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All Blog Posts (19,173)

,हलचल मचाना चाहता हूँ ! ...

सम्वेदनाओं के शून्य को ,जगाना चाहता हूँ !

विचारो के उत्तेज से ,हलचल मचाना चाहता हूँ !



मर्म को पहचान, चोट करारी होनी चाहिए ,

बंद आँखों को नींद से ,जगाना चाहता हूँ !

…!!

खून की गर्म धारा ,बह रही ही जिस्म में ,

देश-भक्ति का इसमें ,उबाल लाना चाहता हूँ !



जज्बों में ना कमी हो तो ,समन्दर भी छोटा है ,

,आसमां में अपना तिरंगा फहराना चाहता हूँ !



कमी नही इस देश में, बौद्धिक शारीरिक बल की ,

‘कमलेश’ इसे विश्व शीर्ष पर पहुंचाना चाहता हूँ…
Continue

Added by कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा on July 6, 2010 at 11:03pm — 1 Comment

पल को लगा..!!!

अनजाने में छू गया था हाथ तेरा ,
पल को लगा मिल गया , तेरा ।

दिल ही तो है इसका क्या करें ,
न मिलो तो होता होगा, क्या हाल मेरा ।

ये ख्याल मुझे जीने नही देता ,
मिली तो क्या होगा सवाल तेरा ?

कटने को कट तो कट रही है जिन्दगी ,
क्यूँ की मेरे पास है जो रुमाल तेरा ।

ऐसे बेदर्द तो नही हो” कमलेश” ,
की जेहन में न आए ख्याल मेरा ॥

Posted in अहसास | Tags: पल,

Added by कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा on July 6, 2010 at 10:54pm — 2 Comments

कौन होना चाहता है...!!?

कौन होना चाहता है



यहाँ बे-आबरू ।



ये वक्त ही है ,

बे-शर्म बना देता है



हसरत मुझे भी थी,



आसमान छूने की ,



वक्त ,कोशिशों की सीढ़ी को ,



बे-वक्त गिरा देता है ।



संभल -संभल कर बढ़ रहे थे ,



जानिबे – मंजिल ,



जो कभी खत्म न हो राह ,



वक्त,पकडा वो सिरा देता है ।



टूटते हौंसलों को ,



कैसे सम्भाले ”कमलेश” ,



बसे बसाये घरौंदों पर ,



वक्त बिजली गिरा देता है… Continue

Added by कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा on July 6, 2010 at 10:50pm — 1 Comment

मेरा तन- मन उचाट क्यूँ है....???

मेरा तन- मन उचाट क्यूँ है? इस पूरे जहान से ,



चिड़ियों ने भी समेट लिये , घोंसले मेरे मकान से ।!





इंसानों में खुदगर्जी हो गयी ,इस कदर हावी ,



जड़ भी कहने लगे ,हम अच्छे है इस इन्सान से ।!



फिजां की इन सरसराती हवावों में है ,बू साजिश की



, इनकी दोस्ती से है कहीं अच्छी ,दुश्मनी तूफ़ान की ।!



कितना भी अफ़सोस कर लो, इस जमाने नीयत पर ,



कितने बेगुनाहों को गुजारा है ,इसने अपने इम्तिहान से ।!



‘कमलेश ‘अब भी बहुत कुछ है… Continue

Added by कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा on July 6, 2010 at 10:14pm — 2 Comments

गर तुम मेरे जज्बातों.....!!!

मेरी जिन्दगी में इतने झमेले ना होते
गर तुम मेरे जज्बातों से खेले ना होते ,


बहुत पर खुशनुमा थी मेरी यह जिन्दगी
गर दिखाए हसीं- ख्वाबों के मेले न होते ,


रफ्ता-रफ्ता चल रहा था कारवां जिन्दगी का
दुनिया की इस महफिल में हम अकेले न होते ,


''कमलेश'' ना लुटता दिले- सकूं मेरा कभी
गर मेरी नजरों के सामने ,तेरे हाथ पीले ना होते ,


हमेशा ही कहर बरपा है इश्क पर जमाने का
राहें फूलों की होती कांटे भी न नुकीले होते

Added by कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा on July 6, 2010 at 9:41pm — 3 Comments

फिर भी इम्तहान दिया मैंने ...!!!

कितना दिल लगाने से पहले, इत्मिनान किया मैंने ,

सच्ची है मुहब्बत 'का' फिर भी इम्तहान दिया मैंने ॥



कहने को तो मुहब्बत करना, गुनाह है इस जहाँ में ,

फिर भी करके मुहब्बत ,किया सबको हैरान मैंने ॥



हमारे इश्क की चर्चा है, शहर के ह़र मोड़ पर ,

इस तरह सारे शहर को, किया परेशान मैंने ॥



न छूटे दिल की लगी ,तेरी दिल-लगी में कहीं ,

कितना तेरे लिये दिल ,लगाना किया आशां मैंने ॥



तुझसे माँगा न कभी, तेरी चाहत के सिवा ,

तेरी चाहत की राहों में , सब… Continue

Added by कमलेश भगवती प्रसाद वर्मा on July 6, 2010 at 9:40pm — 1 Comment

विज्ञान ??? ईश्वर !!! (व्यंग्य-रचना)

प्रभु ! तू बता अपनी

सच्चाई,

क्योंकि,तू अब नहीं बचेगा,

देख,मनुष्य ने ली है

अंगड़ाई.

क्या तू है ?

तेरा अस्तित्व है ?

देख,

विज्ञान आ गया है,

तेरा अस्तित्व,

हटा गया है.

तू खुद सोच,

मनुष्य लगाता है,

तेरे कार्यों में अड़चन,

वह तेरा करता है खंडन.

वह खुद ही लगा है,

बनाने,बिगाड़ने

सपनों को,अपनों को.

वह खुद ही बन बैठा है

भगवान ?

अगर तू है तो रुका क्यों है,

भाग जा,

जा ग्रहों पर छिप… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 5, 2010 at 6:00pm — 3 Comments

भोजन क्या खाएँ क्या नहीं (महीनेवार विवरण)

प्रस्तुत पदों के रचयिताओं का नाम मुझे पता नहीं है. ये पद मेरे दादाजी सुनाया करते हैं.



1.



इस पद में यह बताया गया है कि किस माह में क्या खाना अच्छा होता है-



कातिक मूली , अगहन तेल,

पूष में करे दूध से मेल,

माघ मास घी खिचड़ खा,

फागुन उठ के प्रात नहा,

चइत (चैत्र) माह में नीम बेसहनी,

बैसाख में खाय जड़हनी,

और जेठ मास जे दिन में सोए,

ओकर जर (बुखार) असार में रोवे.

(भावार्थ-ऐसे व्यक्ति को बिमारी नहीं होती)



2.



इस… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 5, 2010 at 2:10pm — 3 Comments

मेघों का अम्बर में लगा अम्बार

मेघों का अम्बर में लगा अम्बार
थकते नहीं नैना दृश्य निहार
हर मन कहे ये बारम्बार
आहा!आषाढ़..कोटि कोटि आभार

धरा ने ओढी हरित चादर निराली
लहलहाए खेत बरसी खुशहाली
तन मन भिगोये रिमझिम फुहार
आहा! आषाढ़.. कोटि कोटि आभार


भीगे गाँव ओ' नगर सारे
थिरकीं नदियाँ छोड़ कूल किनारे
अठखेलियाँ करे पनीली बयार
आहा! आषाढ़. कोटि कोटि आभार
दुष्यंत...

Added by दुष्यंत सेवक on July 5, 2010 at 12:05pm — 9 Comments

नवगीत: निर्माणों के गीत गुँजायें... संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत:



निर्माणों के गीत गुँजायें...



संजीव वर्मा 'सलिल'



*

निर्माणों के गीत गुँजायें...



*



मतभेदों के गड्ढें पाटें,



सद्भावों की सड़क बनायें.



बाधाओं के टीले खोदें,



कोशिश-मिट्टी-सतह बिछायें.



निर्माणों के गीत गुँजायें...



*

निष्ठां की गेंती-कुदाल लें,



लगन-फावड़ा-तसला लायें.



बढ़ें हाथ से हाथ मिलाकर-



कदम-कदम पथ सुदृढ़ बनायें.



निर्माणों के गीत… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on July 5, 2010 at 8:49am — 4 Comments


प्रधान संपादक
ग़ज़ल - 4 (योगराज प्रभाकर)

मेरे बच्चों को खाना मिल गया है,

मुझे सारा ज़माना मिल गया है !



जबसे तेरा ये शाना मिल गया है,

आंसुयों को ठिकाना मिल गया है !



मेरा पडौस परेशान है यही सुनकर

मुझे क्यों आब-ओ-दाना मिल गया है!



तेरे आशार और मुझको मुखातिब,

मुझे मानो खजाना मिल गया है !



कलम उगलेगी आग अब यकीनन,

जख्म दिल का पुराना मिल गया है !



मेरे आशार और है ज़िक्र उनका,

दीवाने को दीवाना मिल गया है !



लुटेंगीं अस्मतें बहुओं की अब तो,

मेरे… Continue

Added by योगराज प्रभाकर on July 4, 2010 at 11:30pm — 10 Comments

बाल कविता: आन्या गुडिया प्यारी ---संजीव 'सलिल'

बाल कविता:



आन्या गुडिया प्यारी



संजीव 'सलिल'

*

*

आन्या गुडिया प्यारी,

सब बच्चों से न्यारी।



गुड्डा जो मन भाया,

उससे हाथ मिलाया।

हटा दिया मम्मी ने,

तब दिल था भर आया ।



आन्या रोई-मचली,

मम्मी थी कुछ पिघली।

नया खिलौना ले लो,

आन्या को समझाया ।



आन्या बात न माने,

मन में जिद थी ठाने ।

लगी बहाने आँसू,

सिर पर गगन उठाया ।



आये नानी-नाना,

किया न कोई बहाना ।

मम्मी को… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on July 4, 2010 at 12:05am — 3 Comments

क्या प्यार इसको कहते हैं ,

क्या प्यार इसको कहते हैं ,
पार्क में बेपरवाह बेसर्म सा ,
या बाइक पे भद्दा नुमाइस ,
या बुजुर्गो के सामने भी ,
बेसर्मो सा बेवहार करते हैं ,
क्या प्यार इसको कहते हैं ,
ना मैं तो इसे प्यार ना कहू ,
हमें तो लगता हैं ये हवास ,
यारो इस हवास को आप ,
प्यार का नाम मत दो ,
सोचो आपसे गुजारिस करते हैं ,
क्या प्यार इसको कहते हैं ?

Added by Rash Bihari Ravi on July 3, 2010 at 7:12pm — 1 Comment

प्यार तो मैं भी करता हूँ ,

प्यार तो मैं भी करता हूँ ,
पर कहने से डरता हूँ ,
कारण जग विदित हैं ,
उन्हें आरक्षण जो मिला हैं
इसी से डरता हूँ ,
शादी हम से करे ,
आरक्षण का फायदा ,
कही और उठायें ,
कारण यही हैं ,
कदम उठाने से डरता हूँ,
प्यार तो मैं भी करता हूँ ,

Added by Rash Bihari Ravi on July 3, 2010 at 3:30pm — 3 Comments

मिल गये

जो थे अरसे से खामोश मेरे इन होठों को तराने मिल गये

लड़ा पत्थरों से कुछ ऐसे की हीरों के खजाने मिल गये



गया मेरी जिंदगी से, मुझे मरने के लिए छोड़ गया वो

अब भी हूँ जिंदा मस्ती मे, मुझे जीने के बहाने मिल गये



जो था मेरा अपना वो मुझसे अब नज़रें चुराने लग गया

पर इस महफ़िल मे हंसकर गले मुझसे बैगाने मिल गये



घर से मिकला था की जाऊँगा मंदिर पर अभी तो नशे मे हुँ

अगली ही गली मे मुझे ये कितने सारे मयखाने मिल गये



गया था कुछ बैगानों की महफ़िल मे कल… Continue

Added by Pallav Pancholi on July 2, 2010 at 11:46pm — 4 Comments

कवि घाघ और उनकी बहू के बीच परिसंवाद

उत्तर भारत में घाघ नामक एक बहुत प्रसिद्ध किसानी कवि हुए थे.

उनकी रचनाएँ आज भी ग्रामीणों द्वारा कही-सुनी जाती हैं.

उनकी बहू भी बहुत बुद्धिमान थीं.

नीचे की संकलित रचनाओं में उनके परिसंवाद हैं :-



1.

घाघ कहते हैं :-



पउआ पहिन के हर जोते,

सुथनी पहिन के निरावे,

कहें घाघ उ तीनों भकुआ,

सिर बोझा ले गावे.



घाघ की बहू कहती हैं :-



अहिरा हो के हर जोते,

तुरहिन हो के निरावे,

छैला होके कस न गावे,

हलुक बोझा जो… Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 2, 2010 at 3:24pm — 4 Comments

सभ्यता की पहचान

दिन,प्रतिदिन,

हर एक पल,

हमारी सभ्यता और संस्कृति में

निखार आ रहा है,

हम हो गए हैं,

कितने सभ्य,

कौआ यह गीत गा रहा है.

पहले बहुत पहले,

जब हम इतने सभ्य नहीं थे,

चारों तरफ थी खुशहाली,

लोगों का मिलजुलकर,

विचरण था जारी,

जितना पाते,

प्रेम से खाते,

दोस्तों पाहुनों को खिलाते,

कभी-कभी भूखे सो जाते.

आज जब हम सभ्य हो गए हैं,

देखते नहीं,

दूसरे की रोटी,

छिनकर खा रहे हैं,

और अपनों से कहते हैं,

छिन…
Continue

Added by Prabhakar Pandey on July 2, 2010 at 3:16pm — 4 Comments

पर चर्चा के आनंद

पर चर्चा के आनंद

एगो भोजपुरी साईट के स्वघोषित स्वयम्भू आ उनकर कुछ चाटुकार मित्र मंडली समय -समय पर भोजपुरी भासी लोगन के इ एहसास करावत रहेला की उ लोग के अलावे पूरा बिहार ,उत्तरप्रदेश ,झारखण्ड, के बारे में केहू सोचे वाला नइखे (पता ना सोच -सोच के का भला करले बा लोग) | समय -समय पर अपना उत्क्रिस्ट (बिखिप्त) भासा से समझावे के बेजोड़ कोशिश करे ला लोग | आ एहू बात के ख्याल रखे ला लोग की उ लोग के बराबरी केहू खाड़ा ना होखे पावस | आ आपन हर लेख के माध्यम से ई एहसाश करावे ला लोग की उ लोग जौन लिखलस उ… Continue

Added by BIJAY PATHAK on July 2, 2010 at 2:10pm — 3 Comments

वर्षा एक --रूप अनेक

जयेष्ट की गर्मी से झुलसी

धरती को

वर्षा की पहली बूंदों से

ख़ुशी मिली

मानो .....

लंका दहन के बाद

हनुमान जी कूदें हो

समुद्र में ॥



सूर्य के अंगारे झेल रही

वर्षा की पहली बूंदों से

किसानों को

ख़ुशी मिली

मानो .....

रावण -वध के बाद

रामचंद्र जानकी सहित

लौटे हो अयोध्या ॥



वर्षा की पहली बूंदें

धरती पर जैसे गिरी

माँ ने .....

गाय के गोबर से बने

सारे उपले

घर के अन्दर कर ली ॥



वर्षा की… Continue

Added by baban pandey on July 2, 2010 at 8:31am — 2 Comments

मुक्तिका: ज़ख्म कुरेदेंगे.... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



ज़ख्म कुरेदेंगे....



संजीव 'सलिल'

*

*

ज़ख्म कुरेदेंगे तो पीर सघन होगी.

शोले हैं तो उनके साथ अगन होगी..



छिपे हुए को बाहर लाकर क्या होगा?

रहा छिपा तो पीछे कहीं लगन होगी..



मत उधेड़-बुन को लादो, फुर्सत ओढ़ो.

होंगे बर्तन चार अगर खन-खन होगी..



फूलों के शूलों को हँसकर सहन करो.

वरना भ्रमरों के हाथों में गन होगी..



बीत गया जो रीत गया उसको भूलो.

कब्र न खोदो, कोई याद दफन होगी..



आज हमेशा… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on July 1, 2010 at 10:48pm — 3 Comments

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