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Amita tiwari's Blog (82)

बूँद भर

बूँद भर 

 

आँख में ठहरा रहा

अश्रू सम बहरा रहा

विस्फरित हो तन गया

बूँद भर जल बन गया

कह  दिया न कहना था जो

न सहा वो  सहना था जो

था ही क्या जो कह गया

मन बेमन हो रह गया

 

एक ताला बनती  चाबी

प्रश्न- माला कितनी बांची

कैसे झटका  सह गया

मोती -मोती कह गया

 

कैसे -कैसे  मन ने टाला

मन ही ने लेकिन उछाला

झरना सा सब झर  गया

बूँद भर जल रह…

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Added by amita tiwari on August 1, 2019 at 1:30am — 3 Comments

आई थी सूचना गाँव में

बीते मास तेहरवीं तारीख़
तीन बजे अपरान्ह में
आई थी सूचना गाँव में
कि गाँव का होरी जो दिवाली पर आने को था
अब कभी…
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Added by amita tiwari on July 13, 2019 at 1:00am — 2 Comments

रजनीगन्धा मुस्कुराए न मुस्कुराए

कोई तो ऐसा दिन भी आए
कि रजनी हँसे रजनीगन्धा मुस्कुराए
बहुत दिन बीते बस यूँ ही रीते रीते
बहुत दिन बीते स्वयं ही जीते जीते
दे के मुल्क को बाकी दस महीने
अपने जो घर फ़ौजी सावन नहाए…
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Added by amita tiwari on July 7, 2019 at 2:30am — 3 Comments

पत्थरों पर गीत लिखे

कितने भले हो तुम 
कि तुमने 
पत्थरों पर गीत  लिखे

और पत्थर उछाल दिए 
 
इधर कितने भले हैं हम 
पत्थराई दृष्टि 
पत्थरों पर गीत पढ़े …
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Added by amita tiwari on March 23, 2019 at 12:30am — 1 Comment

चुनौती नए साल

      

चुनौती नए साल

 

नए साल

अब के जो आना

इतिहास के लिए कुछ पन्ने लेते आना…

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Added by amita tiwari on December 31, 2018 at 8:38pm — 4 Comments

वह धरती कब की छूट गयी

जहाँ सपने थे

लोग अपने थे

वह धरती कब की छूट गयी

भीड़ थी पर ठावँ थी

धूप थी संग छावं थी

वह धरती कब की छूट गयी

जनक थे जननी थी

बसेरा था रहनी थी

वह धरती कब की छूट गयी

जो छूट गये

जो रूठ गये

वही आस पास है

यह कैसे एहसास है ?

.

मौलिक व अप्रकाशित"

Added by amita tiwari on November 25, 2018 at 8:30pm — 3 Comments

ये जो है लड़की

ये जो है लड़की

उसकी जो आँखे

आँखों में सपना

सपने में घर

उसका अपना घर

जिसके बाहर

वो लिख सके

यह  मेरा घर है दुकान नहीं है…

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Added by amita tiwari on October 16, 2018 at 12:30am — 7 Comments

कुछ भी नहीं बोलती जानकी कभी

कहने को तो बहुत कुछ है हमारे पास भी

ये बात अलग है कि कहते बनता नहीं

ऐसा भी नहीं कि कहना जानते नहीं

शब्द भंडार भी है अथाह अपार

वाक्य विन्यास का सारा सार

फिर भी ऐसा कुछ है निःसन्देह 

रोक लेता है जुबान को

लफ्ज़-ए - ब्यान को

 

ठीक वैसे ही  जैसे जानकी

सतीत्व- प्रमाणिकता बनाम  

विश्वास भरोसे संवारने  हेतु

अग्नि -परीक्षा के लिए तत्पर  

क्या क्या नहीं बोल सकती थी

पूरा मुख खोल सकती…

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Added by amita tiwari on September 16, 2018 at 2:00am — 11 Comments

युद्ध के विरुद्ध

जी हाँ  ! युद्ध के विरुद्ध हूँ मैं-

इस लिए नहीं की नहीं देश से प्यार मुझे

अथवा की अपनों के लिए मन नहीं डोलता है 

मेरी धमनियों में भी रक्त है वो भी खौलता है 

अपनों की शहादत पर बहुत क्रोध जागता है 

मन जोश में सीमा की और भागता है 

बदले की आग जलाती है



लेकिन

एक बात यह भी समझ में आती है 

कि 

धरित्री जननी है रक्त नहीं पचाती 

गगन जनक है रणभेरी नहीं सुहाती 



और ये भी 

कि इधर रमेश गिरे अथवा उधर रहमान 

मरती तो दोनों और…

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Added by amita tiwari on September 5, 2018 at 10:30pm — 9 Comments

विगत -गत

विगत -गत

कल कोने में दुबके सहमे

डरे डरे कुछ  लम्हे पाए

मैंने जा कर के सहलाया

झूठ सही पर जा बहलाया

कि मेरे होते न यूं डरो

परिचय दे ले बात करो  

 

सुन कर पल ने ली अंगडाई

व्यंग बुझी  सी हँसी थमाई

 

बोला कलंक से  कलुषित हो

आत्मग्लानि से झुका हुआ था

विगत साल हूँ रुका हुआ था

 

उत्सुक था क्या नया करोगे

मुझे भेज जब नया…

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Added by amita tiwari on January 24, 2018 at 5:23am — 5 Comments

अब की बार दिल की सुन लो

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Added by amita tiwari on February 16, 2017 at 8:30am — 3 Comments

वर्ष नया मंगलमय कहने

चले भी आओ की थोड़ी सी प्रीत निभा लें

वर्ष नया मंगलमय कहने की रीत निभा लें

कहना यह भी था कि

जाते साल के इतने तो उधार बाकी हैं

कुछ मुझ पर कुछ तुम पर उपकार बाकी हैं

शुकराने की सुरमय सरगम सजा लें

वर्ष नया मंगलमय कहने की रीत निभा लें

कहना यह भी था कि

कोई वादा अभी भी अधूरा सा है

आँखों में उम्मीद का चूरा सा है

वादे की हदों की हदें ही मिटा लें

वर्ष नया मंगलमय कहने की रीत निभा लें

कहना यह भी था कि

कुछ चुभने हैं बाकी जो कसकती…

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Added by amita tiwari on December 30, 2016 at 4:11am — 6 Comments

नये साल का नया सूरज

नये साल का नया सूरज   
बहुत चाह है कि …
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Added by amita tiwari on December 15, 2016 at 11:17pm — 2 Comments

स्वीकार कोई कैसे करे

स्वीकार तो पहले भी कहाँ था 
लेकिन तब स्थिति ऐसी कहाँ थी 
अब तक सर हिलाने की…
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Added by amita tiwari on December 3, 2016 at 7:18pm — 7 Comments

कल की ही तो बात थी

अभी कल की  ही  तो बात  रही 

दो चार ही पल छीन पाए  
इक उगती  शाम  की  झोली से 
फिर न चाँद ऊगा न  सितारे ढल  पाए 
शर्मसार  हो  डूबा  सूरज स्वंय को स्वंय से  छिपाए
 …
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Added by amita tiwari on November 1, 2016 at 10:00pm — 3 Comments

सीमा ने बलिदान क्यों माँगा

कभी विधि चले  साथ 

कभी झटक दिए हाथ
कैसा ये खेल कैसे खिलौने 
बिन बदरा…
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Added by amita tiwari on September 30, 2016 at 8:30pm — 11 Comments

माँ !तो आज तुम्हारा पहला श्राद्ध भी हो गया !

तुम्हारी तरह

आज तुम्हारी बहू भी सुबह अँधेरे उठ जायेगी



ठीक तुम्हारी तरह

साफ़ सुथरे चौके को फिर से बुहारेगी 

नहा धो कर साफ़ अनछूई एक्वस्त्रा हो

तुलसी को अनछेड़ जल चढ़ायेगी

ठीक तुम्हारी तरह 

आज फूल द्रूब लाने को भी बेटी को नहीं कहेगी

ठाकुर जी के बर्तन भी स्वय मलेगी

ज्योती को रगड़ -रगड़ जोत सा चमकायेगी

महकते घी से लबलाबायेगी

घर के बने शुद्ध घी शक्कर में लिपटा

चिड़िया चींटी गैया को हाथ से…

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Added by amita tiwari on September 27, 2016 at 9:00pm — 1 Comment

अथ से अभी तक

अथ से अभी तक जो जैसा मिला

सर माथे ले कर के जीते रहे

विधाता की झोली सुदामा भी हो गयी

तो बन कर के कान्हा सीते रहे

गिला है न शिकवा ज़माने से

कोई तकदीर से भी तकाज़ा नहीं

जीना कही जब ज़हर भी हुआ

तो मीरा बने प्याले पीते रहे

इन्द्रधनुष दिया कुरुक्षेत्र पाया

सत्ता से सत्ता की पायी लड़ाई

सिंहासन से चस्पा वफादारी देखी

 विदुरों के तरकश तो  रीते रहे

जतनों से बुनचुन जो सपना संजोया

तकिये बेचारे…

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Added by amita tiwari on September 21, 2016 at 11:30pm — 2 Comments

ऐसा भी हो

ऐसा भी हो 
स्वंय से मिले निगाहें जब- जब 
गर्व से सीना तन पाए 
ग्लानि  हो न मीलों  तक 
इतिहास भले न रच पाए …
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Added by amita tiwari on September 14, 2016 at 3:05am — 5 Comments

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