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मगर हम स्वेद के गायें - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२२ × ४


कहीं पर भूख  पसरी  है  फटे कपड़े पुराने हैं
भला मैं कैसे कह दूँ ये सभी के दिन सुहाने हैं।१।
**
वो गायें गीत फूलों के जिन्हें गजरे सजाने हैं
मगर हम स्वेद के  गायें  हमें पत्थर उठाने हैं।२।
**
पुछें हर आँख से  आँसू  हमारा ध्येय इतना हो
न सोचो चन्द साँसों हित यहाँ सिक्के कमाने हैं।३।
**
बसाना हो तो दुश्मन का बसा दो चाहे पहले पल
पहल अपने से ही  करना  अगर घर ही जलाने हैं।४।
**
नहीं ये ईश ने  बाँटा  मनुज का ही किया है सब
किसी को बोरियाँ भरदी किसी के हिस्से दाने हैं।५।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by नाथ सोनांचली on July 11, 2020 at 12:39pm

आद0 लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी सादर अभिवादन। सच बयानी करती हुई अच्छी ग़ज़ल कही है आपने। बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 7, 2020 at 1:46pm

आ. अनविता जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्ददिक आभार ।

Comment by Anvita on July 7, 2020 at 10:53am
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सादर नमस्कार बहुत सुंदर रचना है।मेरी बधाई स्वीकार करें ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 7, 2020 at 9:19am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 7, 2020 at 8:35am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन गज़ल।

कहीं पर भूख  पसरी  है  फटे कपड़े पुराने हैं
भला मैं कैसे कह दूँ ये सभी के दिन सुहाने हैं।१।
**

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 6, 2020 at 10:32pm

आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति , स्नेह व प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by Dayaram Methani on July 6, 2020 at 9:20pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, क्या खूबसूरत गज़ल लिखी है आपने। बहुत सुंदरता सं सच्चाई काे बयां किया है। इस बेहतरीन सृजन के लिए बधाई स्वीकार करें।

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