For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ARVIND BHATNAGAR's Blog (17)

वो एक नींद ही तो थी

वो एक नींद ही तो थी

कि जिसमे

मै जाग रहा था /

सपने

तितलियों से कोमल

हथेलिओं की कोटर में

छुपा कर

चला था मैं

कि

बिखेर दूंगा इन रंगों को

चुपचाप

आसमान के कोने कोने में,

और चल दूंगा

अपने झोले में

कुछ मुस्कुराहटें

कुछ खुशियां

कुछ उम्मीदें

कुछ शरारतें लेकर

एक खुशनुमा सफर पर

एक बंजारे सा भटकता हुआ

गांव - गांव

शहर - शहर

कि

शायद मेरा होना

किसी के होठों की…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on February 2, 2020 at 3:30pm — 4 Comments

तान्या :फिर मिलना कभी

मैं सोचता था

कि वह खो गया है कहीं

मगर

गुनगुनी धूप से धुली

उस सुबह

एक मोड़ पर

वह अचानक मिला

मैं जानता था

कि वह रुकेगा

वह रुक गया

मैं

यह भी जानता था

कि वह

मुझसे बातेँ करेगा

और वह

मुझ से बातेँ करने लगा

और तभी मैंने चाहा कि

मैं

उन अचानक मिले

कुछ पलों में

वे सारे स्वप्न साकार कर लूं

जो मैंने संजोये थे

मगर

उसके लिए ये पल तो

सिर्फ

कुछ पल थे ,

और वह…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on January 27, 2015 at 11:00pm — 8 Comments

तान्या : तुम्हे पा कर

तुम आये

मै खुश था

बहुत खुश /

मुझे घेर लेते थे

या कहो

कोशिश करते थे

घेर लेने की /

कुछ अहसास

उल्लास ,दर्प , ईर्ष्या ,द्धेष

सम्मान / कुछ मखमली से

कुछ अनजाने से भी

और मैं उड़ता था / परी कथाओं के

नायक की तरह

पंखों वाले सफ़ेद घोड़े पर

खुशगवार मौसम में

चमकीली धूप में

नीले आसमान में /

सर-सर चलती हवाएं से आगे

और आगे ।

और फिर

जैसा कि सुनता आया था सबसे/

कि ऐसा ही होता है /…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on May 3, 2014 at 8:00am — 11 Comments

तान्या : तुम बिन

दरवाज़ा तो मैंने ही खुला छोड़ा था 

कि तुम भीतर आओगे

और बंद कर दोगे /

मगर

खुले दरवाज़े से आते रहे

सर्द हवाओं के झोंके

और ठिठुरता रहा मैं /

चेतनाशून्य होने ही वाला था कि

किसी ने

भीतर आ के

दरवाज़ा बंद कर लिया /

अधमुंदी आँखों से मैंने देखा

वो तुम नहीं थे /

मगर वो गर्मी कितनी सुखद थी /

और फिर

ना जाने कैसे

कब से

पेड़ कि फुनगी पर

बैठा चाँद

चुपके से उतर कर

मेरी आँखों में…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on January 30, 2014 at 8:30pm — 14 Comments

तान्या : उन खामोश क्षणों में

इन खामोश क्षणों में

चाहा था

तुमको न याद करूँ /

लेकिन

बरखा की बूँदो के साथ

मेरा मन

भीग  गया /

और याद आये वो बादल ,

जो आये , छाये

और लौट गए

बिन बरसे ही /

लेकिन

मन के आँगन में

फूटी एक नन्ही कोंपल

मुरझाई नहीं

कुछ ज्यादा हरी हुई /

और याद आया

वो सपना

जिसमे तुम थे

मै भी न था

क्योंकि

वह मेरी आँखों का ही सपना था /

और याद आई

वो सूनी, गरम दोपहरी

करती ख़ामोशी से

इंतज़ार…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on November 6, 2013 at 10:30pm — 8 Comments

दीपावली : दो

माँ अभी तक काम से नहीं लौटी थी ।आठ साल कि बिरजू , दरवाजे पर बैठी, सामने आकाश में छूटती रंग- बिरंगी आतिशबाजी को मुग्ध भाव से देख रही थी । जिधर नज़र जाती दूर तक दीपों , मोमबत्तियों और बिजली की झालरों की कतारें दिखाई पड़ती थीं । अचानक बिरजू के दिमाग में एक विचार कौंधा। वह उठीं । अपने जमा किये पांच रुपये निकाले और दूकान से कुछ दीये खरीद लायी । झोपड़ी के कोने में बने चूल्हे के पास में रखी बोतल से सरसों का तेल निकाल कर उसने सारे दीयों में भर दिया । खाली बोतल वहीँ छोड़ कर उसने दियासलाई उठाई । तेल भरे…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on November 1, 2013 at 6:00am — 25 Comments

दीपावली : एक

घर में वह नोट कितना बड़ा लग रहा था , मगर बाज़ार में आते ही बौना हो कर रह गया । वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या खरीदें , क्या न खरीदें । मुन्ना निश्चय ही पटाखे - फुलझड़ियों का इंतज़ार कर रहा होगा । उसकी बीवी खोवा, मिठाई , खील- बताशे और लक्ष्मी - गणेश की मूर्तियों की आशा लिए बैठी होगी, ताकि रात की पूजा सही तरीके से हो सके ।



वह बड़ी देर तक बाज़ार में इधर उधर भटकता रहा । शायद कहीं कुछ सस्ता मिल जाए । मगर भाव तो हर मिनट में चढ़ते ही जा रहे थे । हार कर उसने कुछ भी खरीदने का इरादा छोड़ दिया ।…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on October 24, 2013 at 9:00pm — 23 Comments

ज़िन्दगी

जाने किस आशंका से
त्रस्त मन /
झंझावात मे
नन्हा सा दिया /
अब बुझा कि तब बुझा /
अर्थहीन शब्दों के सहारे
घिसटती ज़िन्दगी
क्या यही है ?
किम्वदन्ति बन गई है
तथागत को मिली शान्ति /
आत्म मंथन करने पर
कालिख ही कालिख हाथ लगी /
दोषारोपण सवेरो पर ,
सूरज की किरणे
किसी अंधी गली में सोई मिली ।

मौलिक एवं अप्रकाशित
अरविन्द भटनागर 'शेखर'

Added by ARVIND BHATNAGAR on October 22, 2013 at 9:30pm — 11 Comments

तान्या : वो लम्हा चित्रलिखित सा

हर इंसान के जीवन में

एक लम्हा

ऐसा आता है /

वक़्त नहीं थमता,

वह लम्हा

रह जाता है खड़ा हुआ

ज्यों चित्रलिखित सा ।

और कभी

जब चलते चलते

थक जाता है वक़्त

तो

इस लम्हे की छाया में

कुछ देर बैठ कर सुस्ताता है|

और कभी

जब बदली छा जाती है ,

और मन का पंछी

घबरा जाता है

तो यह लम्हा

इन्द्रधनुष सा

आसमान में बिखर जाता है /

और ये मौसम पहले जैसा खुशगवार

फिर हो जाता है ।

मै तो ऐसा…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on October 16, 2013 at 4:27pm — 15 Comments

तान्या : महसूस किया तुमको

इन मौन चट्टानों के सामने खड़ा

यह सोचता हूँ ,

कितनी कठोर हैं ये /

जितनी कठोर लगती हैं

क्या उतनी ही?

या कहीं ज्यादा ?

क्या भेद सकेगा कोई इनको?

और फिर मैं देखता हूँ

आकाश की ओर /

बदली छाई है ,

धूप का कतरा नहीं है ।

और फिर क्या देखता हूँ

तोड़ कर प्रस्तर कवच को ,

मोतियों सा झर रहा है ,

दुधिया झरना ।

भूल जाता हूँ मैं 

कि

कितने कठोर हैं ये पाषाण खंड ,

कि

मैं इन्हें भेद नहीं…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on October 2, 2013 at 12:30pm — 22 Comments

डर लगता है,

नींद कहीं फिर आ ना जाए , डर लगता है,

ख्वाब वही फिर आ ना जाए, डर लगता है ।

सावन सा वो बरस रहा है मन आँगन में ,

मौसम कहीं बदल ना जाए, डर लगता है…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on September 13, 2013 at 3:00pm — 21 Comments

पीछे मुड़ के नहीं देखना

जाने क्या क्या लोग कहेंगे , किस किस को समझाओगे ,

जिसको वफ़ा समझते हो, उस गलती पर पछताओगे ।

हँसते चेहरे ,सुंदर चेहरे , कितने भोले - भाले चेहरे ,

इस तिलिस्म में पड़े अगर तो , बाहर न आ पाओगे ।

आसमान  में  उड़ो  परिंदे , पंखों पर विश्वास करो ,

इस से ज्यादा खिली धूप और खुली हवा कब पाओगे ।

भींगी पलकें , उतरे चेहरे , वो सपनो का गाँव , गली ,

पीछे  मुड़  के नहीं  देखना, पत्थर  के  हो  जाओगे ।

चलो उठो दो चार कदम ही , उस…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on September 8, 2013 at 9:30pm — 16 Comments

शायद उनको प्यार आ जाए

पहरों उन के साथ बिताये ,

दिल की बात नहीं कह पाए ।

तेरी खिड़की तनिक खुली है ,

शायद धूप निकल ही आये ।

इसी आस पर जीते हैं हम ,

शायद उनको प्यार आ जाए ।

दिल की बात कहाँ तक माने ,

दिल तो हर शै पर आ जाए ।

आज खुले रखो दरवाजे,

आज कोई शायद आ जाए ।

उन के अफ़साने में सुनना ,

शायद मेरा नाम आ जाए ।।

मुझको खंजर मारने वाले ,

तुझको मेरी उम्र लग जाए ।

आते जाते मिल जाते हो…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on September 6, 2013 at 11:30pm — 13 Comments

तान्या : यूँ मिलना तुम्हारा

एक 

तुम

मुझे ऐसे मिले

जैसे कि मंदिर में किसी

देवता के आगे

फैली

अंजलि में

फूल

देव मस्तक का

आ कर के गिरे /

या किसी प्यासे पपीहे को

मिले

एक बूँद पानी ।

प्यार सी

नजरो को छू कर

तुम खिले ऐसे

कि जैसे

ऋतु बसंत में

किसी कम्पित डाली पर

सोई कली

मंद , शीतल पवन का

स्पर्श पा कर के खिले /

या खिले कवि ह्रदय कोई

देख कर वर्षा सुहानी…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on September 2, 2013 at 9:00pm — 15 Comments

तान्या : दो प्रेम कविताएँ

एक

चाँद झाँका

बादलों की ओट से ,

चाँदनी चुपके से आ

खिड़की के रस्ते,

बिछ गई बिस्तर पे मेरे/ 

और 

हवा  का एक झोंका,

सोंधी सी खुश्बू लिए

छू कर गया गालों को मेरे /

यूँ लगा मुझको कि

तुम सोई हो मेरे पास ,

मेरी बाहों के घेरे में /

लेकर होठों पर

एक इंद्रधनुषी मुस्कुराहट

तृप्त |

दो

सपने, तान्या

एक दम छोटे से बच्चे 

जैसे होते हैं/

अपने मे खोए…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on August 28, 2013 at 5:30pm — 14 Comments

दरख़्त

हैं दरख़्त जाने कितने , पर कहीं नही है साया , 

मेरी ज़िंदगी में यारों , ये क्या मु…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on August 24, 2013 at 7:30pm — 10 Comments

शज़र

शज़र

मेरे सीने में कोई प्यासा शज़र, अब तक है,

उसके अंदाज़ में मौसम का असर, अब तक है|

उसको मंज़िल मिली, वो चैन से सोने को गया,

मेरे हिस्से मे कोई तन्हा सफ़र ,अब तक है|

वो नही, नींद नही, फिर भी मैं खुश हूँ, गोया,

उसकी मासूम दुआओं का असर अब तक है|

उसकी ख्वाहिश कहीं मुट्ठी में बंद रेत ना हो,

मेरे अहसास में पैबस्त ये डर अब तक है|

मुझ से पूछा है कई बार, ढलते सूरज ने ,

यूँ तो 'शेखर' है तेरा नाम,…

Continue

Added by ARVIND BHATNAGAR on August 18, 2013 at 1:30pm — 5 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

TEJ VEER SINGH posted a blog post

संस्कार - लघुकथा -

संस्कार - लघुकथा -"रोहन यह क्या हो रहा है सुबह सुबह?""भगवान ने इतनी बड़ी बड़ी आँखें आपको किसलिये दी…See More
3 hours ago
vijay nikore posted a blog post

असाधारण सवाल

असाधारण सवालयह असाधारण नहीं है क्याकि डूबती संध्या मेंज़िन्दगी को राह में रोक करहार कर, रुक करपूछना…See More
3 hours ago
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' posted a blog post

सलाखों में क़फ़स के गर लगा ज़र(८२ )

(1222 1222 122 )सलाखों में क़फ़स के गर लगा ज़ररहेंगे क्या उसी में ज़िंदगी भर ?**किसी की ज़िंदगी क्या…See More
5 hours ago
dandpani nahak posted a blog post

ग़ज़ल 2122 1212 22

इश्क़ हो या कि हादसा कोईसब का होता है कायदा कोईवो पुराने ज़माने कि बात हैंअब नहीं करता हैं वफ़ा…See More
5 hours ago
Dr. Geeta Chaudhary commented on Samar kabeer's blog post "ओबीओ की सालगिरह का तुहफ़ा"
"आदरणीय समर कबीर सर नमस्कार, मैं भगवान से प्रार्थना करती हूं कि आपके भाई जल्दी ठीक हो जाए। सर हम सभी…"
20 hours ago
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post "ओबीओ की सालगिरह का तुहफ़ा"
"दोस्तो आदाब, इस समय मेरे छोटे भाई की तबीअत ठीक नहीं है,आप सबसे दुआ की दरख़्वास्त है,इसी कारण से इस…"
23 hours ago
Manoj kumar Ahsaas posted a blog post

ग़ज़ल मनोज अहसास

2×15एक ताज़ा ग़ज़लमैं अक्सर पूछा करता हूँ कमरे की दीवारों से,रातें कैसे दिखती होंगी अब तेरे चौबारों…See More
yesterday
Dr. Geeta Chaudhary commented on Samar kabeer's blog post "ओबीओ की सालगिरह का तुहफ़ा"
"आदरणीय समर कबीर सर, सुंदर प्रस्तुति, बिल्कुल सही कहा आपने बहुत ही अनोखा अनुभव इस मंच का। …"
yesterday
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) posted a blog post

ग़ज़ल: अमर नाथ झा

चाहते हो तुम मिटाना नफ़रतों का गर अँधेरा हाथ में ले लो किताबें जल्द आएगा सवेराहै जहालत का कुआँ गहरा…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

क्षणिकाएँ :

क्षणिकाएँ :थरथराता रहा एक अश्क आँखों की मुंडेर पर खंडित हुए स्पर्शों की पुनरावृति की प्रतीक्षा…See More
yesterday
कंवर करतार posted a blog post

ग़ज़ल

ग़ज़ल 1222    1222      1222       1222कोई कातिल सुना जो  शहर में है बेजुबाँ आयाकिसी भी भीड़ में छुप…See More
yesterday
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post ग़रीब हूँ मैं मगर शौक इक नवाबी है(८०)
"भाई Salik Ganvir  जी , उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार | "
yesterday

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service