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AVINASH S BAGDE's Blog (80)

7..हाइकु....

हाइकु....
-----------
तेवर भी है
अंग-अंग सोने सा
जेवर भी है.
-------------
नही सूरत
सोच बदल डालो
है जरुरत.
----------
जान बचाओ
खतरे ही खतरे 
बाज तो  आओ.
-----------
मुर्गी क़े लिए
लड़ते बदस्तूर
कुर्सी क़े लिए
-------------
लड़कियां हैं
ताजगी साथ…
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Added by AVINASH S BAGDE on June 13, 2012 at 8:30pm — 11 Comments

सुग्गे!!!..............(लघुकथा)

सुग्गे!!!

(लघुकथा)
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रोज की तरह आज भी रमेश सायकल पर सुग्गों  के पिंज़रे लटका कर बेचने के लिये निकला.आज की धूप सुबह से ही चिलचिलाती सी थी.
दिनभर आवाज लगा-लगा कर रमेश का गला सूखा जा रहा था.पूरब की लाली धीरे-धीरे पश्चिम के आकाश को लाल करने लगी थी मगर एक भी सुग्गे की बिक्री का संयोग रमेश के भाग में नहीं आया.धूप से बेहाल,थक कर चूर, रमेश सुग्गों के पिंज़रों से भरी…
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Added by AVINASH S BAGDE on June 11, 2012 at 7:30pm — 8 Comments

दो कुण्डलियाँ......

दो कुण्डलियाँ......
१-डॉलर  के कॉलर!

डॉलर  के कॉलर खड़े,रूपया है कमजोर.

महंगाई की डोर  का,दिखे ओर ना छोर.
दिखे ओर ना  छोर ,पकड़ कर कैसे रोकें.
आम-आदमी यहाँ,खा रहा पल-पल धोखे.
'कहता है अविनाश' ,हाल है बद से बदतर!
कितने होंगे कड़क,और डॉलर के कॉलर?
-----------------------------------------
२-बढे कलंकित कर्म!!!
---------------------------------------------

ऐसे…
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Added by AVINASH S BAGDE on June 4, 2012 at 7:30pm — 10 Comments

कटाक्ष... क्रिकेट बनाम थप्पड़-मुक्केबाजी........!

कटाक्ष... क्रिकेट बनाम थप्पड़-मुक्केबाजी........! भाई साहब, क्रिकेट इक दर्शन है.... आय. पी . एल.' उसका विराट प्रदर्शन है.आज देश की पहचान पूरे विश्व में इसी कारण है.वो कितने अफसोसनाक दिन थे जब हमारे देश को घोर गरीबी क़े कारण जाना जाता था.आई पि एल ने हमारे प्रति दुनिया का नजरिया ही बदल दिया. आज क्रिकेट में क्या नही है!! शोहरत है..पैसा है...ऐय्याशी क़े छलकते जाम है ..मरमरी बांहें हैं ..शोख निगाहे है...चमकते सितारे है...संसद में दारू बनाने,पीने-पिलाने वालो का नेतृत्व करने वाले हस्ताक्षर…

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Added by AVINASH S BAGDE on May 22, 2012 at 2:44pm — 10 Comments

दर्द-ए- तिहाड़ जेल!!!!...कटाक्ष.

दर्द-ए- तिहाड़ जेल!!!!

"वो भी क्या दिन थे! करुणा की कनीमोजी...बड़े खिलाडी या खिलाडियों के खिलाडी कलमाड़ी.....और टेलीकाम के एक-छत्र राजा -धिराज  यानी ए.राजा और ...'करलो दुनिया मुट्ठी में' के दो-चार बड़े बाबू... जैसे सारे लोग अपनी मुट्ठी में थे...!!!!"सर पे हाथ रख कर  आज तिहाड़ जेल की आत्मा विलाप कर रही है.उसका विलाप करना भी लाजिमी ही है.साल भर से देश की मिडिया की सुर्खियाँ बटोरने का चस्का जो लग गया था तिहाड़ को.. राजाज का छींकना...कनीमोजी के मेकअप में उंच-नीच...कलमाड़ी…
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Added by AVINASH S BAGDE on May 20, 2012 at 3:30pm — 14 Comments

दस हाइकु

हाइकु...

१..

बचपन में

सहारा लगता है

पचपन में

. ----

२.

अदालत है

देखो फंस ना जाना

पुलिस-थाना..

 -----

३.

साँझ ने घेरा

गहरा है अँधेरा

कहाँ सबेरा...

४.

अदावत में

बच नहीं पावोगे

अदालत में .

५.

यह तस्वीर

हैं रंग कैसे- कैसे

ये तकदीर ..

६..

धर्म अपना

ईमान भी अपना

कर्म अपना.

७..

कर्ज में डूबे

बढ़े बचाने हाँथ

फ़र्ज़ में डूबे.

८.

देश…

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Added by AVINASH S BAGDE on May 11, 2012 at 4:30pm — 8 Comments

छन्न पकैया .......

छन्न पकैया .......

छन्न पकैया - छन्न पकैया, सूरज दावानल है.
सूख रहीं हैं नदियाँ सारी, सड़के रहीं पिघल हैं.
**
छन्न पकैया - छन्न पकैया,जलता आलम सारा.
थर्मा-मीटर की नलिका में, ताव मारता पारा.
**
छन्न पकैया - छन्न पकैया, बीसुर रही हरियाली.
मुरझाते फूलों के मुख से , हुई  नदारत लाली.
**
छन्न पकैया - छन्न पकैया,लस्सी,कुल्फी,मठ्ठा,
तीनो…
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Added by AVINASH S BAGDE on May 4, 2012 at 10:00am — 17 Comments

पेश है हाइकु....

पेश है हाइकु....

१.लाल हथेली
   शगुन के बहाने
   मेहंदी खिली.
२.मिली बधाई
   सपना सच हुआ
   बेटी पराई.
३.सु-संस्कार
   दफना दिये मूल्य
   बंगला-कार
४.करेला है
   नीम के झाड़ पर
   खूब खेला है.
५.धोबी बेचारा
    घर का न घाट का
    गधा सहारा.
६.ये घटनाएँ
   …
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Added by AVINASH S BAGDE on April 25, 2012 at 1:12pm — 13 Comments

gazal...

पतंगों को यूँ  ढील मत देना.

कभी झूठी दलील मत देना.
हालात बना देंगे मजबूर तुझे.
नादान हांथों में कील मत देना.
 दुनिया है ये ताड़ बना सकती है 
इसकी हथेली पर तील मत देना
जिरह करनी है अपने-आप से गर.
खुद को जज्बातों का वकील मत देना.
तुम्हारे घर भी इज्जत का सामान है!
सरे -राह  इशारे  अश्लील मत देना.
अविनाश बागडे.

Added by AVINASH S BAGDE on April 23, 2012 at 10:10am — 10 Comments

महकायो इस जग को.



लम्हा-लम्हा सरक रहा है,

     जीवन तेरा- मेरा.
साँस चले तक सब कुछ समझो,
     उसके बाद अँधेरा!
सफ़र अनिश्चय-भरा हुआ है,
     ठौर नहीं है बस में.
जाने कब उठ जाये जग से,
      जीवन का ये डेरा. 
कितना भी तुम रहो संभाले,
       जीवन की  ये जेबें.
हालातों की रेज़र ले के
     बैठा वक़्त…
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Added by AVINASH S BAGDE on April 11, 2012 at 2:30pm — 5 Comments

कुछ दोहे.

कुछ दोहे.
१- संस्कारित माँ-बाप की,मिलती जिनको सीख.
   नहीं  मांगते  चंदा  वो,  नहीं   मांगते   भीख.
**
२- बांध सकी ना डोर से,कभी न कोई प्रीत.
    आया है तो जायेगा,जीवन की ये रीत.
**
३- लय  से ही संसार है, लय का  नाम  ह्रदय.
    लय का छूटा साथ जो, लय के बिना प्रलय.
**
अविनाश बागडे...नागपुर.

Added by AVINASH S BAGDE on April 3, 2012 at 9:59am — 10 Comments

ग़ज़ल.



प्यार की मीठी बातों क़े माने ग़ज़ल,..
इश्क करते है जो वो ही जाने ग़ज़ल.
**
गोया गागर में सागर समाया करे,...
चंद लफ़्ज़ों में कहती फ़साने ग़ज़ल....
**
प्यार पर ही टिका है ये सारा जहाँ,...
बात सबको लगी है बताने ग़ज़ल.....
**
रौब अपना जमाने यहाँ बज़्म में,..
छेड़ देते है यूँ  ही सयाने ग़ज़ल.....
**
चांदनी रात में देख उनकी…
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Added by AVINASH S BAGDE on March 27, 2012 at 11:22am — 12 Comments

ग़ज़ल.

तोड़ो इन्हें की अब तो मुरझा रहे है फूल.

डाली पे रहते-रहते उकता रहे है फूल.

.

जाते समय तो घर से जुड़े में हंस रहे थे

लौटते कदम है,कुम्हला रहे है फूल.

.

ख़ुशबुओ का लेकर पैगाम साथ-साथ

दोनों दिलो क़े रिश्ते सुलझा रहे है फूल.

.

देने को सब खड़े है बस आखरी सलाम.

मिटटी बनी है देह सुस्ता रहे है फूल.

.

महका रहे थे महफ़िल रातो को देर तक.

घूरे की शान अब तो बढा रहे है फूल.

.

अविनाश…

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Added by AVINASH S BAGDE on March 22, 2012 at 10:30am — 12 Comments

बस!

बस! 
-----

कभी 

प्यादों सी
बेबसी को
जीता!
कभी
ढाई -घर 
उछलती 
अश्व -शक्ति के
जोश में
उफनता!
कभी 
ऊँट की
आडी -तिरछी
तिरपट-चालों का
नशा ढोता !
कभी
कोने में बैठे
हाथी की
कुंद होती
बुद्धिमत्ता का
अहसास झेलता!
कभी
मंत्री…
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Added by AVINASH S BAGDE on March 16, 2012 at 10:25am — 16 Comments

खुशबू के घर

दुआ जिनको सच्चे दिलों से मिले.

ऐसे बन्दे बड़ी मुश्किलों से मिले!
*
रहगुज़र जिनकी बस खार ही खार थी,
उनकी खुशबू के घर मंजिलों पर मिले.
*
क़त्ल करके खुले आम जो छिप गए,
सरे - शाम वो  महफ़िलों  में  मिले.
*
जिनकी बैठक शहर के अखाड़ों में थी, 
वक़्त आया तो  वे  बुजदिलो में मिले.
*
चार पैसे जो मुट्ठी में क्या आ गए,
यार बिछड़े हुये तंगदिलों में…
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Added by AVINASH S BAGDE on March 13, 2012 at 11:04am — 6 Comments

हर दिल अज़ीज़....

हर दिल अज़ीज़....

रिश्तों को निभा लेने की जिसमे तमीज है,
यकीन मानिये   वो ,   हर-दिल- अज़ीज़ है.
#
ठहरा रहे जमीं को, क्योंकर कुसूरवार,
पौधे  वही  उगेंगे,  बोये  जो  बीज है!
#
उनको दवा न दीजिये,आँखों क़े मर्ज़ की,
नज़रें   चुरा  रहें  वो, दिल क़े मरीज़ हैं.
#
पत्थर सा सख्त चेहरा,रखते हैं जो यहाँ,
दो  घडी  में  पर  वो,  जाते  पसीज…
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Added by AVINASH S BAGDE on March 10, 2012 at 10:51am — 14 Comments

लघुकथा--हेलमेट.

सरकार ने सख्ती दिखाई.फिर से हेलमेट की दुकानें सज गई.गोविन्द ने भी कुछ पैसे जमाये और एक हेलमेट की दुकान सड़क के किनारे खोलकर बैठ गया. धंधा चल निकला.लोगों के सरों की हिफाज़त के सरकारी फरमान के चलते गोविन्द और उस जैसे कई बेरोजगारों को काम मिल गया. तभी एक दिन दोपहर के वक़्त एक अनियंत्रित ट्रक गोविन्द की दुकान पर चढ़ गया. तमाम हेलमेट सड़क पर इधर-उधर बिखर गए. पुलिस वाले उन्ही हेलमेटों के बीच गोविन्द के धड से अलग हुये सिर की तलाश कर रहे थे..

....... अविनाश बागडे.

Added by AVINASH S BAGDE on February 23, 2012 at 10:00am — 5 Comments

चमत्कार बेच के...

राह में खड़े हो यूँ घर-बार बेच के,

अपना बसा-बसाया ये संसार बेच के.
किसने तुम्हे सताया के करते हो ख़ुदकुशी,
लड़  रहे हो म्यान से,  तलवार बेच के!
बख्शेंगी तुम्हे क्यों ये समंदर की मछलियाँ!
खे   रहे  हो   नाव  यूँ  पतवार   बेच   के.
कैसी रवायतें   हैं ये  कैसा   समाज है?
दुल्हन खड़ी है हाट  में सिंगार बेच के!!
आवाज़ तेरी गूँज के रह जाएगी यहाँ,
तू फिरेगा यूँ तेरे अधिकार बेच…
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Added by AVINASH S BAGDE on February 15, 2012 at 11:00am — 4 Comments

पाँच हाइकू

 दिल लगाया.

वादे बहुत किये.

मोल चुकाया! 

*

बाज,बाज है.

गिद्ध, ' दृष्टि' रखता.

चालबाज है.

*

अजगर भी.

बैठ-बैठ के खाते.

अफसर भी! 

*

रंग-बिरंगी.

गलियाँ जीवन की.

बड़ी बेढंगी!

*

खून खौलता.

मुट्ठियाँ भींच जाती.

मुख बोलता.

*

अविनाश बागडे.

Added by AVINASH S BAGDE on February 11, 2012 at 10:30am — 8 Comments

छन्न पकैया

छन्न पकैया-छन्न पकैया, जीवन तेरा- मेरा.

रोज डूबता सूरज इसमे, होता रोज सबेरा.

**

छन्न पकैया-छन्न पकैया, सांसें आती-जाती.

चलने का मतलब है जीवन,रुकना मौत कहाती.

**

छन्न पकैया-छन्न पकैया, सुख ही दुःख का कारण.

इस धरती पर कोई घटना , होती नही अकारण.

**

छन्न पकैया-छन्न पकैया, कह गए ज्ञानी-ध्यानी.

अपना ही गुण-धर्म निभाते, हवा,आग और पानी.

**

छन्न पकैया-छन्न पकैया, धर्म वही है सच्चा.

जिसे जानता वसुंधरा का, साधो, बच्चा-बच्चा.…

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Added by AVINASH S BAGDE on February 6, 2012 at 8:00pm — 5 Comments

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