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Meena Pathak's Blog (58)

खुशियों के हम दीप जलाएं

खुशियों के हम दीप जलाएं

जग में उजियारा फैलाएं  



हो हमसे कोई हृदय दुखी

वहाँ  प्रेम का बीज बो आयें

खुशियों के हम दीप जलाएं

जग में उजियारा फैलाएं 



हो न कोई भूखा, ग़मगीन

हों सब रोजगारी व ज़हीन

खुशियों के हम दीप जलाएं

जग में उजियारा फैलाएं 



निर्भय हो समाज में सभी जहाँ

बेटियों का हो सम्मान जहाँ  

खुशियों के हम दीप जलाएं

जग में उजियारा फैलाएं



भाई हों राम लक्ष्मण जहाँ

ना हो सीता वनवास जहाँ   …

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Added by Meena Pathak on December 5, 2013 at 4:30pm — 18 Comments

चलो मिलते हैं वहाँ ........ मीना पाठक

धरती के उस छोर पर 

धानी चूनर ओढ़ कर    

वसुधा मिलती हैं अनन्त से जहाँ

चलो मिलते हैं वहाँ !!

 

बन्धन सारे तोड़ कर

लहरों की चादर ओढ़ कर

दरिया मिलता है किनारे से जहाँ

चलो मिलते हैं वहाँ!! 



पर्वतों से निकल कर

लम्बी दूरी चल कर

नदियाँ मिलती है सागर से जहाँ

चलो मिलते हैं वहाँ!! 



बसंती भोर में

खिले उपवन में

भँवरे फूलों से मिलते हैं जहाँ

चलो मिलते हैं वहाँ !!



स्वाति नक्षत्र के

वर्षा की…

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Added by Meena Pathak on November 28, 2013 at 6:11pm — 32 Comments

इस दीपावली एक संकल्प लें

समाज की अति व्यस्तता में मगन हम आनंद का अनुभव करने के लिए विशेष अवसरों की खोज करतें हैं | त्यौहार उन विशेष अवसरों में से एक है | ये हमारे जीवन में नयापन लाते हैं, आनन्द और उल्लास पैदा करते हैं | हमारे त्योहारों में दीपावली का विशेष स्थान है | दीपावली का साधारण अर्थ दीपों की पंक्ति का उत्सव है और दीपक का प्रकाश ज्ञान और उल्लास का प्रतीक है | दीपावली कब और क्यों मनाया जाता है ये तो हम सभी जानते हैं | इसके बारे में अनेक सांस्कृतिक,ऐतिहासिक एवं धार्मिक परम्पराएं और कितनी कहानियां प्रचलित हैं ये…

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Added by Meena Pathak on October 29, 2013 at 8:30pm — 19 Comments

कभी आत्ममन्थन करना -- मीना पाठक

दिए दिन, महीने, बरस

जीवन के अनमोल पल

तुम्हारी तल्खियों से

आहत जख्मों को छुपा

मुस्कान की सौगात दी

कोमल भावनाएं

इच्छाओं की आहूति दी

कायम रखी

तुम्हारी मिल्कियत

वजूद को मिटा कर

फिर भी

तुम छीनते रहे मुझसे

मेरे हिस्से का वक्त

तुम्हें मंजूर नही

मेरा खुद के लिए

जीना

तृप्त ना हो सकीं

तुम्हारी इच्छाएं

छीन लेना चाहते हो

मेरा आस्तित्व

मेरी अभिलाषाएं

मेरा सब कुछ

हक से लेने वाले…

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Added by Meena Pathak on October 23, 2013 at 4:30pm — 28 Comments

नेताओं देश शर्मसार है तुम पर

जवान होते ही हैं

शहीद होने के लिए

और नेता

वह तो शासक है

सोना उनका हक है

जवान जब गोली खा रहा होता है

नेता पार्टी कर रहे होते हैं

जवानों की चिता को

मुखाग्नि भी

राजनीति का अवसर देती है

उन्हें,

शहीदों की

माओं के चाक सीने पर भी

नमक छिड़कने से भी

बाज नही आते

विलाप, क्रंदन भी

अवसर हैं वोट की तिजारत के।

नेताओं

देश शर्मसार है तुम पर।

 



मीना पाठक

 …

Added by Meena Pathak on October 19, 2013 at 8:00am — 29 Comments

पराया धन (लघुकथा)

रमाकांत को पचास वर्ष की आयु में सात पुत्रियों के बाद पुत्र रत्न की प्राप्ती हुयी थी | आज बेटे की छठी बड़े धूमधाम से मनाई जा रही थी | मित्रों और रिश्तेदारों से घर भरा हुआ था कहीं तिल रखने की भी जगाह नही थी घर में | महिलाएँ बधाई गीत गा रहीं थीं | रमाकांत सपत्नी खुशी से फूले नही समा रहे थे | बेटियाँ चुपचाप ये सब देख रहीं थीं | सबसे छोटी बेटी जो मात्र तीन वर्ष की थी अपनी सबसे बड़ी बहन की गोद में बैठी थी | सभी बहने देख रहीं थी कि कैसे सभी उसके नन्हें से भाई को गोद में ले कर स्नेह दिखा रहे थे | माँ…

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Added by Meena Pathak on October 11, 2013 at 5:36pm — 24 Comments

माँ तुम हो कितनी महान

माँ

गहरी सागर सी

ऊँची अनन्त सी

घुली पवन में

सुगंध सी

माँ!

हृदय तुम्हारा

कोमल फूलों सा

मिश्री सी वाणीं

लोरी, परियों की कहानी

माँ!

सुन्दर इतनी कि

अप्सराएँ शर्माएँ

आँचल में तुम्हारे

सागर ममता का

लहराये

महानता में ईश्वर भी

पीछे रह जाए

माँ!

स्पर्श में तुम्हारे

मिलता असीम सुख

हृदय से लग के

मिटता संताप, दुःख

माँ!

 तुम मेरी…

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Added by Meena Pathak on October 6, 2013 at 9:30am — 21 Comments

जीवन के रेगिस्तान में

जाने कितने बसंत

शीत,पतझड़, सावन

आये गये

तपती,भीगती,ठिठुरती

मुरझाती पर फिर भी

चलती रही अनवरत

हाँफती,दौड़ती,पसीजती

डोर अपनी साँसों की पकड़े

कोलाहल अंतर का समेटे

मूक, निःशब्द बस्

अपने काफिले के साथ

बढ़ती ही गई

जीवन के पथ पर !!



अपनी साँसें संयत करने को

रुकी इक पल को

पीछे मुड़ कर देखा जो

छोड़ गये थे सभी मुझको

मेरे पीछे था अब सुनसान

आगे वियावान

नीचे तपती रेत

ऊपर सुलगता आसमान…

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Added by Meena Pathak on September 28, 2013 at 4:08pm — 14 Comments

माँ तुम्हारा कर्ज चुकाना है

छन्द मुक्त रचना



नौ महीने

अपनी कोख में सम्भाला

पीड़ा सहकर

लायी मुझे दुनिया में

जानती हूँ

बहुत दुःख सह, ताने सुन

जन्म दिया मुझे



मैंने सुना था, माँ!

जब बाबा ने तुम्हें धमकाया था

कोख में ही मारने का

दबाव बनाया था

दादी ने क्या-क्या नही सुनाया!

पर तुम!

न डरी, न झुकी

मुझे जन्म दिया



हमारे होते भी

तुम निपूतनी कहलाई

पर तुम्हारे

प्यार में कमी न आई



तुम्हारे आँसुओं का

मोल चुकाना… Continue

Added by Meena Pathak on September 20, 2013 at 7:18pm — 22 Comments

एक कोमल एहसास

याद है !!

जब तुम्हारा जन्म हुआ था

एक नर्म तौलिये में लपेट

मुझे तुम्हारी एक

झलक दिखलाई थी

तुम्हे देखते ही

भूल गयी थी दर्द सारा

खों गयी थी

गुलाब की पंखुड़ियों जैसी सूरत में

कितना प्यारा था स्पर्श तुम्हारा

नर्म

बिलकुल रुई के फाहों जैसा

खुश थी छू के तुम्हे



तुम मद मस्त नींद में

लग रहा था

लम्बा सफ़र तय किया है तुमने

कितने दिनों के थके हो जैसे

 

जब तुमने

आँखें खोली पहली बार

इस नयी दुनिया को देखने की…

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Added by Meena Pathak on September 5, 2013 at 8:27pm — 47 Comments

समय -- लघुकथा

अलार्म   की आवाज सुन कर अदिति की आँख खुल गयी | उसने मोबाइल उठा कर अलार्म बंद कर दिया और समय देखा सुबह के ५ बज गए थे  जल्दी से उठ कर काम में लग गई सफाई, नहाना, पूजा बेटे को स्कूल और पति को ऑफिस भेज कर एक लम्बी साँस ली | कमरे में नजर घुमा के देखा तो पूरा कमरा अस्त व्यस्त हो गया था, फिर से उसने आंचल को कमर में खोंसा और काम में जुट गई | काम समेटते समेटते दोपहर हो गयी और बेटे के स्कूल से आने का समय भी | वो दौड़ कर रसोई में जा गैस पर दाल गर्म होने के लिए रख देती है इतने में बेटा आ जाता है, आते ही…

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Added by Meena Pathak on September 3, 2013 at 11:00am — 36 Comments

चाह बस् इतना कि







चाह नही मुझे कि..

मिलूँ तुमसे बागों व बहारों में



चाह नही मुझे कि..

मिलूँ तुमसे नदी के किनारों पे



चाह नही मुझे कि..

छेड़ो तुम  बंसी की तान और 

झूमती आऊँ मैं 



चाह नही कि..

बैठो तुम कदम्ब की डाल और

नाच के रिझाऊँ मैं 



चाह नही कि..

थामूं तुम्हारा हाथ और

निहारूँ तुम्हारी आँखों में



चाह बस इतनी कि..

हे नाथ !! 

छू लूँ तुम्हारे…

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Added by Meena Pathak on June 17, 2013 at 4:22pm — 23 Comments

साधन मात्र (लघुकथा)

जब भी राकेश देर रात तक काम करते हैं रानी कितना ख्याल रखती है | जब तक वो  काम करते हैं रानी दोनों बच्चों को मुंह पर उंगुली रख कर चुप कराती रहती है | बीच-बीच में उनको चाय बना के दे आती है | राकेश भी उसे बुला के सामने बैठा लेते हैं –“तुम सामने रहती हो तो काम जल्दी हो जाता है” ये बोल कर कितना लाड दिखाते हैं | जब तक वो काम करते रहते है रानी भी जागती रहती है फिर सुबह जल्दी उठ कर बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेज देती है | बच्चे अगर जोर से बोलते हैं तो उन्हें चुप करा देती है “ पापा रात देर से सोये है…

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Added by Meena Pathak on March 5, 2013 at 10:16am — 24 Comments

छाँव --- मीना पाठक

वसू हूँ मैं
मेरे ही अन्दर
से तो फूटे हैं
श्रृष्टि के अंकुर
आँचल की
ममता दे सींचा
अपने आप में
जकड़ कर रक्खा
ताकि वक्त
की तेज आंधियाँ
उन्हें अपने साथ
उड़ा ना ले जाएं
बढ़ते हुए
निहारती रही
पल-पल
अब वो नन्हें
से अंकुर
विशाल वृक्ष
बन चुके हैं
और मैं बैठी हूँ
उस वृक्ष की
शीतल छाँव में
आनन्दित
मगन
अपने आप में ||


मौलिक / अप्रकाशित 

Added by Meena Pathak on March 2, 2013 at 4:19pm — 18 Comments

तुमसे मिलने का असर है मुझ पर --- मीना पाठक

कभी चाह थी बहुत दिल मे 

कि छू लूँ मैं भी बढ़ा के हाथ 

मिट्टी,हवा,पानी इन सब को 

पीछे छोड़ शून्य को 

जिंदगी को चाह थी भरपूर जीने की

थी ललक, कुछ भी कर गुजरने की 

जिंदगी एक किताब खूबसूरत थी 

जिसे पढ़ने की प्यार से तमन्ना थी 



फिर घेरा ऐसा बादलों ने निराशा के 

खुद से बातें करती,हंसती,रोती,बावली 

सी, ना चाह रही जीने की ना…

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Added by Meena Pathak on February 28, 2013 at 8:30pm — 21 Comments

पापा की लाडली .... मीना पाठक

मै अपने पापा 

की  लाडली 
उनकी ऊँगली 
पकड़   कर 
मचलती इठलाती 
थोड़ी ही दूर चली थी 
कि 
काल चक्र ने 
एक झटके से 
उनके हाथ से 
मेरी ऊँगली छुड़ा दी
 
अब मैं अकेली 
इस निर्जन 
बियावान जंगल 
में 

इधर -…

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Added by Meena Pathak on February 19, 2013 at 1:30pm — 31 Comments

लक्ष्मी मेरे घर की .....-- मीना पाठक

आरती की थाली 

लिए हाथों में 

जाने कब से 

निहार रही हूँ बाट ....

आएगी वह 

जब सिमटी लाल-जोड़े में ,

मेहँदी रचे हाथों…

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Added by Meena Pathak on February 18, 2013 at 2:00pm — 26 Comments

सीख ( लघु कथा )

आज सुबह उठ कर घर का काम निपटाया बेटे को स्कूल भेज दिया | पतिदेव की तबियत कुछ ठीक नही तो वो अभी सो ही रहे थे |मैंने अपनी चाय ली और किचेन के दरवाजे पर ही बैठ गई कारण ये था कि आज आँगन में बहुत दिनों बाद कुछ गौरैया आयी थीं वो चहकते हुए इधर उधर फुदक रही थीं और मैं नही चाहती थी कि वो मेरी वजह से उड़ जाएँ | तो मैं वहीँ बैठ के उनको देखते हुएचाय पीने लगी | थोड़ी देर बाद गोरैया तो उड़…

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Added by Meena Pathak on February 1, 2013 at 5:00pm — 19 Comments

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