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Julie's Blog (17)

"वो" और "मैं"...!!

((जब-जब 'खुद' को देखना चाहा... खुद को दो हिस्सों में बंटा पाया... कभी "वो" जो जीती ज़िन्दगी... तो कभी "मैं" जिसे जीती ज़िन्दगी... कुछ शब्द सिर्फ 'मेरे' बारे में... मेरी 'नज़र' में... मुझे जानने के लिये... मुझे समझने के लिये...))… Continue

Added by Julie on June 23, 2011 at 9:54pm — 9 Comments

बुलबुला...

          उठा था चमकता-दमकता....…

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Added by Julie on April 12, 2011 at 6:30pm — 4 Comments

ये "कैसी"... 'होली'...???

 

'हंसी-ठिठोली', मस्तियों की "टोली"... करें 'अठखेली', बन "हमजोली"...

हर 'साल' की तरह... लो फिर आई "होली"... ... ...…

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Added by Julie on March 19, 2011 at 6:30pm — 9 Comments

'औरत'... "आज"...!!

 

(("महिला-दिवस" पर महिलाओं को 'समर्पित'...))

----…

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Added by Julie on March 8, 2011 at 8:38pm — 9 Comments

ऐसी 'जिद'... ऐसा 'फितूर'...!!

कुछ 'ऐसी' ज़िद है...

ऐसा 'फ़ितूर' है...

नहीं तलाशनी पड़ती...

कोई 'वजह'...

हंसने-रोने को...

नाराज हूँ 'खुद' से...

या 'किस' से... "क्यों"...

नहीं जानती...

जानना 'भी' नहीं चाहती...

चल रही जिन 'राहों' में...

जाते 'किस' मंजिल...

नहीं 'पहचानती'...

क्यों नहीं आता कोई मोड़ 'नया'...

जहाँ "थम" जाऊं...

ना 'थकती' चल-चल…

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Added by Julie on January 18, 2011 at 12:00am — No Comments

पत्र: माँ के नाम...!!

माँ... ... ...

आज खुश हूँ बहुत...

शायद इसलिए... कुछ सूझ नहीं रहा...

लिखनें को... सिर्फ इस शब्द 'माँ' के…

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Added by Julie on December 15, 2010 at 9:00pm — 2 Comments

'ज़िन्दगी'... तू "ज़िन्दगी" क्यों है...???



बोझिल मन... आँखें... सांसें...

ऐसा तारतम्य...

ना देखा आज से पहले...

ऐसी सांठ-गाँठ...

क्यों नहीं कर पाती यें... खुशियों में...???

जितना खोलनें की कोशिश करती...

उतनी ही इसकी गांठें और गुथती जाती...

और उन गांठों में फंसती जाती...

ज़िन्दगी... ... ...

धीरे-धीरे घुटती... गिरती... संभलती...

पर उफ़ ना करती...

शायद अब इस घुटन से...

इस उतार-चढ़ाव से...

बाँध ली थी उसने भी गांठें…
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Added by Julie on November 23, 2010 at 9:00pm — 4 Comments

"माँ"



(ये मेरी पहली कोशिश है ग़ज़ल लिखनें की... जहाँ गलती हो कृपया करके बे'झिझक बताएं... शुक्रिया...!!)





सख्त रास्तों पर भी आसान सफ़र लगता है...

ये मुझे माँ की दुआओं का असर लगता है...!!



हो जाती है, बोझिल आँखें जब रोते-रोते...

माँ से फ़िर मुश्किल चुराना ये नज़र लगता है...!!



नहीं आती नींद इन मखमली बिस्तरों पर...

माँ की थपकियों का यादों में जब मंज़र लगता… Continue

Added by Julie on October 20, 2010 at 10:30pm — 12 Comments

"कवि"



((( यूँ तो हूँ साधारण-सी इंसान बस... पर आजकल भावनाओं को शब्द देने आ गया है और लोग मुझे 'कवि' (कवयित्री) के नाम से पुकारने लगे हैं... पर अभी इस उपाधि से हमें नवाज़ा जाए ये हम सही नहीं समझते... अभी ऐसे किसी विषय पर लिखा नहीं... मैं अभी "कवि" नहीं...!! ये रचना बस यही सोचते सोचते बन पड़ी के मैं कवि क्यूँ नहीं और कब होउंगी...!! -जूली )))



मैं "कवि" 'नहीं' हूँ... ...… Continue

Added by Julie on October 20, 2010 at 8:30pm — 5 Comments

"मैं और मेरा रावण"



इक अट्टहास... गूंजा...

पल को चौंक... देखा चारो ओर...

पसरा था सन्नाटा... ... ...

वहम समझ, बंद की फिर आँखें...

मगर फिर हुई पहले से भयानक, और ज्यादा रौद्र गूँज...

उठ बैठ... तलाशा हर कोना डर से भरी आँखों ने...

सिवाए मेरे और सन्नाटे के, ना था किसी का वजूद मगर...

तभी सन्नाटे को चीरती इक आवाज नें छेड़ा मेरा नाम...

कौन... ... ...???

बदहवास-सी... इक दबी चीख निकली मेरी भी...

तभी देखा... अपना साया... जुदा हो… Continue

Added by Julie on October 15, 2010 at 10:30pm — 17 Comments

"रंग"



जीवन... जीतें हैं लोग...

वही... जो, जैसा मिल जाता है उन्हें...

पर इस एक जीवन में... है एक और जीवन...

जिसे, अक्सर भूल जातें हैं हम...

वो है 'रंगों' का जीवन...

हर रंग एक जीवन खुद में...

हर जीवन एक रंग खुद में....

हर रंग की अपनी कहानी...

हर कहानी का अपना रंग...

खुशियाँ, उदासियाँ, उल्लास, विश्वास...

जीवन की तरह हर मोड़ है यहाँ...

हर खुशबू है, हर सपना है...



कभी उदासी में साथ… Continue

Added by Julie on October 9, 2010 at 5:00pm — 10 Comments

"तमन्नायें..."



ज़िन्दगी... ... ...

देती रही तमन्नायें...

उन्हें सहेजती रही मैं...

खुद में... ... ...

इस उम्मीद से...

कि कभी... किसी रोज़...

कहीं ना कहीं...

इन्हें भी दूँगी पूर्णता...

और करूँगी...

खुद को भी पूर्ण...

जिऊँगी तृप्त हो...

इस दुनिया से...

बेखबर... ... ...



पर... ... ...

नहीं जानती थी मैं...

कि तमन्नायें होतीं हैं...

सिर्फ सहेजने के लिये...

इन समंदर…
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Added by Julie on October 1, 2010 at 10:05pm — 5 Comments

"भईया"





नम आँखें...

आँखों में इंतज़ार...

कभी घड़ी को तकती...

तो कभी दरवाज़े की चौखट को...

और कभी थाली में सजी रेशम की डोर को...

उसमें सजे मोतियों की चमक में दिखता तेरा मुस्कुराता चेहरा...

और खो जाती मैं उस सुन्हेरे बचपन में...

जहाँ हर पल तेरा मुझे छेड़ना...

मुझे चिढ़ाना और चोटी खींचना...

तब भी आंसू देता था और आज भी...



तेरा शैतानियाँ करना और मेरा उन्हें माँ से छुपाना...

मुझे कोई रुलाये…
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Added by Julie on September 22, 2010 at 2:44am — 5 Comments

"कुछ पन्ने पुराने"





पुरानी डायरी देख...

खुल गये कुछ पन्ने पुराने...

कुछ सपने... कुछ अरमाँ... कुछ यादें...

जिन्हें कभी जीया था मैनें, यूँ ही...

यँहीं इन पन्नों में...

जिनकी भीनी-भीनी महक...

आज भी गुमा रही थी मुझे...



वही ताज़गी... वही एहसास... वही मासूमियत...

पर कुछ है...

जो अब वैसा नही...

क्या है...???

शायद... ’मैं’...???



हाँ... ’मैं’...!!

नही रही अब ’मासूम’...

नही रहे अब वो…
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Added by Julie on September 9, 2010 at 7:28pm — 8 Comments

"मैं खुश हूँ"



आज...

मैं बहुत खुश हूँ...

पूरी दुनिया 'कल' थी...

पर 'मैं' आज हूँ..

क्योंकि आ ज मिला है मुझे...

एक नया खिलौना...

जिसे सब कह रहे थे 'तिरंगा'...



कल था ये सबके हाथों में...

चाहता था मैं भी...

इसे छूना...

लहराना...

फेहराना...

पर किसी ने ना दिया इसे हाथ लगाना...

जैसे ना हो 'हक' मुझे इन सबका...



कल था तरसता सिर्फ 'एक' को...

आज पाया है पड़ा 'अनेक' को...

कल…
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Added by Julie on September 5, 2010 at 9:37pm — 4 Comments

चार पंक्तियाँ 'कान्हा' के 'नाम'...!!


घर तू आएगा ये जानती थी मैं...
इसलिए तो मटकी है जान के थोड़ी ऊँची बाँधी...
गुम हो तुझे कुछ पल निहार तो सकूँगी...
वरना तुझे देखने उमड़ पड़ती है हर पल गोपियों की आंधी...!!

::::जूली मुलानी::::
::::Julie Mulani::::

Added by Julie on September 2, 2010 at 1:30am — 2 Comments

"मेरा बेबस प्यार"







अब नहीं याद मुझे वो शैदाई ख्वाब, ऐ बेवफा सनम...

जिसमें तेरी आँखों में जन्नत नज़र आया करती थी...

जिसमें तेरी साँसों की गर्मी से मेरी ठिठुरन जाया करती थी...

जिसमें होती थी रौशन रोज़ चांदनी रातें...

जिसमें तेरी मेरी धड़कन कुछ बहक सी जाया करती थी...



अब नहीं मज़ा देती वो पूर्णमासी की रातें...

जिसमें सारी रात चंदा निहारते बीत जाया करती थी...

जिसमें जुगनुओं की चमक से आँखें चौंध जाया करती…
Continue

Added by Julie on August 31, 2010 at 9:00pm — 4 Comments

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