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Aparna Bhatnagar's Blog (11)

मिनौती





(हर नारी मिनौती है .. यहाँ दृश्य अरुणाचल का है , इसलिए बांस, धान , सूरज , सीतापुष्प , पहाड़ के बिम्ब भी उसी प्रदेश के हैं. बरई, न्यिओगा वहाँ के लोक जीवन से जुड़े गीत हैं - जैसे हम बन्ना- बन्नी , आला , बिरहा से जुड़े हैं ... इस संगीत को बांसों से जोड़ा है .. जैसे बांस के खोखल से निसृत होकर ये मिनौती की आत्मा में पैठ गए हैं ... नारी के मन और आत्म को समझाते हुए पुरुष से अंतिम प्रश्न पर कविता समाप्त होती है ...)

मेरे बांस



पहचानते… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on October 16, 2010 at 5:00pm — 6 Comments

सब भर जाएगा



सब भर जाएगा !





रॉबिन तुम एकदम रॉबिन चिड़िया जैसे हो



छल्लेदार बाल , अकसर लाल रहने वाली दो गोल बड़ी आँखें



कभी उंघते नहीं देखा तुम्हे



माँ को कभी उठाना नहीं पड़ता



मुर्गे की एक सरल बांग पर उमड़ जाती है सुबह



और तुम नंगे पैर ही दौड़ जाते हो सागर के अंचल पर



अंतहीन बढ़ते कदम



रेत पर छापती चलती हैं नन्ही इच्छाओं के पैर



तुम चलते कहाँ… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on October 7, 2010 at 7:00am — 4 Comments

गौतम की प्रतीक्षा ?

कुछ तितलियाँ



फूलों की तलहटी में तैरती



कपड़े की गुथी गुड़ियाँ



कपास की धुनी बर्फ



उड़ते बिनौले



और पीछे भागता बचपन



मिट्टी की सौंध में रमी लाल बीर बहूटियाँ



मेमनों के गले में झूलते हाथ



नदी की छार से बीन-बीन कर गीतों को उछालता सरल नेह



सूखे पत्तों की खड़-खड़ में



अचानक बसंत की लुका-छिपी



और फिर बसंत -सा ही बड़ा हो जाना -



तब दीखना… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on October 4, 2010 at 5:00pm — 10 Comments

माही बह रही थी

माही नदी के पानी पर ढाक के पेड़ों की सुनहरी काली छाया , चांदी का वरक लपेटे बहता प्रवाह और किनारे की बजरी पर उगी नरम घास अनारो के कबीलाई मन के संस्कार बन चुके थे. उसका बचपन यहीं रेत में लोट-लोटकर उजला हुआ था. घंटों नदी के पानी में पैर डालकर बैठी रहती.छोटे-छोटे हाथ अंजुरी में पानी समेटते और हवा में कुछ बूंदें यूँ ही उछल जातीं. अनारो उन्हें लपकने की कोशिश करती और जब एक-आध बूंद उसके श्याम मुख पर गिरती तो खनखनाकर ऐसे हंसती कि सारा वातावरण उसकी हंसी से… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on October 1, 2010 at 7:30am — 6 Comments

सलुम्बर की वह काव्य संध्या



सलुम्बर की वह काव्य संध्या





आप हाड़ी रानी की कथा से कितने परिचित हैं , नहीं जानती .. मैं स्वयं भी कितना जानती थी , इस रानी को ! लेकिन इस नाम से पहला परिचय झुंझुनू शहर में जोशी अंकल द्वारा हुआ था . उन दिनों हम कक्षा नौ में थे . पापा की पोस्टिंग इस शहर में हुई ही थी. नए मित्र , नया परिवेश . मन में कई उलझनें थीं. जोशी अंकल हमारे पड़ोसी थे. बेटियां तो उनकी छोटी -छोटी थीं पर अंकल खासे बुज़ुर्ग लगते थे .. उनमें कुछ ऐसा था कि देखते ही… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 28, 2010 at 9:21pm — 2 Comments

विस्मृति

विस्मृति



पोस्त के लाल फूल

असंख्य

उन्हें छूकर बहती प्रमत्त हवा

ठंडी गुफा के मुहाने पर

पालथी मारे बैठा सूरज

देख रहा है फेनिल

धारा का झर-झर झरना ...

झागों के पत्ते अभी टूट कर बिछ गए हैं ..

पतझड़ जो लगा है ..

चट्टानों के बिछौनों पर ...

अपने चारों ओर

देवदार , चीड़ के गुम्बदों में कैद

एक फंतासी ...

जिस पर मखमल -सी बर्फ

अपना आसमान ताने खड़ी है



और ढरक रही है… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 23, 2010 at 3:00pm — 3 Comments

सफ़ेद कबूतर

कैसी तरखा हो गयी है गंगा ! यूँ पूरी गरमी में तरसते रह जाते हैं , पतली धार बनकर मुँह चिढ़ाती है ; ठेंगा दिखाती है और पता नहीं कितने उपालंभ ले-देकर किनारे से चुपचाप निकल जाती है ! गंगा है ; शिव लाख बांधें जटाओं में -मौज और रवानी रूकती है भला ? प्राबी गंगा के उन्मुक्त प्रवाह को देख रही है. प्रांतर से कुररी के चीखने की आवाज़ सुनाई देती है. उसका ध्यान टूटता है. बड़ी-बड़ी हिरणी- आँखों से उस दिशा को देखती है जहां से टिटहरी का डीडीटीट- टिट स्वर मुखर हो रहा था… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 22, 2010 at 10:07am — 11 Comments

बाहर बहुत बर्फ है

तुम्हारे देश के उम्र की है

अपने चेहरे की सलवटों को तह करके

इत्मीनान से बैठी है

पश्मीना बालों में उलझी

समय की गर्मी

तभी सूरज गोलियां दागता है

और पहाड़ आतंक बन जाते हैं

तुम्हारी नींद बारूद पर सुलग रही है

पर तुम घर में

कितनी मासूमियत से ढूंढ़ रही हो

कांगड़ी और कुछ कोयले जीवन के

तुम्हारी आँखों की सुइयां

बुन रही हैं रेशमी शालू

कसीदे

फुलकारियाँ

दरियां ..

और तुम्हारी रोयें वाली भेड़

अभी-अभी देख आई है

कि चीड और… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 20, 2010 at 4:00pm — 13 Comments

कहानी - वह सामने खड़ी थी

वह सामने खड़ी थी . मैं उसकी कौन थी ? क्यों आई थी वह मेरे पास ? बिना कुछ लिए चली क्यों गयी थी? न मैंने रोका, न वह रुकी. एक बिजली बनकर कौंधी थी, घटा बनकर बरसी थी और बिना किनारे गीले किये चली भी गयी . कुछ छींटे मेरे दामन पर भी गिरे थे. मैंने अपना आँचल निचोड़ लिया था. लेकिन न जाने उस छींट में ऐसा क्या था कि आज भी मैं उसकी नमी महसूस करती हूँ - रिसती रहती है- टप-टप और अचानक ऐसी बिजली कौंधती है कि मेरा खून जम जाता है -हर बूंद आकार लेती है ; तस्वीर बनती है -धुंधली -धुंधली ,सिमटी-सिमटी फिर कोई गर्म… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 19, 2010 at 5:00pm — 10 Comments

क्या स्वीकार कर पाएगी वह

क्या स्वीकार कर पाएगी वह ?



कोयला उसे बहुत नरम लगता है

और कहीं ठंडा ..

उसके शरीर में

जो कोयला ईश्वर ने भरा है

वह अजीब काला है

सख्त है

और कहीं गरम .!

अक्सर जब रात को आँखों में घड़ियाँ दब जाती हैं

और उनकी टिकटिक सन्नाटे में खो जाती है ..

तब अचानक कुछ जल उठता है ..

और सारे सपनों को कुदाल से तोड़

वह न जाने किस खंदक में जा पहुँचती है l





तभी पहाड़ों से लिपटकर

कई बादल… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 18, 2010 at 7:00pm — 8 Comments

जगाना मत !

कांपते हाथों से

वह साफ़ करता है कांच का गोला

कालिख पोंछकर लगाता है जतन से ..

लौ टिमटिमाने लगी है ..

इस पीली झुंसी रोशनी में

उसके माथे पर लकीरें उभरती हैं

बाहर जोते खेत की तरह

समय ने कितने हल चलाये हैं माथे पर ?

पानी की टिपटिप सुनाई देती है

बादलों की नालियाँ छप्पर से बह चली हैं

बारह मासा - धूप, पानी ,सर्दी को

अपनी झिर्रियों से आने देती

काला पड़ा पुआल तिकोना मुंह बना

हँसता है

और वह… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on September 17, 2010 at 5:00pm — 10 Comments

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