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बाँधा जो साँसों ने साँसों से धागा

बाँधा जो साँसों ने साँसों से धागा

आँसू में, कुछ मुस्कानों में

मिलन की वेला के सुख में मिश्रित

बिछोह की घड़ी की व्यथा अपार

डरते-मुस्कुराते चेहरे पर पाईं हमने

ढुलक आई थीं बूँदें जो भीगी पलकों से

मिला था उनमें प्राणों को प्रीति का दान

ऐसे में हृदय ने सुनी हृदय की मधुर धड़कन

मधुमय मूक स्वर उस अद्वितीय आलिंगन में

आच्छादित हुए ऐसे में ज्यों भीगे गालों पर गाल

मुझको लगा उस पावन पल वह आँसू नहीं थे

झर-झर आए अम्बर से थे वह स्वर सम्मोहन के

हँस दिए पल भर में गीले नयन तेरे, गीले नयन मेरे

एक ही लड़ी में मिलन-बिछोह की अनोखी घड़ी में

खिले थे अन्तर में मानो अप्रतिम रक्तिम गुलाब अनेक

ज्यों स्नेह में जुड़ी साँसो से साँसे, आँचल थामे तुम शरमाई 

कहो, एक संग चले आए कैसे सचमुच सारे के सारे मौसम

आए मधुमास-गीत बने ... वसन्त, वर्षा और शरद का शीत

न, न, अल्भय स्वप्न नहीं .. है ज़रूर यह तुम्हारी प्रीति की रीत

मिलन की मधुरिमा में मुखरित बिछोह की वेला

आए हैं मौसम तो आएगा हमारे जीवन में पतझड़ भी

बोलो, सदा आश्वासन बनी रहोगी न ओ’ प्राण-प्रिय

मेरी कवितायों की प्रतिमे

मेरे उलझे-उलझे सपनों की हलकी रेखा-छाया

तोड़ तो न दोगी बाँधा जो साँसों ने साँसों से धागा ?

                          -------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on March 18, 2020 at 4:13pm

आपका हार्दिक आभार, प्रिय मित्र लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 17, 2020 at 6:08pm

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by vijay nikore on March 17, 2020 at 2:52pm

आपका हार्दिक आभार, प्रिय मित्र श्याम जी

Comment by vijay nikore on March 17, 2020 at 2:52pm

आपका हार्दिक आभार, प्रिय भाई समर कबीर जी

Comment by Shyam Narain Verma on March 17, 2020 at 1:04pm
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर
Comment by Samar kabeer on March 17, 2020 at 7:08am

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब, बहुत अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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