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Arpana Sharma's Blog (33)

"झिलमिल धूप"/कविता - अर्पणा शर्मा, भोपाल

सर्द सिहराती शिशिर की सुबह,

भेदकर कर कोहरे की नजर,

ओसकणों को चुंबन देकर,

मेरे आँगन धूप उतर आई थी ,

गुनगुनी, ऊष्म, स्नेहिल ज्यों

एक प्रेमालिंगन ले आई थी,

रूपहली-सुनहरी सुरमाई सी,

सूर्य वधु ज्यों प्रातः लेती अंगड़ाई सी,



ये दुछत्ती खिल जाये प्यारी,

महके छोटी सी मेरी फुलवारी,

धूप ने धूम मचाई थी,

चंपा, चमेली, सेवंती की बहार सी,

गेंदे, गुलाब, हरसिंगार भी,

ज्यों सुंदरी रंगीली चुलबुलाई सी,



धूप घुस आती हर दर्रे… Continue

Added by Arpana Sharma on November 26, 2016 at 4:21pm — 8 Comments

"दिल्ली -संवेदनाएं" -कविता /अर्पणा शर्मा

सुना है भयंकर कोहरा छाया,

शीत ने दिल्ली को कँपकँपाया,

प्राणवायु को भारी बनाया,

हर तरफ इक जहरीला साया,

प्रदूषण से त्रस्त हर जीव,

जीवन श्वसन है लड़खड़ाया,

स्व-करनी भोगने का समय आया,

क्यों सब देखें दाँयें-बाँयें,

क्यों मर गईं सबकी सँवेदनाएं,

क्यों सरकार से सब अपेक्षाएँ,

और सब पर्यावरण की धज्जी उड़ाएं,

प्रबुद्ध वर्ग हो-हल्ला करे,

नियमों को अमलीजामा कौन पहनाए,

सब तरह के आक्रमण, विध्वंस,

झेल गई दिल्ली बिचारी,

अब आई इसके जीवन की… Continue

Added by Arpana Sharma on November 7, 2016 at 11:08pm — 2 Comments

"इंतजार .." कविता/ अर्पणा शर्मा

कुछ प्रतीक्षा सी रहती है,

इक अनकहा सा इंतजार होता है,

हालातों में जहाँ,

सब कुछ मुश्किल,

अनिश्चित और दुश्वार होता है,

जीवन जब अनमना सा,

केवल जीने का व्यापार होता है,

कल्पनाओं में मन की,

कहीं कोई चमत्कार होता है,

कभी सोचते हैं हम

कहीं से आकर कोई हमदम,

कर देगा सबकुछ,

बिल्कुल ठीक और उत्तम,

प्रार्थनाओं और दुआओं में,

यही इज़हार होता है,

मनचाही खुशियाँ पाने को,

दिल सबका बेकरार होता है,

हर मन की परतों में कहीं… Continue

Added by Arpana Sharma on November 5, 2016 at 3:30pm — 6 Comments

"रफूचक्कर"/हास्य -व्यंग्य कविता -अर्पणा शर्मा

देख पुलिस का पहरा सड़क पर,

गाज गिरी बिन हेलमेट के,

दोपहिया चालक पर,

हड़बड़ाया ,वो घबराया,

जब पुलिस ने उसे,

टिकट चालान का पकड़ाया,

बटुए का उसे खयाल आया,

अभी देता हूँ,

कहते-कहते वो घनचक्कर,

जल्दी से गाड़ी चला,

हुआ रफूचक्कर,

पुलिस ने नया दाँव अजमाया,

आरटीओ से घर का,

पता निकलवाया,

चालान टिकट उसके ,

घर भिजवाया,

अब ऊँट पहाड़ के नीचे आया,

फिजूल ही खुद को चूना लगाया,

जोश हुए ठंड़े, चालान भरकर,

सारी बदमाशी हुई… Continue

Added by Arpana Sharma on November 4, 2016 at 4:07pm — 2 Comments

अर्पणा शर्मा -"दीपोत्सव" कविता

मंगलमय हो दीपोत्सव यह शुभ-शुचित,

झिलमिलाये अमावस यह कार्तिक,

नेह-पुष्प तोरण हर द्वार सुसज्जित

सुंदर अल्पनायें आँगन-देहरी रचित,

विकारजन्य स्वदोषों से मुक्ति समाहित,

अंतस के भावों में हो यह कामना सन्निहित,

बैर, अहिंसा, अशांति ना हो किंचित,

ऐसी ज्योति करें सर्वत्र प्रज्वलित,

जनकल्याण सुख-सौभाग्य दीप प्रकाशित,

दीपज्योति वीर-बलिदान समर्पित,

सानंद न्यौछावर हुए जो देश के हित,

तम का क्षय हो, सर्वजन हों आनंदित,

नवचेतना, जागृति हो सर्वत्र… Continue

Added by Arpana Sharma on October 29, 2016 at 6:48pm — 6 Comments

अर्पणा शर्मा : "गोलगप्पा"/हास्य कविता

रसना लपलपाये देख गोलगप्पा,

चलो हो जाये कुछ धौल धप्पा,

धनिया, पुदिना, कैरी की चटनी,

और जोरदार इमली का खट्टा,

है मिलाया इसमें गुड़ का मीठा,

हींग और जीरे का लगाया है तड़का,

हरदिल अजीज, लाजवाब शै है

ये गोलगप्पा ,

भरे बाजार,लिये दोना सबरे खड़े,

ना होता कोई हक्का-बक्का,

मुँह में घुलाया, फिर जीभ से,

दिया अंदर धक्का,

गले में यह जा अटका,

साँस आधी ऊपर आधी नीचे,

बड़ी मुश्किल से गटका,

पर तब भी मन न माना,

जल्दी से एक और… Continue

Added by Arpana Sharma on October 26, 2016 at 5:02pm — 8 Comments

अर्पणा शर्मा: कविता - "अक्षर"

अक्षर-अक्षर माला जुड़ी,

मिली मानुष मन को वाणी,

अक्षर की रचना बनी,

विश्व में प्रगतिवाहिनी,

लिखें या बोलें , संप्रेषण में,

अक्षर का ना कोई सानी,

दर्द, दर्प, दुख, प्रेम-विरह,

शंका, उल्लास या सनसनी,

अक्षरों में निहित भावों से,

हर मन की थाह जानी,

अक्षर हैं संवदिया,

महत्ता इनकी जिसने गुनी,

वश में कर ली दुनिया उसने,

बोल सच्ची-मधुर वाणी,

अक्षर-अक्षर में छिपी,

सभ्यता के उत्थान की कहानी,

रच लो सृजन का अमर संसार,

बन कर… Continue

Added by Arpana Sharma on October 25, 2016 at 3:59pm — 4 Comments

कविता :"विजयादशमी " - अर्पणा शर्मा, भोपाल

हम सब कठपुतलें हैं,

करते परंपरागत दहन,

रावण के पुतलों का,

मनाते पर्व विजय का,

पर छुपे हुए रावण,

हर जगह फैलें हैं,

ऊपर से उल्लासित हम,

भीतर से त्रस्त और खोखले हैं,

आतंक,दुराचार,विभीषिकाओं के,

भीषण दौर इस विश्व में,

सभी धर्मों, सभ्यताओं,

और समाजों ने झेले हैं,

छुपी हुई दुराचारी,

अहंकारी मनोवृत्ति के,

आतंक और भ्रष्टाचार के,

युद्ध और विनाश के,

अशिक्षा और दरिद्रता के,

इन रावणों का दहन करने,

हे राम…

Continue

Added by Arpana Sharma on October 11, 2016 at 10:30am — 15 Comments

लघुकविता - "मेहरबानी" - अर्पणा शर्मा

" चूँकि,
मुश्किल थी,
देखभाल,
अंततः वह,
छोड़ ही आया,
वृद्धाश्रम में
माँ को,
वर्षों पहले,
इसी कारण से,
वह ले आई थी,
अनाथाश्रम से,
एक नन्हा बालक,
अपने घर को....!!"

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Arpana Sharma on October 7, 2016 at 3:20pm — 6 Comments

लघुकथा- फर्क (अर्पणा शर्मा)

 "अरे , मकान का काम देखने मम्मी जी , पापाजी को भेज दें।", राखी कुनमुनाई, "बेकार ही घर में बैठे हैं" वो सोचने लगी, " हम तो खाना निपटा कर फिर थोड़ी देर वहाँ काम देख आएँगे", सास-ससुर के जाते ही उसने आजादी की साँस ली और जल्दी से मायके फोन लगाया । वैसे तो सुबह उठकर सबसे पहले अपने पिताजी से बात करके ही उसका दिन शुरू होता है पर फिर भी पूछना था कि उन्होंने ठीक से खाना खाया कि नहीं । तभी नन्ही पलक ठुमकती आई-"मम्मी सू आरही है", "अरे भई, अपन से नहीं होता ये सब, बच्चों की सू-सू, पाॅटी", राखी ने…

Continue

Added by Arpana Sharma on October 5, 2016 at 11:00pm — 4 Comments

कविता - "उत्कर्ष"/अर्पणा शर्मा

“उत्कर्ष“

एक टिमटिमाते, बुझते तारे का उत्कर्ष,

देख लोग, होते चमत्कृत,

लेकिन वे बूझने में असमर्थ,

उसका नैपथ्य में छिपा,

गहन, सतत संघर्ष,

रुपहली चमक के पीछे छिपे,

कालिमा के सुदीर्घ, लंबे वर्ष,

फिर भी आशाओं से परिपूर्ण,

बाधाएँ, चुनौतियाँ पार कर,

उत्साहित, प्रसन्नचित्त, प्रकाशमान सहर्ष,

प्रोत्साहन देता अनूठा, गांभीर्य शब्द संघर्ष,

छिपा गूढ इसमें तात्पर्य,

ड़टे रहो कर्तव्यपथ पर “ संग + हर्ष",

अब दूर कहीं मुसकुराता है,…

Continue

Added by Arpana Sharma on October 4, 2016 at 5:41pm — 6 Comments

" स्मार्ट फोन का जमाना "/अर्पणा शर्मा

देखो भाई, स्मार्ट फोन का, जमाना आया,

साथ में नेट-पैक वालों की, चाँदी कर लाया,

उँगलियों के स्पर्श से, चलता ये पुर्जा,

हजारों रूपये का , इस पर होता खर्चा,

हर छुअन पर , जाता है सिहर,

जहाँ छुओ, वहाँ खुल जाता, एक नया मंजर,

फेसबुक, व्हाट्सएप की बड़ी बहार है,

चुटीले-उपदेशी संदेशों की भरमार है,

विभिन्न समूहों में होरहीं, गहन चर्चाएँ,

सारे राष्ट्र की समस्याएँ, यहीं सुलझाएँ,

अपने -अपने गुटों की, खुली है चौपाल,

सरकार भी चौकन्नी…

Continue

Added by Arpana Sharma on September 29, 2016 at 8:00pm — 6 Comments

लघुकथा शीर्षक " श्राद्ध "/अर्पणा शर्मा

पितृपक्ष चल रहे थे और नगर के बड़े सेठजी ने अपने पिताजी के श्राद्ध पर एक भव्य आयोजन किया था। 11 पंड़ित मंत्रोच्चार कर सेठजी के पिताजी की तस्वीर को नाना प्रकार के व्यंजन समर्पित कर रहे थे। नाते- रिश्तेदारों के साथ ही बाहर माँगनेवालों और दरिद्रों की भीड़ प्रतीक्षारत थी कि कब भोजन शुरू हो और उनको भी मिले। दान की सामग्री पंड़ाल में एक मेज पर रखी थी जिसे सेठजी का ज्येष्ठ पुत्र संभाल रहा था। अंदर पंड़ित जी ने श्राद्ध की महिमा का बखान करते हुए कहा कि 84 लाख योनियों में जन्म से मुक्ति के लिये विधि… Continue

Added by Arpana Sharma on September 28, 2016 at 12:30pm — 6 Comments

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