बह्र: 22 22 22 22 22 2
रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए
जंगल का कानून है पहला, चुप रहिए
मँहगाई से पागल जनता, चुप रहिए
पूँजीपति को सारी सुविधा, चुप रहिए
प्रश्न किया तो कह देंगे गद्दार सभी
अवतारी है अपना राजा, चुप रहिए
राजसभा में न्याय खड़ा है घुटनों पर
कर दीजै फूलों की वर्षा, चुप रहिए
सच को फाँसी पर लटकाया राजा ने,
झूठ न बोला जाय तो भैया, चुप रहिए
एलमुनियम गुजराती, रस्सी अमरीकी
राजा ने पहना जो पट्टा, चुप रहिए
रूह मचलती है गर सच कह देने को,
होठों पर जड़ कर लीजै ताला, चुप रहिए
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मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल हो चला है.
मानव मन की आकांक्षाएँ सदैव अतृप्त रहती हैं. तभी तो मानवीय विकास का प्रमुख कारण बनती हैं. किंतु, लोकतंत्र के पहलुओं के बखान की जड़ें राजतंत्र की नमी से रस पाती हों तो अवश्य ही वैचारिकी के विन्यास में बहुत कुछ असहज है, जिसे लोकतंत्र को ही सही करना है. तथापि, इसके लिए जो कुछ करना आवश्यक है उसकी श्रेणीबद्धता प्रयास को सहज नहीं होने देती. अपनों का प्रयास चाहे जैसा अनगढ़, अबूझ, असंयत हो, उसे निस्संदेह स्वीकार करता हुआ कोई मन अपनों से विलग द्वारा किये जाते सद्कर्म तक में चाल का संधान पाता है. यह विडंबना ही है, परंतु, आजका यही सत्य है. ’लोक सग्रहमेवापि सं पश्यन कर्तुं अर्हसि’ का सशक्त ज्ञान चाहे जितना ही प्रेरित करने की क्षमता रखता हो, किसी विचार-विशेष के आलोक में ही उसे बूझने का हठ सामाजिक श्रेणियों के स्थायी होने का प्रमुख कारण बन गया है.
प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएँ ..
शुभातिशुभ
चुप रहिए... वाह क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.
रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए
जंगल का कानून है पहला, चुप रहिए... वाह ! क्या कमाल मतला हुआ है. इसमें शामिल व्यंग्य तो गजब ही कर रहा है. सभी अशआर आज की परिस्थिति पर पूरे दम से अपनी बात रख रहे हैं.शेर दर शेर बधाई स्वीकारें. सादर
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