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ग़ज़ल-रो पड़ेगा....बृजेश कुमार 'ब्रज'

1222     1222      122   

मिलेगा और  मिल  कर रो पड़ेगा

मुझे  देखेगा  तो  घर  रो  पड़ेगा

न जाने क्यों कहाँ खोया रहा हूँ

मेरी  आहट पे ही दर   रो पड़ेगा

मुझे  वो  भूल  जाने  के  लिये ही
करेगा  याद  अक़्सर  रो  पड़ेगा

हँसी मुस्कान होंठों  पे  सजाकर
कोई  इंसान  अंदर  रो  पड़ेगा


भले  ही  मौत  दे  देगा  मुझे पर
वो क़ातिल और खंज़र रो पड़ेगा

तुम्हारी आँख  से आँसू बहे गर
यहाँ  'ब्रज' में समंदर रो पड़ेगा
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 14, 2021 at 10:19pm

आदरणीय अमीरुद्दीन जी ग़ज़ल पे शिरकत और हौसलाफजाई के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 14, 2021 at 10:18pm

आदरणीय नीलेश जी...ग़ज़ल को बारीक नजर से परखने के लिए आपका हार्दिक आभार...मतले को लेकर आपका सुझाव बहुत ही खूब है...और आपके कहे अनुसार बाकी मिसरे मांजने की कोशिश करूँगा...स्नेह बनाये रखें...

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 14, 2021 at 5:02pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, ग़ज़ल की अच्छी कोशिश हुई है मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएं। गुणीजनों की बातों का संज्ञान लें। सादर। 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 14, 2021 at 8:51am

आ. ब्रज जी 
ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है.
मतले के मिसरे आपस में बदल कर देखें 

मिलेगा और  मिल  कर रो पड़ेगा
मुझे  देखेगा  तो  घर  रो  पड़ेगा... इससे बात थोड़ी लेट खुलती है और शेर चौंकाने वाला हो जाता है..
इस ग़ज़ल के कई मिसरे बहुत बारीक सी फाइन ट्यूनिंग चाहते हैं.. थोडा और समय दीजिये रचना को ताकि यह और निखर सके.
..
वो मुझ को भूल जाने ही की ज़िद में ..
करेगा याद अक्सर रो पड़ेगा .. ऐसे छोटे छोटे परिवर्तन ग़ज़ल रंग को और बढ़ाएंगे..
सादर 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 11, 2021 at 8:21pm

आदरणीय समर कबीर जी...रचना पटल पे आपका स्वागत संग आभार व्यक्त करता हूँ...दूसरे शे'र में कुछ सुधार की कोशिश करता हूँ और विराम चिन्ह वाली आपकी सलाह का आगे ध्यान रखूँगा... सादर

Comment by Samar kabeer on October 11, 2021 at 6:49am

जनाब बृजेश कुमार `ब्रज` जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें I 

`न जाने क्यों?कहाँ खोया रहा हूँ?
मेरी  आहट सुनी, दर   रो पड़ेगा`

इस शे`र के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है, देखिएगा I 

एक बात ये ध्यान में रखें कि ग़ज़ल में विराम चिन्हों का प्रयोग उचित नहीं होता I 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 10, 2021 at 10:16am

आदरणीय धामी जी...धन्यवाद स्नेह बनाये रखें...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 10, 2021 at 10:15am

ग़ज़ल पे आपकी हौसलाफजाई का शुक्रिया आदरणीय वर्मा जी...सदर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 9, 2021 at 6:46am

आ. भाई बृजेश कुमार जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Shyam Narain Verma on October 8, 2021 at 11:31am
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर

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