिए एक सुझाव पेश कर रहा हूँ:
221 / 2121 / 1221 / 212
जाना है एक दिन न मगर फ़िक्र कर अभी
हँस खेल मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

/आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में
मर-मर के जी रहे हैं यहाँ पर बशर अभी/
सानी में 'पर' के स्थान पर 'क्यूँ' कह कर देखिएगा, शायद आपको ज़ियादा उचित लगे।

/हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाए चोट से
हमने तो ओखली में रखा है जी सर अभी/
आदरणीय, 'जाए' की बजाए 'जाएँ' कहना मुनासिब होगा।
ये अशआर देखिएगा:
अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल
हम वो नहीं कि जिनको ज़माना बना गया
(जिगर मुरादाबादी)

हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर
बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएँगे
(शेख़ इब्राहीम ज़ौक़)

वो हम नहीं जिन्हें सहना ये जब्र आ जाता
तिरी जुदाई में किस तरह सब्र आ जाता
(परवीन शाकिर)

Comment by Rupam kumar -'मीत' on July 3, 2020 at 4:21pm

सर सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन क़ुबूल  किजीए।

हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाए चोट से
हमने तो ओखली में रखा है जी सर अभी

यह शेर हुआ आपका वाह!! क्या ही कहने वाह!!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post अहसास की ग़ज़ल :मनोज अहसास
"आदरणीय एवम आदरणीया साथियों का हार्दिक आभार सादर"
7 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on anjali gupta's blog post ग़ज़ल
"मुहतरमा अंजलि 'सिफ़र' साहिबा आदाब,  लाजवाब अश'आ़र के साथ शानदार ग़ज़ल कही है…"
7 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post ग़ज़ल को सँवारा है इन दिनों.- ग़ज़ल
"आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। उर्दू के…"
9 hours ago
आशीष यादव commented on आशीष यादव's blog post उसने पी रखी है
"आदरणीय श्री लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी, हौसला अफजाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।"
10 hours ago
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post वक़्त ने हमसे मुसल्सल इस तरह की रंजिशें (११९ )
"आशीष यादव जी , हौसला आफ़जाई के लिए दिल से शुक्रिया | "
10 hours ago
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post वक़्त ने हमसे मुसल्सल इस तरह की रंजिशें (११९ )
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी , स्नेहिल सराहना के लिए दिली शुक्रिया एवं सादर…"
10 hours ago
Rupam kumar -'मीत''s blog post was featured

मियाँ हमको ज़मीन-ओ-आसमाँ अच्छा नहीं लगता

बह्र- 1222×4मियाँ हमको ज़मीन-ओ-आसमाँ अच्छा नहीं लगताकहाँ जाए कि अब ये दो जहाँ अच्छा नहीं लगता…See More
12 hours ago
Arif is now a member of Open Books Online
12 hours ago
बसंत कुमार शर्मा posted a blog post

ग़ज़ल को सँवारा है इन दिनों.- ग़ज़ल

मापनी 221 2121 1221 212  हर आदमी ही वक्त का मारा है इन दिनों.  प्रभु के सिवा न कोई सहारा है इन…See More
12 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (मौत की दस्तक है क्या...)
"जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल…"
15 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on आशीष यादव's blog post उसने पी रखी है
"आ. भाई आशीष जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
16 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post मियाँ हमको ज़मीन-ओ-आसमाँ अच्छा नहीं लगता
"आदरणीय आशीष यादव जी, बहुत नवाज़िश हौसला अफजाई का। "
16 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service